भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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जाय निरंजन माहिं समाई । आगे गम्य न काहू पाई ।।

ऐसे तीन लोक सब अटके । खरे सयाने ते सब भटके ।।

ऋषि मुनि गण गंधर्व अरु देवा । सब मिल करें निरंजन सेवा ।।

साधक सिद्ध साधु जो भयेऊ । इनके आगे कोई न गयेऊ ।।

सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि आदि जितने भी समय-समय पर इस संसार हुए, वे सब निरंजन तक ही गये । उसके आगे कोई नहीं जा पाया। सबने निरंजन की भक्ति की सच्ची भक्ति कोई समझ नहीं पाया।

कहैं कबीर सुनो मम बानी । सार भक्ति मैं कहौं बखानी ।।

आगे भक्त भये बहु भाई । करी भक्ति पर युक्ति न पाई ।।

आदि भक्ति शिव योगी केरी । राखी गुप्त न जग में फेरी ||

तासन मेरी भक्ति नियारी । जाको क्या जाने संसारी ।।

ताको योगेश्वर नहिं पावे । और जीव की कौन चलावे । कहा कि भक्ति का सार बताता हूँ । अब तक बहुत भक्त संसार में हुए; भक्ति तो की, पर युक्ति नहीं आई । हर चीज़ की एक युक्ति होती है। महायोगेश्वर शिवजी आदि भक्ति जानते हैं, जिसमें ररंकार नाम का जाप करना होता है । उस ररंकार से ही जगत की उत्पत्ति है । पर इस भक्ति को गुप्त रखा गया। इसे केवल शिवजी ही जानते हैं, कोई और नहीं जानता, पर मेरी भक्ति इससे परे है । जिस भक्ति की बात मैं कर रहा हूँ, उसे योगेश्वर भी नहीं जानते हैं, फिर आम संसारी किस गिनती में हैं !

सनक सनन्दन सनत्कुमारा । सनकादिक से चारों अवतारा ।।

ध्यान जु करे निरंजन माहीं । निरंजन सों न्यारा कोउ नाहीं । ।

भक्त अनेक भये जग माहीं । निर्भय घर को पावत नाहीं ॥

भक्ति करैं तब भक्त कहावे । भगते रहित न कोई पावे ।।

भग भुगते फिर फिर भग आवे । भगते बच न कोई पावे ।।

चौदह लोक बसैं भग माहीं । भग ते न्यारा कोई नाहीं ॥

मेरी भक्ति युक्ति जाना । ताका आवागमन नशाना।।

सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनकादिक आदि भी निरंजन का ध्यान कर उसी तक पहुँचते हैं, उससे परे कोई नहीं । संसार में अनेक तरह के भक्त हुए हैं, पर उस अमर लोक, जो निर्भय स्थान है, को कोई नहीं पाया । सभी

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