भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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यानी कोई लाभ नहीं। रिद्धियाँ, सिद्धियाँ तो मिल जायेंगी, सुख भी मिल जाएगा, पर भवसागर से सदा के लिए छूट नहीं पाएगा। कैलास पर्वत पर भी वास पा लेगा, पर काल - पुरुष पुनः भवसागर में फेंक देगा। तभी कहा- शिवसाधन की यह गति, शिव हैं भव के रूप ।

बिन समझे यह जगत सब, परे महा भ्रम कूप ।।

क्या मनुष्य- जन्म इसलिए मिला था ? नहीं! मनुष्य - तन तो सदा के लिए यहाँ से छूटकर अमर-लोक में जाने के लिए मिला था। पर मनुष्य है कि समझता ही नहीं। आगे कह रहे हैं-

हरि हरि नाम विष्णु को भाखा । शुभ अरु अशुभ कर्म है राखा ।।

इनमें करे कलोल सदाई । करे भोग जीवन भरमाई ।।

बहुत प्रीत सों विष्णु को ध्यावे । सो जीव विष्णु पुरी को जावे ।।

विष्णु पुरी में निर्भय नाहीं । फिरके डार देय भूमाहीं । ।

यानी सुरक्षा तो यहाँ भी नहीं है । भय है । साहिब के सद्गुरु के | अमर लोक के बिना सुरक्षा कहीं भी नहीं है । आगे कह रहे हैं-

हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ । रज गुण व्यापक है सब ठाऊँ ।।

ब्राह्मण को पूजै संसारा । जीव न हो भव ते न्यारा।।

पढ़ पढ़ विद्या जग भर्मावे । भक्ति पदारथ कैसे पावे ।

पोथी पाठ पढ़ें दिन राती । ये केवल भ्रम के उत्पाती ।।

आप भ्रम ते निर्भय नाहीं । बहे जात हैं भ्रम के माहीं ॥।

औरन को शिक्षा सब देही । ताते मिलै न परम सनेही ।।

पाप पुण्य का लेखा करहीं । बिना भक्ति चौरासी परहीं ।

ब्राह्मण की है यह करतूती । ब्राह्मण पूजे होय न मुक्ति ।।

अरे, मुक्ति तो इसमें भी नहीं है । अगर सगुण भक्ति में मुक्ति है ही नहीं तो फिर ज़रूर हमें इससे ऊपर उठना होगा। इससे ऊपर निर्गुण-भक्ति है, पर हमें निर्गुण-भक्ति से भी ऊपर साहिब की, सद्गुरु की भक्ति की ओर जाना होगा । निर्गुण-भक्ति में तो योग का महात्म है, पर साहिब कह रहे हैं—

सुन धर्मदास भक्तिपद ऊँचा । इन सीढ़ी कोई नाहिं पहुँचा । ।

योगी योग साधना करई । भवसागर से नाहीं तरई ।।

यानी निर्गुण-भक्ति से भी कल्याण नहीं होने वाला। इसकी पहुँच भी साहिब बता रहे हैं-