भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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शुकदेव को राजा जनक को गुरु धारण करना पड़ा था, क्योंकि उनमुनि मुद्रा के विशेषज्ञ थे ।

ररंकार खेचरी मुद्रा, दसवां द्वार ठिकाना ।

ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, ररंकार को जाना ।।

फिर इन सबसे ऊपर पाँचवीं मुद्रा खेचरी है । इसमें 10वें द्वार को खोल जाना होता है । इसमें पारंगत हैं - त्रिदेव । लोग आलोचना कर रहे हैं, हम कह रहे हैं कि चिंतन करो । मानव तन में दिव्य रहस्य भरे हैं ।

शिव गोरख सो पच-पच हारे, इस काया का भेद ना पाए । ।

इससे सुषुम्ना नाड़ी को खोल महाशून्य तक जाते हैं, महाशून्य क को अनुभव कर सकते हैं । 10वाँ द्वार खुलने से कहीं भी विचरण करने की क्षमता आ जाती है । पर साहिब कह रहे हैं- - सिध साध त्रिदेवादि ले, पाँच शब्द में अटके । मुद्रा साध रहे घट भीतर फिर औंधे मुँह लटके | तो सभी यहाँ तक पहुँचे । औंधे मुँह लटकने का मतलब है, फिर माँ के पेट में आना। यानी फिर जन्म होगा । पुनर्जन्म विद्यते । दुबारा जन्म होगा । माया फिर नीचे पटक सकती है । अन्तर का भ्रमन मीन, पपील, और विहंगम से होता है । योगी मीन, पपील से जाता है, पर विहंगम से नहीं ।

इसके आगे भेद हमारा | जानेगा कोई जाननहारा ।।

कहैं कबीर जानेगा वोही, जापर कृपा सतगुरु की होई । ।

सत्य-भक्ति सद्गुरु के ही चारों ओर घूम रही है। इसमें सद्गुरु के 'नाम' का बड़ा महत्व है । इसमें 11वें द्वार से निकलकर हमारी आत्मा अपने मूल स्थान को लौट जाती है, जहाँ से फिर कभी वापिस इस दुख से भरे संसार में नहीं आना पड़ता । सगुण-निर्गुण भक्ति में जीव कहाँ तक जायेगा, साहिब एक अन्य स्थान पर पुनः समझा रहे हैं । सगुण - भक्ति में त्रिगुण - भक्ति का महत्व है। साहिब कह रहे हैं—

हर हर नाम सदा शिव केरा । तासों दूर न होत भव फेरा।।

बहुत प्रीत सों शिव को ध्यावे । रिद्धि सिद्धि बहुत सुख पावे ।।

मन जिसके निश्चय कर रहीं । गिरि कैलास में बासा करहीं । ।

फिरके काल झपेटे बाहीं । डार देय भवसागर माहीं । ।