भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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हुई। इतने में उसने कहा कि ठीक है, निकालो 400 रुपये। मैंने तो भी कुछ नहीं कहा, तो कहा कि 250 दे दो। फिर 200, फिर 100 तक आ गया। मैंने सोचा कि पक्का कोई गड़बड़ है, कहा कि कीमत कम करो। उसने कहा— कम करो, कम करो ही बोले जा रहे हो, खुद मुँह से कहो कि कितना देना चाहते हो ! पहले 700 से 20 रुपये बोलने में शर्म आ रही थी। तो कहा कि 20 रुपये दूँगा । उसने कहा—निकालो। मैंने कहा कि पैसे भी ले लो, मुझे रेड़ियो भी नहीं चाहिए, मुझे केवल जानकारी दे दो कि मामला क्या है ! तो उसने कहा कि अभी भी इसमें 8 रुपये का फायदा है। मैंने पूछा- कैसे ? कहा कि यह पाँच मिनट चलेगा, नकली बेकार सेल्स हैं, बेकार मशीनरी है । फिर कोई रिपेयर भी नहीं कर पायेगा। मैंने कहा कि मैंने वापिस आना था। कहा – मैंने कहना था - कि मैंने दिया ही नहीं। मैंने देखा कि उसके पीछे कुछ गुण्डे भी खड़े थे । और भी कई चीजें हैं। तो भाईयो ! भक्ति में भी यही चीज़ें आ गयी हैं । महात्मा की मीठी-मीठी बातों में मत आना । उसके नाच को मत देखना, वो जो कह रहा है, केवल उससे ही संतुष्ट नहीं हो जाना । उसको पहले देखना कि खुद कहाँ तक पहुँचा हुआ है, क्या खुद रुहानी दुनिया में गया है या नहीं ! .. हम योग आदि को नकार नहीं रहे, पर इसके आगे भी कुछ अवस्थाएँ हैं । एक आदमी मेरे पास आया, धुन की महिमा कहने लगा। उसने उदाहरण भी दिये, कहा कि आप कह रहे हैं कि नाशवान हैं । उसका मतलब था कि धुनें ही पराकाष्ठा हैं । नहीं! वो एक पड़ाव है, मुकाम नहीं। वहाँ की अवस्था ऐसी है कि मन को काम, क्रोध नहीं हो पाता, पर वो लक्ष्य नहीं है । हमने सोच लिया कि कबीर साहिब के चार दोहे पढ़कर कबीर को जान लिया। पर सावधान ! क्योंकि-

कबीर का गाया गायेगा। तीन लोक में मार खायेगा ।।

कबीर का गाया बूझेगा । अन्तरगत को सूझेगा ।।

... तो आगे कह रहे हैं— सत् शब्द सो उनमुनि मुद्रा, सोई आकाश सनेही । तामें झिलमिल जोत दिखावे, जाना जनक विदेही ।