करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
जाय निरंजन माहिं समाई । आगे गम्य न काहू पाई ।।
ऐसे तीन लोक सब अटके । खरे सयाने ते सब भटके ।।
ऋषि मुनि गण गंधर्व अरु देवा । सब मिल करें निरंजन सेवा ।।
साधक सिद्ध साधु जो भयेऊ । इनके आगे कोई न गयेऊ ।।
सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि आदि जितने भी समय-समय पर इस संसार हुए, वे सब निरंजन तक ही गये । उसके आगे कोई नहीं जा पाया। सबने निरंजन की भक्ति की सच्ची भक्ति कोई समझ नहीं पाया।
कहैं कबीर सुनो मम बानी । सार भक्ति मैं कहौं बखानी ।।
आगे भक्त भये बहु भाई । करी भक्ति पर युक्ति न पाई ।।
आदि भक्ति शिव योगी केरी । राखी गुप्त न जग में फेरी ||
तासन मेरी भक्ति नियारी । जाको क्या जाने संसारी ।।
ताको योगेश्वर नहिं पावे । और जीव की कौन चलावे । कहा कि भक्ति का सार बताता हूँ । अब तक बहुत भक्त संसार में हुए; भक्ति तो की, पर युक्ति नहीं आई । हर चीज़ की एक युक्ति होती है। महायोगेश्वर शिवजी आदि भक्ति जानते हैं, जिसमें ररंकार नाम का जाप करना होता है । उस ररंकार से ही जगत की उत्पत्ति है । पर इस भक्ति को गुप्त रखा गया। इसे केवल शिवजी ही जानते हैं, कोई और नहीं जानता, पर मेरी भक्ति इससे परे है । जिस भक्ति की बात मैं कर रहा हूँ, उसे योगेश्वर भी नहीं जानते हैं, फिर आम संसारी किस गिनती में हैं !
सनक सनन्दन सनत्कुमारा । सनकादिक से चारों अवतारा ।।
ध्यान जु करे निरंजन माहीं । निरंजन सों न्यारा कोउ नाहीं । ।
भक्त अनेक भये जग माहीं । निर्भय घर को पावत नाहीं ॥
भक्ति करैं तब भक्त कहावे । भगते रहित न कोई पावे ।।
भग भुगते फिर फिर भग आवे । भगते बच न कोई पावे ।।
चौदह लोक बसैं भग माहीं । भग ते न्यारा कोई नाहीं ॥
मेरी भक्ति युक्ति जाना । ताका आवागमन नशाना।।
सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनकादिक आदि भी निरंजन का ध्यान कर उसी तक पहुँचते हैं, उससे परे कोई नहीं । संसार में अनेक तरह के भक्त हुए हैं, पर उस अमर लोक, जो निर्भय स्थान है, को कोई नहीं पाया । सभी
विषयों में फँसे हुए हैं; विषय भोगकर फिर विषयों में ही आकर समाते हैं । इससे कोई नहीं बच पाया । जो मेरी भक्ति पाकर उसकी युक्ति जानता है, उसका आवागमण मिट जाता है; फिर वो मातृ गर्भ में नहीं आता।
जो तुम पूछो भक्ति प्रकारा । ताका भेद सुनो अब न्यारा।।
भक्ति होय न नाचे गाये । भक्ति होय न घंट बजाये ।।
भक्ति होय न मूरत पूजा । पाहन सेवे क्या तोहि सूझा ।।
विमल विमल गावें अरु रोवें । क्षण एक परम जन्म को खोवें ।।
ऐसे साहब मानत नाहीं । ये सब काल रूप के छाहीं ।।
मन ही गावे मन ही रोवे । मन ही जागे मन ही सोवे ।।
जब लग भीतर लग्न न लागे । तब लग सुरति कबहुँ न जागे ।।
सत्य नाम की खबर न पाई । का कर भक्ति करों रे भाई ||
ठौर ठिकाना जानत नाहीं । झूठे मग्न रहैं मन माहीं।।
कहन सुनन को भक्त कहावें । भक्ति भेद कितहूँ नहिं पावें ।।
अपने साहिब को न जाना । बिन देखे का किया बखाना ।।
ऐसे भूल परे संसारा । कैसे उतरे भव जल पारा ।।
धर्मदास ! जो तुम सच्ची भक्ति पूछ रहे हो तो पहले यह समझ लो कि नाचना, गाना, घंट बजाना, मूर्ति पूजा आदि यह सब भक्ति में नहीं आते। फिर रोना, गाना आदि भी भक्ति नहीं है । इन चीजों से साहिब खुश नहीं होते हैं। ये सब तो काल का जाल है, क्योंकि मन ही रोता है, मन ही गाता है, मन ही जागता है, मन ही सोता है । इसलिए जब तक भीतर लग्न नहीं लगती, तब तक इन बाहरी चीज़ों से सुरति चेतन नहीं हो सकती। जब तक सत्यनाम नहीं मिल जाता, तब तक कौन-सी भक्ति हुई ! सच्चे साहिब के घर का तो पता नहीं है, फिर झूठे ही मन में खुश होते रहने से क्या होता है ! ऐसे तो कहने- सुनने को बहुत सारे भक्त बन जाते हैं, पर सच्ची भक्ति का भेद मालूम नहीं होता। बिना देखे ही उसका बखान करते रहने से कुछ नहीं होता। सारा संसार ऐसे ही बाहरी चीजों में उलझा हुआ है, फिर संसार सागर से पार कैसे पाया जा सकता है !
धर्मदास तुम हो बुद्धिवंता । भक्ति करो पावो सतसंता।।
एक पुरुष है अगम अपारा। ताको नहीं जाने संसारा।
ताकी भक्ति से उतरे पारा। फिर के नहिं ले जग अवतारा ।।
भक्ति ही भक्ति भेद बहु भारी । यही भक्ति जगत ते न्यारी ।।
हे धर्मदास ! तुम बुद्धिमान हो, इसलिए संतों के संग में जाकर सत्य भक्ति को प्राप्त करो। एक पुरुष अगम है; उसको संसार नहीं जानता है । उसकी भक्ति से ही जीव संसार-सागर से पार होकर फिर वापिस नहीं आता । यही सच्ची भक्ति का गुप्त भेद है, जो संसार की सभी भक्तियों से न्यारी है । धर्मदास जी ने पूछा-
धर्मदास कहै सुनो गुसाईं । पूरण पुरुष बसै किहि ठाई ।।
केहि विधि सों सेवा कीजे । कैसे चरण कमल चित दीजे || पूछा कि वो परम पुरुष कहाँ रहता है; कैसे उसकी भक्ति करूँ ? साहिब ने कहा—
पहिले प्रेम अंग मैं आवे । साधु देख सम्मुख होय धावे ।।
चरण धोय चरणामृत लेवे । प्रीति सहित साधु को सेवे ।।
जोई साधु प्रेम गति जाने । ता साधु की सेवा ठाने ।।
परम पुरुष की भक्ति दृढ़ावे । सुरतै नृप कर तहँ पहुँचावे ।।
तासों भक्ति करो चितलाई । छाड़ो दुर्मति औ चतुराई ||
तबही परम पुरुष को पाये । भव तरके जग बहुरि न आवे ।।
कहा कि पहले अंतर में साधु के प्रति प्रेम उत्पन्न करे, उनके चरण धोकर चरणामृत ले, उनकी सेवा करे । जो साधु सच्चे प्रेम की बात जानता हो, उसकी सेवा करो। वो ही परम-पुरुष की भक्ति में लगाकर वहाँ पहुँचा सकता है । उसी की भक्ति करो, तब ही परम-पुरुष को पाकर संसार से पार हो सकते हो। आगे धर्मदास जी ने पूछा-
सगुण भक्ति करे संसारा । निर्गुण योगेश्वर आधारा ।।
इन दोनों के पार बतावा । तुम कैसी विधि तहँ मन लावा ।।
सत्य बात मोहि कहो गुसाईं । केहि विधि सुरति लगाऊँ धाई ||
सतगुरु संशय देहु निवारी । मैं जाऊँ तुम्हरी बलिहारी ।।
सगुण निर्गुण भेद बताऊँ । तीसर न्यार मोहिं लखाऊँ ।।
तुम सत सत्य तुम्हारी बाता। मैं याचक तुम समरथ दाता ।।
कहा, हे साहिब! आम संसारी जीव सगुण भक्ति करता है, योगेश्वर
तक निर्गुण-भक्ति करते हैं, पर आप इन दोनों के पार बता रहे हैं; मुझे समझ नहीं आ रहा है कि वहाँ कैसे ध्यान लगाऊँ, कैसे वहाँ की भक्ति करूँ। मुझे सगुण और निर्गुण का भेद बताकर तीसरी न्यारी भक्ति बताओ। मैं जानता हूँ कि आप सत्य हैं और आपकी सब बातें भी सत्य ही हैं । फिर साहिब ने कहा-
सुन धर्मन समरथ है न्यारा । ताको नहीं जाने संसारा ।।
योगेश्वर वह गति नहिं पाई। सिद्ध साधक की कौन चलाई ||
भक्ति होय जगत में भारी । ध्रुव प्रह्लाद सदा अधिकारी ।।
सतयुग भक्ति करी ध्रुव राजा । पाँच वर्ष आयू तत भ्राजा ।।
निकसे गृह ते बाहर गयेऊ। नारद के उपदेशी भयेऊ ।।
छठें मास प्रकटे हरि आई। राज दिये वैकुण्ठ पठाई ।।
साठ हजार वर्ष दियो राजू । कुटुम सहित वैकुण्ठ विराजू ।।
एक दिवस जब प्रलय आई । तहाँ ते पुनि ये देह गिराई ।।
ऐसे भक्त भये जग माहीं । परम पुरुष गत पावत नाहीं ।।
कहा कि जो परम - पुरुष है, वो सबसे न्यारा है, उसे कोई नहीं जानता । योगेश्वर भी वो गति नहीं पा सकते, फिर सिद्ध, साधक आदि किस गिनती में हैं! संसार में भक्ति करने वाले बहुत हुए, पर परम - पुरुष का भेद किसी ने नहीं पाया, इसलिए संसार के आवागमन का चक्कर नहीं छूटा । धर्मदास जी ने पूछा— धर्मदास बूझे चित लाई | सतगुरु संशय देहु मिटाई || सर्गुण भक्त मुक्त नहिं होई । है वह एकहि या है दोई ||
की सर्गुण को निर्गुण कहिये । भिन्न भिन्न भेद मोहिं कहिये ।।
यह संसार कहाँ से आया । को है ब्रह्म अरु को है माया ।।
भक्ति भेद कहो मोहे स्वामी । तुम सब घट के अंतर्यामी ।।
जीव काज आये जगमाहीं । अब मोको कछु संशय नाहीं ।।
कहा कि क्या सगुण-भक्त मुक्त नहीं होता ! वो सगुण कोई दूसरा है या वही एक परमात्मा है। कृपया मुझे सगुण-निर्गुण का भेद अलग-अलग करके बताओ। यह संसार कहाँ से आया है, ब्रह्म कौन है और माया क्या है ! मुझे भक्ति का सारा भेद समझाकर कहो, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप जीवों का कल्याण करने के लिए ही संसार में आए हैं । तो साहिब ने आगे कहा-
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहो परकाशा ।।
आदि न अंत हती न माया । उत्पति प्रलय हती न काया।।
आदि ब्रह्म नहीं ओंकारा। नहीं निरंजन नहिं अवतारा ।।
दश अवतार न चौवीस रूपा । तब नहिं होता ज्योति स्वरूपा ।।
नहिं तब शून्य सुमेर न भारा । कूर्म न शेष धरे अवतारा ।।
अक्षर एक न ररंकारा । त्रिगुण रूप है नहिं विस्तारा ।।
शक्ति युक्ति न आदि भवानी । एक होय नहिं ज्ञान अज्ञानी ।।
नहीं है बीज नहीं ओंकारा । आदि अमी नहीं चंद न सूरा ।।
कहा कि मैं अपना भेद सुनाता हूँ, समझना । मैं तबसे हूँ जब आदि अंत कुछ भी नहीं था, माया नहीं थी । उत्पति नहीं थी, प्रलय नहीं थी, काया नहीं थी, ओंकार नहीं था, निरंजन नहीं था, उसके दस अवतार नहीं थे, आदि भवानी नहीं थीं, सूर्य-चाँद नहीं थे। परम-पुरुष का भेद देते हुए साहिब आगे धर्मदास को समझाते हैं-
पुरुष कहो तो पुरुषहि नाहीं । पुरुष हुवा आपा भू माहीं ।।
शब्द कहो तो शब्दहि नाहीं । शब्द होय माया के छाहीं ॥।
दो बिन होय न अधर अवाजा। कहो कहा यह काज अकाजा ।।
अमृत सागर वार न पारा । नहिं जानों केतिक विस्तारा ।।
तामें अधर भवन इक जागा । अक्षय नाम अक्षर इक लागा ।।
नाम कहो तो नाम न जाका। नाम धरा जो काल तिहि ताका ।।
है अनाम अक्षर के माहीं । निह अक्षर कोई जानत नाहीं ।।
धर्मदास तहँ बास हमारा। काल अकाल न पावे पारा।।
ताकी भक्ति करै जो कोई । भव ते छूटै जन्म न होई ।।
कहा कि यदि उस सत्ता को पुरुष कहा जाए तो वो पुरुष नहीं है, क्योंकि पुरुष तो स्वयं प्रकृति से हुआ है । फिर यदि उसे शब्द कहा जाए तो वो शब्द भी नहीं है, क्योंकि शब्द भी माया से ही उत्पन्न होता है । दो चीजें आपस में टकराती हैं, तभी शब्द उत्पन्न होता है | आवाज़ दो के बिना नहीं होती, इसलिए जहाँ द्वैत आ गया, वहाँ माया है । पर उस अमृत- सागर का कोई पार नहीं है । वो एक अक्षय लोक है, अक्षय नाम है, कभी मिटता नहीं है । पर यदि उसका कोई नाम कहा जाए तो उसका कोई नाम भी नहीं है, क्योंकि नाम
अक्षर की सीमा में होने से काल का नाम हुआ। वो अनाम है, वो नि: अक्षर है, उसे कोई नहीं जानता है । हे धर्मदास ! वहीं मेरा वास है; वहाँ काल भी नहीं पहुँच
सकता है । उसकी जो कोई भक्ति करता है, उसका फिर कभी जन्म नहीं होता । ।
पर अब यहाँ एक बात और हो गयी। सगुण या निर्गुण भक्त भी अपने को सद्गुरु समझने लग गये हैं । वे साहिब की मोहर लगाकर सांसारिक नाम का व्यापार करने लगे हैं । वे साहिब की वाणी तो ले रहे हैं, पर स्वयं तीन- लोक में ही अटके हुए हैं। लेकिन संतों ने तो इस तीन- लोक से परे एक चौथे अमर-लोक की बात की है। उन्होंने मनुष्य को समझाने का प्रयास किया है कि हे मनुष्य ! यह संसार काल का देश है, इससे ऊपर उठ और अपने देश में चल । वहाँ से फिर कभी भी इस नरक - कुण्ड में नहीं लौटना है । अमर - लोक में जाना ही सच्चे मोक्ष की प्राप्ति है । जो जीव सच्चे सद्गुरु की शरण में आ जाते हैं, वे ही सच्चे मोक्ष के अधिकारी बन पाते हैं जबकि अधिकतर सगुण- निर्गुण में ही उलझकर अपना अमोलक मानव-चोला झूठी मुक्तियों की बलि चढ़ा देते हैं। सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज ।
जीव खोय सब जायेंगे, तिहुँ पर काल का राज ।।
कमाई से परे सद्गुरु कृपा की बात कर रहे हैं
बहु बंधन ते बांधिया, एक विचारा जीव ।
जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥
कह रहे हैं कि जीव खुद अपनी ताक़त से नहीं छूट सकता है। क्योंकि बाँधने वाली ताक़त शक्तिशाली है । आप पढ़ते हैं कि शृंगी ऋषि की तपस्या भंग कर दी गयी। क्रोध ने भृगु ऋषि का तप भंग कर दिया।
क्रोध किये गति मुक्ति न होय ॥
यानी अन्दर में विवश करने वाले शत्रुओं ने तप भंग कर दिया। ये आए कहाँ से? कितनी सहज वाणी है कि जिन शक्तियों ने जकड़ा है, उनसे अपनी ताक़त से नहीं छूट सकता है।
जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥
यह अपनी ताक़त से नहीं छूटने वाला है। कुछ को बुरा लगा। वो कह
रहे हैं कि दान करो, कल्याण हो जायेगा । तीर्थ करो, कल्याण हो जायेगा । नि:संदेह जब उन्हें ठेस लगी तो विरोध हुआ साहिब का । स्वाभाविक भी है। साहिब ने कहा कि निरंजन का पॉवर जो अन्दर में है, वो अपनी ताक़त से पार नहीं होने देगा। आप कथाओं में सुनते भी हैं कि ऋषि-मुनियों ने बड़ी-बड़ी तपस्या की, पर फिर कहीं काम ने वश में कर लिया, कहीं क्रोध के वशीभूत हो गये । अगर इतनी तपस्या करके वो क्रोध से नहीं छूट सके, काम से नहीं छूट सके तो मन-माया के इतने भयंकर जाल से कैसे छूटेंगे ! काम तो मन का एक हाथ ही है । क्रोध तो मन का एक हाथ है। तभी तो कह रहे हैं-
कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा ।
गृह छोड़ भय सन्यासी, तऊ न पावत पारा ॥
तो अनुकंपता की बात आई । सद्गुरु की कृपा की बात आई । एक महात्मा ने कहा कि कैसे पार कर देगा सद्गुरु! मेरी समझ से परे है। सच है, उनकी समझ से परे की बात है । क्योंकि उनके पास यह ताक़त नहीं होगी । इसलिए समझ से परे है । साहिब कह रहे हैं-
इसके आगे भेद हमारा | जानाग कोई जाननहारा ॥
क्या गप है? नहीं। यानी योग का सूत्र है - क्रिया । इसलिए गुरु को महात्म नहीं दिया। पर संत महात्म दे रहे हैं । सब पंथों के लोग ये क्रियाएँ बता रहे हैं। पर संत मत नहीं है यह। संत-मत अलग है। भाई, पहले योग था, संत शब्द नहीं मिलता है । अब जो सगुण भक्ति कर रहा है, वो भी संत कह रहा है। संत- मत में सहजे सहज पाइये वाली बात है । वो कह रहा है कि गुरु पार कर देगा। वो कह रहे हैं कि पल में पार कर देगा । क्या किसी ऋषि, मुनि ने कहा एसा ? नहीं कहा। संतत्व गुरु के इर्द- गिर्द घूम रहा है। वो यह नहीं कह रहा कि रास्ता बताएगा; वो तो कह रहा है कि एक मिनट में पार कर देगा । निर्गुण तो कमाई की बात करेगा। यहाँ मतभेद खड़े हो जायेंगे । साहिब कह रहे हैं- कोटि जनम का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥ जो कमाई कह रहे हैं, भ्रमित हैं । हम दो चीज़ कह रहे हैं—गुरु का दर्शन और सेवा । इसलिए दो चीज़ों के इर्द-गिर्द घूम रही है संतों की धारा ।
हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक ।
तिसका पटतर ना तुला, संतन किया विवेक ॥
यह संत-मत लोप होता गया । ये निर्गुण-भक्ति वाले इस पर हावी होते गये। संतों के जाने के बाद कुछ महत्वांकाक्षी लोगों ने और उनके रिश्तेदारों ने अधिकार जमाए। पर संतमत को समझ न पाए। इसलिए अपनी निर्गुण-सगुण को भी मिला दिया, मिश्रित कर दिया। बस, ऐसी बात कर दी कि कोई ग्राहक वापिस न जाए। कोई कह रहा है कि जिसका नाम पहले जप रहे थे, वही जपो । अगर ऐसा ही है तो गुरु किसलिए किया जा रहा है ?
संत-मत पापुलर हुआ। पर उनके पास पारस सुरति नहीं है ।
पारस सुरति संत के पासा ।।
अगर परम-पुरुष से पारस सुरति नहीं मिली तो धोखा कर रहा है गुरु शिष्य से। क्योंकि तब अपने समान नहीं बना पायेगा । पारस में अरु संत में, तू बड़ो अन्तरो मान ।
वह लोहा कंचन करे, वह करिले आप समान ॥
गुरु को कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परणाम ।
कीट न जाने भृंग को, करिले आप समान ॥
ये शब्द बोल रहे हैं कि गुरु बड़ा है। ये गुरु के अस्तित्व को स्थापित कर रहे हैं। वो नाम देकर एक ताक़त आपमें प्रविष्ट कर देता है।
पुरुष शक्ति जब आन समाई । तब नहीं रोके काल कसाई ॥
तो साहिब ने खण्डन तो किया नहीं। वो कह रहे हैं कि जिन साधनों से पार होने की सोच रहे हैं, वो नाकाफ़ी हैं।
बिन सतगुरु बांचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ॥
तब ही काल के जाल से निकल सकोगे। वो ताक़तवर है । तो जो कह रहा है कि कमाई करो, तब परम तत्व की प्राप्ति होगी तो शंका आ जाती है। गोस्वामी जी भी कह रहे हैं-
यह सब साधन से न होई । तुम्हरी कृपा पाय कोई कोई ॥
साहिब भी कह रहे हैं-
अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को ॥
तुम अदा करो, अपने खजाने से। यह जीव अपनी ताक़त से छूटने में
सक्षम नहीं है । क्योंकि बेगाने देश में आकर उसका हंस बहुत बंधनों से बँधा है । और नाम - कमाई से या अपनी ताक़त से जीव कभी भी इन बंधनों से छूटकर उस अमर-लोक में नहीं पहुँच पायेगा। सगुण-निर्गुण दोनों भक्तियों में कमाई की बात है, गुरु का ज़्यादा महत्व नहीं है। इनमें गुरु केवल रास्ता बता देता है। अब साधक जितनी कमाई करता है, उतना ही ऊपर उठ पाता है । 'बेचारे साधन नहीं कर पाते, उनका जीवन बेकार चला जाता है । पर सत्य - भक्ति में कमाई का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि अपनी कमाई से जीव केवल तीन-लोक तक ही घूम सकता है, उससे आगे नहीं जा सकता। महाशून्य में बड़े- बड़े चुंबकीय आकर्षण हैं। जीव वहाँ अपने को भूल जाता है। ऐसे में सद्गुरु उसे होश में लाकर अपने में समाता है और अमर-लोक ले जाता है । अन्यथा करोड़ों जन्म तपस्या करते रहने पर भी वहाँ से पार नहीं हुआ जा सकता है। धीरे-धीरे दूषित होती गयी संतत्व की धारा । विहंगम चाल लोप होती गयी। मीन और पपील ही रह गयीं। पपील चींटी को कहते हैं और मीन मछली को। पपील मार्ग यानी चींटी की चाल से ब्रह्माण्ड की यात्रा करनी और मीन मार्ग यानी मछली की चाल से तीव्रता से ऊपर की ओर बढ़ना । पंच मुद्राएँ हैं । पहली दो मुद्राएँ पपील चाल कहलाती हैं जबकि बाकी तीन मीन चाल । पर विहंगम चाल केवल संत चलते हैं।
कहैं कबीर विहंगम चाल हमारी ।।
ब्रह्माण्डों की यात्रा में भी साधक शरीर से निकलता है; उसे आभास होता है कि चल रहा हूँ..... सपना नहीं होता है । पर गति नहीं होती है। 14 लोकों को भी देखता है। ये साधारण नहीं है यात्रा । पर अमर - लोक की यात्रा अपने बल पर नहीं होती है । लगता है कि कोई साथ चल रहा है। मुहम्मद साहिब कह रहे हैं— चला जब लोक को, शोक सब त्यागिया । हंस का रूप सतगुरू बनाई ।
कीट ज्यों भृंग को, पलट भृंगी करे ।
आप संग रंग ले, ले उड़ाई ॥
यानी यह जीव अपने बल पर नहीं जा सकता है । जब ऐसा होता है तो दसों दिशाओं में एक-साथ दिखता है ।
जिस भी जगह ध्यान लगाएँ, वहाँ का आकर्षण खींचता है। चुंबकीय ताकतों से वो खिंचता है; पर साधक की गुरू से बात नहीं होती है। जबकि विहंगम चाल में गुरु साथ होता है, उससे पूरी-पूरी बात होती है, सब स्थानों को बताते चलते हैं । इच्छा की तीव्र गति से चलना है तो गति तेज़ हो जाती है । इच्छा से ही बल मिलता है । जैसी इच्छा की, वैसे ही होता है । यदि रुकना चाहो तो वो भी हो जायेगा। जितनी गति चाहो, हो जायेगी । यह स्पीड लाजबाव होती है। इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। दसों मुकामों की यात्रा करता हुआ साधक चलता है । ब्रह्माण्ड के अंत में पहुँचता है तो उससे आगे अपनी ताक़त से किसी कीमत पर नहीं जा सकता है । यहाँ तक भी अपने योग से, परिश्रम से जाया जा सकता है। इसी से कहा- ररंकार खेचरी मुद्रा, दसवां ठिकाना । द्वार
ब्रह्मा विष्णु महेशादि ले, ररंकार को जाना॥
ररंकार तक अपनी ताक़त से जाया जा सकता है, आगे नहीं । जो विवरण मैंने दिये हैं, कोई भी नहीं दे सकता है । आप जब भी चाहें, शरीर से निकल सकते हैं। पर—
कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥
.....तो विहंगम में साधक बड़ी तीव्र गति से चलता है। जब निरंजन स्थान पर पहुँचता है तो वहाँ 4 करोड़ सूर्य का प्रकाश है, जिससे वो अपनी सुधि भूल जाता है। जैसे स्वप्न में मन अवस्था बदल देता है, ऐसे ही अवस्था बदल देता है । तब भूल जाता है। तभी सबने कहा- बेअंत .... बेअंत ..... बेअंत । वहाँ इतना आनन्द है कि सुधि नहीं रह जाती है । इतने गहन प्रकाश का स्रोत है, इसलिए ज्योति-स्वरूप कहा। इसी का वर्णन सब जगह है। यहाँ पर साधक की आत्मा को सद्गुरु अपने में समाविष्ट कर ले चलता है। वो पारदर्शी शरीर है; साधक सब देखता चलता है । जब शून्य पार हो जाता है तो फिर सद्गुरु उसे अपने वजूद से अलग करते हैं । वहाँ आत्मा प्रश्न पूछती है कि एक बात बताओ कि इतनी देर हम साथ-साथ चले, फिर आपने मुझे अपने में क्यों समाया था ? तो सद्गुरु कहते हैं कि वहाँ निरंजन का ज़ोर इतना है कि मेरे साथ होते तो भी वो खींच लेता। वो प्रभावित कर लेता, इसलिए मैं अपने में समाकर ले चलता हूँ। .....तो कोई, जो यह यात्रा किया हो और कोई कहे कि अपनी कमाई से गया तो उसे थोथा झूठ नहीं लगेगा क्या ? साहिब कह रहे हैं—
कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।
गृह छोड़ भये सन्यासी, कोऊ न पावत पारा॥
यानी उन्हें अमर-लोक का कोई भेद नहीं है, जो कह रहे हैं कि अपनी कमाई से जाया जा सकता है । वहाँ तो कोई कृत ही नहीं है । साहिब I कह रहे हैं-
अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को.....॥
न कुछ किया न कर सका, न करने योग शरीर ।
जो कुछ किया सो साहिब किया, भया कबीर कबीर ॥
....तो आगे सुरति का सागर आता है । जो ध्यान आपके शरीर में काम कर रहा है, उसी का सागर है वहाँ । आप सोचें कि पूरी दुनिया का काम ध्यान से हो रहा है और वहाँ इसका सागर है । इस आत्मा को वहाँ स्नान करवाया जाता है। वहीं मन छूटता है । कोई पानी में डुबकी नहीं लगानी है । अत्यन्त प्रकाश का स्रोत है और पल में अरबों बार घूमकर बाहर आए तो कैसा है ! ऐसी क्रिया से मन छूट जाता है और जब वो आत्मा परम-पुरुष के सम्मुख होती है तो उसमें 16 सूर्यों का प्रकाश आ जाता है । फिर वो परम चेतन हो जाती है। ..... तो बाद जब कभी भी वहाँ जाना होता है तो इस तरह से नहीं जाता है। बीच के रास्ते लोप हो जाते हैं। गुरु की ऐसी कृपा ! सोचो, यह अपनी कमाई से हो सकता है ! कभी नहीं । इसलिए साहिब की वाणी बार-बार चेताती हुई कह रही है- -
हरि कृपा जो होय तो, नहीं होय तो नाहिं ।
कहैं कबीर गुरु कृपा बिन, सकल बुद्धि बह जाहिं ।।
अनहद शब्द या 52 अक्षर से परे निःशब्द ( सार नाम )
की बात कर रहे हैं
इस नाम के बिना हृदय शुद्ध नहीं हो सकता है।
नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥
पर यह नाम वो नहीं है, जो संसार के लोगों ने समझ लिया। धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं-
धर्मदास कहै सुनो गोसाई । पुरुष नाम कहऊ समुझाई ॥
सहस्रनाम जो वेद बखाना । नेति नेति कह बहुरि निदाना ॥
कौन नाम को सुमिरन करई । कैसे सदा पुरुष चित धरई ॥
कैसे आवागमन मिटाई । क्षर निरअक्षर कह समुझाई ॥
कहा कि वेदों में जो हज़ारों नाम हैं, यह नाम उनमें से कोई है या फिर कोई और! आप जिस नाम के सुमिरन के लिए कह रहे हैं, वो कौन सा नाम है, मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरा आवागमन मिटे । आगे साहिब ने कहा—
सुनु धर्मनि तुम हंस पियारे । तुम्हरो काज सकल हम सारे ॥
सुमिरन आदि मैं तुम्हें सुनावों । सकल कामना तोर मिटावों ॥
नाम एक जो पुरुष को आही । अगम अपार पार नहिं जाही ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धावै ॥
आदि कहौं तो को पतिआई । अंत कहौं तो परलै जाई ॥
आदि अंत में वासा होई । निरअक्षर पावै जन सोई ॥
अक्षर कह सब जक्त बखानै । निरअक्षर को मर्म न जानै ॥
वेद, पुराण भी इस नाम का भेद नहीं जानते हैं । दुनिया तो 52 अक्षर की सीमा वाले नामों को ही जानती है । आज के महात्मा लोग भी यही नाम दे रहे हैं। ये सब नाम तो वेदों में दिये गये हज़ारों नामों में से हैं, पर साहिब कह रहे हैं-
नाम पार वेदन नहिं पावा । नेति नेति कह सब गुहरावा ॥
ऐसे तो सभी को 15-20 नाम पता होते हैं । यदि इन नामों में से कोई होता तो फिर संतों को सद्गुरु की महिमा गाने की ज़रूरत नहीं थी । फिर तो किसी बच्चे से भी नाम लिया जा सकता था । कैसा है यह नाम ? फिर वाणी से समझा रहे हैं-
कहा न जाई लिखा न जाई। बिन सतगुरु कोउ नाहीं पाई ॥
सतगुरु मिलै तो अगम लखावै । हंस अमी पीवत घर आवै॥
अंकुरी जीव कहे निर्बाना । पावत हंस लोक पहिचाना ॥
सुरतिवंत पावै निज वीरा । संग रहौं मैं दास कबीरा ॥
जो कोई हंस प्रवाना लेई । अग्र नाम सतगुरु कहि देई ॥
बिन सतगुरु कोई नाम न पावै । पूरा गुरु अकह समझावै॥
अकह नाम वह कहा न जाई। अकह कहि कहि गुरु समझाई॥
समुझत लोक परै पुनि चीन्हा । जाते लोक होइ लवलीना ॥
हरदम सुमिरै चित्त लगाई । लोक दीप में जाइ समाई ॥
अजर अमर होइ लोक सिधावै । चौरासी बंधन मुक्तावै॥
आवागमन ताहि नहिं भाई । जरा मरण का बीज नसाई ॥
वो नाम कहने में नहीं आता है; वाणी का विषय नहीं है। वो लिखने में भी नहीं आता है। वो अकह है। बिना सद्गुरु के उसे कोई नहीं पा सकता है। पूरा गुरु होगा, वही समझा सकता है । उसी नाम को पाकर जीव चौरासी के बंधन से छूटकर अमर-लोक में जा सकता है। यह नाम और सद्गुरु का इतना गहरा संबंध क्यों है ? क्योंकि यह नाम अलौकिक है और इसे केवल सच्चे संत-सद्गुरु से ही प्राप्त किया जा सकता है। यदि यह नाम सांसारिक नामों में से कोई होता तो फिर संतों ने सद्गुरु की इतनी महिमा नहीं गानी थी । यह नाम पोथियों में नहीं मिलेगा। क्योंकि यह नाम 52 अक्षर से परे एक सजीव वस्तु है।
गुरु सजीवन नाम बताए। जाके बल हंसा घर जाए ।।
आजकल के झूठे संत जो नाम दे रहे हैं, उनसे हमारी आत्मा अमर लोक में नहीं जा सकती है, क्योंकि ये नाम तो वाणी का विषय हैं, 52 अक्षर की सीमा में आ जाते हैं, इन्हें हम भी जानते हैं । इस तरह ये नाम तो सबके पास हैं। तभी तो साहिब सतर्क कर रहे हैं- -
कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय ।
मूल नाम जो गुप्त हैं, जाने बिरला कोय।।
संसार में करोड़ों नाम प्रचलित हैं, पर उनसे आप मुक्त नहीं हो सकते हैं । जो
सच्चा नाम है, वो गुप्त है; उसे कोई बिरला संत ही जानता है।
संतों के बिना इस मूल नाम (सजीव नाम) को नहीं पाया जा सकता है। चंदन अपनी महक स्वयं दूसरों तक पहुँचाने में समर्थ नहीं होता। सागर अपना जल स्वयं किसी को नहीं दे पाता। हवा ही चंदन की महक को अपने में समेटकर दूर-दूर तक ले जाती है और सारे वातावरण को सुवासित कर देती है । बादल जब सागर के जल को ऊपर ले जाकर बरसाते हैं तो पत्ता - पत्ता हरा हो जाता है, पपीहे प्रसन्न हो जाते हैं, मोर नाचने लगते हैं। इसी तरह संतों के बिना वो परमात्मा (परमपुरुष ) भी पंगु है।
साहिब के दरबार में, कर्ता केवल संत ।
कर्ता केवल संत, हुकुम में उनके साहिब ।।
संत-सद्गुरु ही परमात्म-तत्व को लाकर शिष्य के भीतर छोड़ते हैं । यही नाम कहलाता है । इस नाम के बिना कोई भी जीव संसार - सागर से पार नहीं हो सकता है । यही नाम अर्थात स्वयं परमात्मा जीव को इस संसार सागर से परे अमर-देश में ले जाता है । आगे फिर कह रहे हैं-
काल तिहकाल का भेद सुनाऊँ । धर्मदास मैं तोहि लखाऊँ ॥
हि अज्ञर का भेद निज पावै । निह अक्षर माहिं जाय समावै ॥
जो नहिं जान निअक्षर भेदा । ता महँ काल करत है छेदा ॥
निह अक्षर बिन काल न जीतै । यज्ञ दान के ता कर बीते ॥
योग यज्ञ तप काल पसारा । यज्ञ दान सब काल व्योहारा ॥
काल गति संसार है भाई । बिरला जन कोई लख पाई ॥
कह रहे हैं कि योग, यज्ञ, तप, दान आदि सब काल का व्यवहार है । जो निःअक्षर का भेद नहीं जानता, काल उसमें छेद कर सकता है। यानी वो अपूर्ण है, उसमें कमी है; काल कभी भी उसे अपना ग्रास बना सकता है। निः अक्षर के बिना काल को नहीं जीता जा सकता है, चाहे कोई कितने भी दान-पुण्य कर ले। 10वें द्वार से परे 11वें द्वार की बात कर रहे हैं कबीर साहिब से पहले संसार में 10वें द्वार तक की बात होती थी। साहिब ने संसार को आकर 11वें द्वार का अनुपम रहस्य दिया । वेदों में 10वें द्वार तक की बात है । इसलिए योगी लोक 10वें द्वार तक जाते थे जबकि योगेश्वर 10वें द्वार से निकलकर अनन्त ब्रह्माण्डों में घूम लेते थे; पर 11वें द्वार की ख़बर किसी को न थी । यदि आज के संतों को देखा जाए तो ना उन्हें सच्चे नाम का ज्ञान है और न ही 10वें द्वार का । फिर 11वें द्वार का ज्ञान होना तो बड़ी दूर की बात है । शरीर में नौ द्वार हैं। दो कानों के, दो आँखों के, दो नासिका के, एक मुख का तथा दो मल-मूत्र के । इस तरह शरीर में नौ द्वार हैं, जिनका ज्ञान सबको है। पर 10वें द्वार का भेद सभी को नहीं है। यह क्या है, समझते हैं । हमारे शरीर में इंगला और पिंगला नाड़ियों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी है । यही सुषुम्ना 10वें द्वार की ओर जाती है । हमारी नासिका में जो बायां
स्वर है, वो इंगला नाड़ी तथा जो दायां स्वर है, वो पिंगला नाड़ी कहलाती है । इनके मध्य में सुषुम्ना नाड़ी है, जो बंद पड़ी है । यह कफ से बंद है। हमने कभी इसका प्रयोग नहीं किया, इसलिए यह बंद है। यह शीश से सवा हाथ ऊपर तक जाती है। वहीं 10वां द्वार है । लेकिन सुषुम्ना 10वां द्वार नहीं है। वो तो 10वें द्वार तक जाने का एक माध्यम है। कुछ महात्मा लोग, जिन्हें 10वें द्वार का पूरा ज्ञान नहीं होता, उसे शीश के किसी एक विशिष्ट स्थान पर अंकित बताते हैं; लेकिन ऐसा नहीं है। बिलकुल नहीं । यदि यह किसी एक स्थान पर अंकित होता तो डॉ० या वैज्ञानिक लोग कभी का बता चुके होते। बिल्कुल बता चुके होते। इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि उनके पास बड़े आला यंत्र तथा माइक्रोस्कोप हैं और डॉ० लोग आप्रेश्न के मामले में भी बड़ी तरक्की पर हैं । वे ज़रूर शीश वाले 10वें द्वार को अपने छोटे-छोटे यंत्रों से खोल चुके होते और मानव को पूरा ब्रह्माण्ड दिखा चुके होते। लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ, क्योंकि यह 10वां द्वार किसी एक स्थान-विशेष पर अंकित नहीं है । इसका तो सृजन करना पड़ता है। खैर, छोड़ो, हम पहले 10वें द्वार का रहस्य देखते हैं। इसमें साधक प्रवेश कैसे करे ? यह कैसे खुले ?
इड़ा के घर पिंगला जाई, सुषुम्न नीर रहे ठहराई ॥
सुषुम्ना नाड़ी को खोलने के लिए वाणियों में बोला । सुरति के दण्ड से घेर मन पवन को । साहिब ने तो अत्यंत जनसाधारण की वाणी में कहा है। सुरति के सहारे पवन को ऊपर की ओर फेरो । पर जब मैं अन्य पंथों के लोगों से पूछता हूँ कि सुषुम्ना कैसे खुले तो कहते हैं कि यह नहीं बताना है । मैं कहता हूँ कि छुपाने वाली बात ही नहीं है । वो कहते हैं कि आगे का भेद नहीं देना है, गुरु जी ने मना किया है। यह तो वही बात हुई, जैसे किसी से पूछो कि पठानकोट जाने का रास्ता मालूम है ? कहे—हाँ । पूछो तो कहे कि सतवारी तक मेटाडोर से जाओ, आगे का देख लेना। तो इस तरह वो भी आगे चुप हो जाते हैं। बड़ी अटपटी बात लग रही है। तो यह कैसे खुले ? यह बंद पड़ी है। किससे पड़ी है बंद ? देखते हैं । शरीर के अन्दर बड़ी विविधता है । यहाँ रक्त भी है, मूत्र भी है, वीर्य भी है, मल का कोश भी है, पित्त का कोश भी है। इस तरह सुषुम्ना कफ़ से बंद पड़ी है। वहाँ
कफ़ ज़मा हुआ है। यह क्या है कफ ? कभी दमा हो जाता है तो कफ़ अधिक हो जाती है। कभी सर्दी-गर्मी से भी कफ़ हो जाती है । कफ़ का ठिकाना कहाँ है ? जहाँ इड़ा-पिंगला का बिंदू है, वहीं पर यह कफ़ बन रही है। इसलिए वो बंद है। निरंजन ने कफ़ से वो घाट बंद करके रखा है। यह कैसे खुले ? इंसान की एक समय में एक नाड़ी खुलती है । कभी इड़ा तो कभी पिंगला । दो स्वर उस दशा में चलते हैं जब शून्य से कफ़ हट जाता है। इस कफ़ ने सुषुम्ना को बंद करके रखा हुआ है । अब यह खोलें कैसे ?
मुर्शिदे कामिल से मिल, सिदक औ सबूरी से तकी ।
वो तुझे देगा फहम, दिलबर पे जाने के लिए॥
हमारी आत्मा प्राणों में रमी है। इन प्राणों में प्रमुख चार प्राण हैं । हरेक के चार उपप्राण हैं । प्राण यानी वायु । ये प्राण शरीर की नौ नाड़ियों और उनसे 72 कोठों में रमे हैं। जो चल रहे हैं, वायु का खेल है; जो बोल रहे हैं, वो भी वायु का खेल है; जो सुन रहे हैं, वो भी वायु का खेल है; जो भी काम कर रहे हैं, वायु है। ये 10 वायुएँ शरीर के विभिन्न हिस्सों में रहकर अलग-अलग काम कर रही हैं । अपान, समान, उदान आदि 10 वायुएँ हैं । जिस तरह बिजली तार पर चलती है, इसी तरह यह आत्मा प्राणों में समाई है | ये 10 प्राण हैं। ये कहाँ हैं? अपान वायु गुदा स्थान पर है। पेट से ख़ारिज करता है। यह भोजन को पकाती है। बड़ी ज़रूरी है । कुछ भी शरीर में फ़िज़ूल नहीं है । मलद्वार से निकलती है। यह है - ही है । जैसे गाड़ी चलती है तो फ्यूल-निकास के लिए पाइप लगी है। तो यह वायु जहाँ पहुँचेगी, नुक़सान करेगी। अगर हृदय में पहुँची तो हार्ट-अटैक हो सकता है, अगर सिर में पहुँची तो डिस्टर्ब कर सकती है। फिर उदान वायु कलेजे में रहती है। तीसरी प्राण-वायु हृदय में रहती है। चौथी सर्वतनव्याम वायु जोड़ों में रहती है । धनंजय वायु भुजाओं में और छाती में रहती है। लकबा भी वायु - विकार है । और समान वायु शरीर को मोटा होने से बचाती है। नाग वायु कंठ में रहती है। यह नींद लाती है। उबासी लेते हैं तो कंठ सिकुड़ता है। यही हवा नींद लाती है। यह बिगड़ गयी तो नींद नहीं आयेगी। किरकिल वायु नाक के अग्रभाग में रहती है। यह ट्रैफिक पुलिस की तरह काम करती है, बाकी वायुओं को मिलने नहीं देती है । इस प्रकार से 10 वायुएँ शरीर में अलग-अलग काम कर रही हैं । आत्मा इनमें रमी है । यह स्वांस कहाँ से चल रही है ?
शून्य से स्वांसा उठत है, नाभि दल में आय॥
यह शून्य से उठती है । मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय | जब भी चाहो, शरीर को खाली करके बाहर निकल सकते हैं। यह नहीं कि कोठरी खाली करवाई जायेगी, तभी निकलेंगे। खुद भी निकल सकते हैं। राजा जनक जानते थे यह विद्या । तभी विदेही कहे जाते थे । पर इस क्रिया से ब्रह्माण्ड के आगे नहीं जा सकते हैं। तो स्वांसा नाभि में जाती है तो नहीं जाने देते हैं । आजकल बिजली की कटौती है। पहले किसी मौहल्ले में देते हैं, फिर वहीं से बदलकर दूसरी जगह कर देते हैं । इसी प्रकार- पवन को पलट कर शून्य में घर किया । जब साहिब और गोरख की गोष्ठी हुई तो गोरखनाथ ने साहिब से पूछा- कबीर काया मध्ये सार क्या ?
साहिब ने कहा— काया मध्ये स्वांसा सार ॥
गोरखनाथ– कहाँ से स्वांसा उठत है, कहाँ को है जाय ॥
साहिब - शून्य से स्वांसा उठत है, नाभि दल में आय॥
गोरख - हाथ पाँव इसके नहीं, कैसे पकड़ी जाय ॥
साहिब— हाथ पाँव इसके नहीं, यह सुरति से पकड़ी जाय ॥
इसे मोड़ा जा सकता है । टॉयर में भी तो हवा भरी जाती है। यह सिस्टम है, जिससे हवा को इकट्ठा किया । इस तरह कह रहे हैं
सुरति से पकड़ी जाय ॥
आगे साहिब कह रहे हैं- सुरति के दण्ड से, घेर मन पवन को । फेर उलटा
चले ॥
सुरति रूपी डण्डे से मन और पवन को घेर कर इसका फेर उलट दो । ... फेर उलटा चले । धर औ अधर विच ध्यान लावै ।
कहैं कबीर सो संत निर्भय हुआ, जन्म औ मरण का भ्रम भानै ॥
इसी को गोस्वामी जी ने रामायण में कहा-
उलटा जाप जपा जब जाना । बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ॥
लोग सोचते हैं कि 'मरा' ' मरा' जपा था । नहीं, यह तो उलटा जाप था। पलटू साहिब कह रहे हैं-
अरे हाँ रे पलटू, ज्ञान भूमि के बीच में चलत हैं उलटी स्वांसा ॥
साहिब कह रहे हैं—
पवन को पलट कर, शून्य में घर किया ।
धर में अधर भरपूर देखा ॥
कहैं कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्ये दीदार देखा ॥
सुषुमना कैसे खुले ? यह बंद है कफ़ से । शरीर में कफ, पित्त और वायु हैं। साहिब कह रहे हैं-
गगन की गुफा को पवन से साफ कर ॥
, यह गुफा कौन सी है ? दम ही दम में ले अजूबा 11 कैसे साफ़ करें ? पंखा लगाना है क्या ? यह गगन की गुफा पवन से कैसे साफ़ करें ? वाणियों में लिखा है, पर पूरा गुरु न समझाए तो समझ नहीं आयेगी। यह स्वाँस, नाम एक करना है। स्वाँस में गर्मी है। आप दौड़ते हैं तो शरीर गर्म हो जाता है। गर्मी से कफ़ पिघलता है । इस तरह स्वाँस - नाम एक करने से स्वाँसा की गर्मी से कफ़ पिघलने लगता है । जब भी बंकनाल से कफ़ पिघलेगा तो एक आवाज़ आयेगी, जैसे नाखून बजाते हैं। ऐसी बारीक आवाज़ आयेगी। कफ़ को भेदती हुई वायु ऊपर जायेगी। यदि साधक यह क्रिया कर रहा है तो गुरु का सान्निध्य चाहिए। जैसे- जैसे स्वाँसा उर्द्धमुख होती जायेगी, साधक को गुरु के सान्निध्य की ज़रूरत पड़ेगी। साधक को लगेगा कि कोई ताक़त ऊपर की ओर खींच रही है । स्वाँसा की गर्मी से कफ़ पिघल जाता है । पर मन कभी नहीं चाहता है कि आप वहाँ पहुँच पाएँ। क्योंकि जानता है कि यदि पहुँच गया तो वो समझ में आ जायेगा और जगत ख़त्म हो जायेगा । इसलिए मन ने भ्रमित किया है।
सुषुम्न मध्ये बसे निरंजन, मूँधा दसवाँ द्वारा ।
उसके ऊपर मकरतार है, चढ़ो सम्हार सम्हारा ॥
मन इतने स्टॉइल से आपको ले जायेगा कि पता भी नहीं चलेगा। ऐसे में साधक क्या कर सकता है ? कभी भयभीत हो जाता है। फौरन मन ध्यान को कहीं ले जाता है। किसी चीज़ का दुख है तो वहाँ ले जायेगा। इतने में जो पवन
ऊपर चढ़ी थी, नाभि में आ जाती है । कोई साढ़ियाँ चढ़ता जा रहा हो, चढ़ता जा रहा हो और ऊपर जाकर गिर पड़े तो क्या हाल होगा ! इस तरह साधक नीचे गिर पड़ता है। इसलिए सावधान रहना है। धीरे-धीरे आनन्द भी आने लगता है। ध्यान हट गया तो कुछ भी नहीं है । मन - माया की तरंगें हैं । लहरें उठती हैं। मन तरंगें उठाकर अन्य - अन्य चीज़ों में ले जाता है । फिर बंदा सोचता है कि गुरु की मेहर नहीं है। मन की कोशिश है कि उस बिंदू तक आने नहीं देता है । उसका प्रयास रहता है कि संसार - सागर में ही भटकता रहे। वो अनेक तरह के भाव अन्दर में लाता है और भटका देता है । पर यदि साधक एकाग्र रहे तो स्वाँसा सिमटती जाती है। मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय |
ऐसी मरनी न मुआ, बहुरि न मरना होय ॥
साहिब कह रहे हैं—
जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द ।
कब मरहूँ कब पाउहूँ, पूरन परमानन्द॥
कभी-कभी लगता है कि मौत वाली हालत हो गयी है। मुट्ठी बंद करने लगो तो बंद नहीं होती है। कुछ आकर कहते भी हैं कि डर लग गया। सुषुमना में सभी वायुएँ समाती हैं, तभी जाकर वो खुलती है। कफ़ हट जाता है । कुछ कहते हैं कि बड़ी मौज थी, पर फिर गुम हो गयी । वहाँ कुछ नहीं सोचना है ।
मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मरतबा चाहे ।
कि दाना खाक में मिलकर, गुले गुलज़ार होता है ॥
पलटू साहिब कह रहे हैं-
पलटू पहले मर रहा, पाछे मुआ जगत ॥
यह है - जीते-जी मरना । तो धीरे-धीरे स्वाँसा सिमटती जाती है। मुश्किल मन को लगता है । कोई दौड़ना भी नहीं है, तैरना भी नहीं है, केवल बैठना ही है- एकाग्रता से । साधक को धीरे-धीरे लगता है कि शरीर ही नहीं है। फौरन कल्पना करने लगता है कि भटक तो नहीं गये ! मन ऐसा चिंतन भी करवाता है। सोचता है कि मरने लगा हूँ । ये शंकाएँ उत्पन्न होती हैं। मन की कशिश होती है कि ध्यान को हटा दे। धीरे-धीरे एकाग्र होता जायेगा । शरीर पथरा जायेगा। साधक फौरन शरीर को ढूँढ़ने लगता है।
मृतक होय के पावे संता ॥
ऐसा लगेगा कि कुछ भी नहीं रहे हैं । जीवन की इच्छाएँ मण्डराने लगती हैं। कुछ तो वापिस आने के लिए मचलने लगते हैं। अगर रुकता है तो धीरे-धीरे स्वाँसा सिमटती जाती है । लगेगा कि
कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥
पाँव भी नहीं हिल सकता है । मन कहता है कि स्वाँसा कहाँ जा रही है। वो
बड़ी भ्रांतियाँ उत्पन्न करता है । इच्छा, कल्पना आदि में भटका देता है । इसी ने
10वाँ द्वार रोका है ताकि निकल न पाए।
गफलत नहीं तहाँ होशियार देखना ॥
यहाँ लग्न की ज़रूरत है ।
जहँ खोजा तहँ पाइया, गहरे पानी पैठ ॥
धीरे-धीरे पता चलने लगता है कि मैं तो शरीर नहीं हूँ। कुछ आश्चर्य भी लगने लगता है। यह सब चेतन अवस्था में हो रहा होता है; लगता है कि कोई चेतन चीज़ सिमट रही है। दिखती नहीं है, पर लगता है कि हूँ । मन बहुत भटकायेगा, कहेगा कि टाँगें सीज़ हो गयी हैं । कहेगा कि
गहरे अँधकार में जा रहे हो । सहज जन जानो साईं की प्रीत ॥
मन की कोशिश होती है कि पलट । कई बार तो पूरा जीवन भी लग
जाता है। तहाँ सिलहली गैल ॥
स्वाँसा में भी अटके हैं । यह लेना भी भ्रम है। धीरे-धीरे स्वाँस शरीर से सवा हाथ ऊपर अष्टम-चक्र तक पहुँच जाती है। वहीं जीवन - शक्ति है।
वहाँ तक खिंचती है। सुरति कमल सतगुरु को वासा ॥
धीरे-धीरे एकाग्र हो जाता है । मन कहता है कि पक्के मर चुके हैं । कहता है कि स्वाँसा भी नहीं है | बहुत शातिर है मन । इसी ने भ्रमित किया है।
जीव के संग मन काल रहाई । अज्ञानी नर जानत नाहीं ॥
एक शून्य बन जाता है। फील होता है कि कुछ हूँ ।
पवन को पलट कर, शून्य में घर किया, धर में अधर भरपूर देखा ॥
कहैं कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्ये दीदार देखा ॥
यहाँ एक नुकते में गल मुकती है। इस पर साहिब कह रहे हैं- खसखस के दाने के अन्दर, शहर खुदा का बसता है । कस्त करे ऐनों के तिल में, वहीं से उसका रस्ता है ।
रूह रहकाने में ठहराए, सोइ मुकुर में दस्ता है ।
पर बिन मेहर मुर्शिद के, तू नाहक में ही पचता है ॥
इसी के लिए कह रहे हैं-