करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंत-सद्गुरु ही परमात्म-तत्व को लाकर शिष्य के भीतर छोड़ते हैं । यही नाम कहलाता है । इस नाम के बिना कोई भी जीव संसार - सागर से पार नहीं हो सकता है । यही नाम अर्थात स्वयं परमात्मा जीव को इस संसार सागर से परे अमर-देश में ले जाता है । आगे फिर कह रहे हैं-
काल तिहकाल का भेद सुनाऊँ । धर्मदास मैं तोहि लखाऊँ ॥
हि अज्ञर का भेद निज पावै । निह अक्षर माहिं जाय समावै ॥
जो नहिं जान निअक्षर भेदा । ता महँ काल करत है छेदा ॥
निह अक्षर बिन काल न जीतै । यज्ञ दान के ता कर बीते ॥
योग यज्ञ तप काल पसारा । यज्ञ दान सब काल व्योहारा ॥
काल गति संसार है भाई । बिरला जन कोई लख पाई ॥
कह रहे हैं कि योग, यज्ञ, तप, दान आदि सब काल का व्यवहार है । जो निःअक्षर का भेद नहीं जानता, काल उसमें छेद कर सकता है। यानी वो अपूर्ण है, उसमें कमी है; काल कभी भी उसे अपना ग्रास बना सकता है। निः अक्षर के बिना काल को नहीं जीता जा सकता है, चाहे कोई कितने भी दान-पुण्य कर ले। 10वें द्वार से परे 11वें द्वार की बात कर रहे हैं कबीर साहिब से पहले संसार में 10वें द्वार तक की बात होती थी। साहिब ने संसार को आकर 11वें द्वार का अनुपम रहस्य दिया । वेदों में 10वें द्वार तक की बात है । इसलिए योगी लोक 10वें द्वार तक जाते थे जबकि योगेश्वर 10वें द्वार से निकलकर अनन्त ब्रह्माण्डों में घूम लेते थे; पर 11वें द्वार की ख़बर किसी को न थी । यदि आज के संतों को देखा जाए तो ना उन्हें सच्चे नाम का ज्ञान है और न ही 10वें द्वार का । फिर 11वें द्वार का ज्ञान होना तो बड़ी दूर की बात है । शरीर में नौ द्वार हैं। दो कानों के, दो आँखों के, दो नासिका के, एक मुख का तथा दो मल-मूत्र के । इस तरह शरीर में नौ द्वार हैं, जिनका ज्ञान सबको है। पर 10वें द्वार का भेद सभी को नहीं है। यह क्या है, समझते हैं । हमारे शरीर में इंगला और पिंगला नाड़ियों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी है । यही सुषुम्ना 10वें द्वार की ओर जाती है । हमारी नासिका में जो बायां