भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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हरदम सुमिरै चित्त लगाई । लोक दीप में जाइ समाई ॥

अजर अमर होइ लोक सिधावै । चौरासी बंधन मुक्तावै॥

आवागमन ताहि नहिं भाई । जरा मरण का बीज नसाई ॥

वो नाम कहने में नहीं आता है; वाणी का विषय नहीं है। वो लिखने में भी नहीं आता है। वो अकह है। बिना सद्गुरु के उसे कोई नहीं पा सकता है। पूरा गुरु होगा, वही समझा सकता है । उसी नाम को पाकर जीव चौरासी के बंधन से छूटकर अमर-लोक में जा सकता है। यह नाम और सद्गुरु का इतना गहरा संबंध क्यों है ? क्योंकि यह नाम अलौकिक है और इसे केवल सच्चे संत-सद्गुरु से ही प्राप्त किया जा सकता है। यदि यह नाम सांसारिक नामों में से कोई होता तो फिर संतों ने सद्गुरु की इतनी महिमा नहीं गानी थी । यह नाम पोथियों में नहीं मिलेगा। क्योंकि यह नाम 52 अक्षर से परे एक सजीव वस्तु है।

गुरु सजीवन नाम बताए। जाके बल हंसा घर जाए ।।

आजकल के झूठे संत जो नाम दे रहे हैं, उनसे हमारी आत्मा अमर लोक में नहीं जा सकती है, क्योंकि ये नाम तो वाणी का विषय हैं, 52 अक्षर की सीमा में आ जाते हैं, इन्हें हम भी जानते हैं । इस तरह ये नाम तो सबके पास हैं। तभी तो साहिब सतर्क कर रहे हैं- -

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय ।

मूल नाम जो गुप्त हैं, जाने बिरला कोय।।

संसार में करोड़ों नाम प्रचलित हैं, पर उनसे आप मुक्त नहीं हो सकते हैं । जो

सच्चा नाम है, वो गुप्त है; उसे कोई बिरला संत ही जानता है।

संतों के बिना इस मूल नाम (सजीव नाम) को नहीं पाया जा सकता है। चंदन अपनी महक स्वयं दूसरों तक पहुँचाने में समर्थ नहीं होता। सागर अपना जल स्वयं किसी को नहीं दे पाता। हवा ही चंदन की महक को अपने में समेटकर दूर-दूर तक ले जाती है और सारे वातावरण को सुवासित कर देती है । बादल जब सागर के जल को ऊपर ले जाकर बरसाते हैं तो पत्ता - पत्ता हरा हो जाता है, पपीहे प्रसन्न हो जाते हैं, मोर नाचने लगते हैं। इसी तरह संतों के बिना वो परमात्मा (परमपुरुष ) भी पंगु है।

साहिब के दरबार में, कर्ता केवल संत ।

कर्ता केवल संत, हुकुम में उनके साहिब ।।