भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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कौन नाम को सुमिरन करई । कैसे सदा पुरुष चित धरई ॥

कैसे आवागमन मिटाई । क्षर निरअक्षर कह समुझाई ॥

कहा कि वेदों में जो हज़ारों नाम हैं, यह नाम उनमें से कोई है या फिर कोई और! आप जिस नाम के सुमिरन के लिए कह रहे हैं, वो कौन सा नाम है, मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरा आवागमन मिटे । आगे साहिब ने कहा—

सुनु धर्मनि तुम हंस पियारे । तुम्हरो काज सकल हम सारे ॥

सुमिरन आदि मैं तुम्हें सुनावों । सकल कामना तोर मिटावों ॥

नाम एक जो पुरुष को आही । अगम अपार पार नहिं जाही ॥

वेद पुराण पार नहिं पावै । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धावै ॥

आदि कहौं तो को पतिआई । अंत कहौं तो परलै जाई ॥

आदि अंत में वासा होई । निरअक्षर पावै जन सोई ॥

अक्षर कह सब जक्त बखानै । निरअक्षर को मर्म न जानै ॥

वेद, पुराण भी इस नाम का भेद नहीं जानते हैं । दुनिया तो 52 अक्षर की सीमा वाले नामों को ही जानती है । आज के महात्मा लोग भी यही नाम दे रहे हैं। ये सब नाम तो वेदों में दिये गये हज़ारों नामों में से हैं, पर साहिब कह रहे हैं-

नाम पार वेदन नहिं पावा । नेति नेति कह सब गुहरावा ॥

ऐसे तो सभी को 15-20 नाम पता होते हैं । यदि इन नामों में से कोई होता तो फिर संतों को सद्गुरु की महिमा गाने की ज़रूरत नहीं थी । फिर तो किसी बच्चे से भी नाम लिया जा सकता था । कैसा है यह नाम ? फिर वाणी से समझा रहे हैं-

कहा न जाई लिखा न जाई। बिन सतगुरु कोउ नाहीं पाई ॥

सतगुरु मिलै तो अगम लखावै । हंस अमी पीवत घर आवै॥

अंकुरी जीव कहे निर्बाना । पावत हंस लोक पहिचाना ॥

सुरतिवंत पावै निज वीरा । संग रहौं मैं दास कबीरा ॥

जो कोई हंस प्रवाना लेई । अग्र नाम सतगुरु कहि देई ॥

बिन सतगुरु कोई नाम न पावै । पूरा गुरु अकह समझावै॥

अकह नाम वह कहा न जाई। अकह कहि कहि गुरु समझाई॥

समुझत लोक परै पुनि चीन्हा । जाते लोक होइ लवलीना ॥