भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गृह छोड़ भये सन्यासी, कोऊ न पावत पारा॥

यानी उन्हें अमर-लोक का कोई भेद नहीं है, जो कह रहे हैं कि अपनी कमाई से जाया जा सकता है । वहाँ तो कोई कृत ही नहीं है । साहिब I कह रहे हैं-

अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को.....॥

न कुछ किया न कर सका, न करने योग शरीर ।

जो कुछ किया सो साहिब किया, भया कबीर कबीर ॥

....तो आगे सुरति का सागर आता है । जो ध्यान आपके शरीर में काम कर रहा है, उसी का सागर है वहाँ । आप सोचें कि पूरी दुनिया का काम ध्यान से हो रहा है और वहाँ इसका सागर है । इस आत्मा को वहाँ स्नान करवाया जाता है। वहीं मन छूटता है । कोई पानी में डुबकी नहीं लगानी है । अत्यन्त प्रकाश का स्रोत है और पल में अरबों बार घूमकर बाहर आए तो कैसा है ! ऐसी क्रिया से मन छूट जाता है और जब वो आत्मा परम-पुरुष के सम्मुख होती है तो उसमें 16 सूर्यों का प्रकाश आ जाता है । फिर वो परम चेतन हो जाती है। ..... तो बाद जब कभी भी वहाँ जाना होता है तो इस तरह से नहीं जाता है। बीच के रास्ते लोप हो जाते हैं। गुरु की ऐसी कृपा ! सोचो, यह अपनी कमाई से हो सकता है ! कभी नहीं । इसलिए साहिब की वाणी बार-बार चेताती हुई कह रही है- -

हरि कृपा जो होय तो, नहीं होय तो नाहिं ।

कहैं कबीर गुरु कृपा बिन, सकल बुद्धि बह जाहिं ।।

अनहद शब्द या 52 अक्षर से परे निःशब्द ( सार नाम )

की बात कर रहे हैं

इस नाम के बिना हृदय शुद्ध नहीं हो सकता है।

नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥

पर यह नाम वो नहीं है, जो संसार के लोगों ने समझ लिया। धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं-

धर्मदास कहै सुनो गोसाई । पुरुष नाम कहऊ समुझाई ॥

सहस्रनाम जो वेद बखाना । नेति नेति कह बहुरि निदाना ॥