करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐसा लगेगा कि कुछ भी नहीं रहे हैं । जीवन की इच्छाएँ मण्डराने लगती हैं। कुछ तो वापिस आने के लिए मचलने लगते हैं। अगर रुकता है तो धीरे-धीरे स्वाँसा सिमटती जाती है । लगेगा कि
कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥
पाँव भी नहीं हिल सकता है । मन कहता है कि स्वाँसा कहाँ जा रही है। वो
बड़ी भ्रांतियाँ उत्पन्न करता है । इच्छा, कल्पना आदि में भटका देता है । इसी ने
10वाँ द्वार रोका है ताकि निकल न पाए।
गफलत नहीं तहाँ होशियार देखना ॥
यहाँ लग्न की ज़रूरत है ।
जहँ खोजा तहँ पाइया, गहरे पानी पैठ ॥
धीरे-धीरे पता चलने लगता है कि मैं तो शरीर नहीं हूँ। कुछ आश्चर्य भी लगने लगता है। यह सब चेतन अवस्था में हो रहा होता है; लगता है कि कोई चेतन चीज़ सिमट रही है। दिखती नहीं है, पर लगता है कि हूँ । मन बहुत भटकायेगा, कहेगा कि टाँगें सीज़ हो गयी हैं । कहेगा कि
गहरे अँधकार में जा रहे हो । सहज जन जानो साईं की प्रीत ॥
मन की कोशिश होती है कि पलट । कई बार तो पूरा जीवन भी लग
जाता है। तहाँ सिलहली गैल ॥
स्वाँसा में भी अटके हैं । यह लेना भी भ्रम है। धीरे-धीरे स्वाँस शरीर से सवा हाथ ऊपर अष्टम-चक्र तक पहुँच जाती है। वहीं जीवन - शक्ति है।
वहाँ तक खिंचती है। सुरति कमल सतगुरु को वासा ॥
धीरे-धीरे एकाग्र हो जाता है । मन कहता है कि पक्के मर चुके हैं । कहता है कि स्वाँसा भी नहीं है | बहुत शातिर है मन । इसी ने भ्रमित किया है।
जीव के संग मन काल रहाई । अज्ञानी नर जानत नाहीं ॥
एक शून्य बन जाता है। फील होता है कि कुछ हूँ ।
पवन को पलट कर, शून्य में घर किया, धर में अधर भरपूर देखा ॥
कहैं कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्ये दीदार देखा ॥
यहाँ एक नुकते में गल मुकती है। इस पर साहिब कह रहे हैं- खसखस के दाने के अन्दर, शहर खुदा का बसता है । कस्त करे ऐनों के तिल में, वहीं से उसका रस्ता है ।
रूह रहकाने में ठहराए, सोइ मुकुर में दस्ता है ।
पर बिन मेहर मुर्शिद के, तू नाहक में ही पचता है ॥
इसी के लिए कह रहे हैं-