भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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शून्य महल की फेरी देही, सो वैरागी पक्का होई ॥

जब जीरो पलट जाती है तो प्रज्ञावस्था में चला जाता है। बाकी कोई खिड़की नहीं खुलती है । ऐसा होता तो वैज्ञानिकों ने कभी का बता देना था। यह हुआ 10वाँ द्वार खुलना । कल्पनाओं से परे यह सत्य है। तो अब साधक को पता चल गया कि कैसे जाना है । पर कभी एक बार जाकर भी दुबारा नहीं पहुँच पाता है। जैसे कभी कहीं जाकर भी तो आप भूल जाते हैं । जब रोज़ आना जाना रहता है तो बीच के पड़ाव भी याद रहते हैं । इस तरह महापुरुष तो आते-जाते रहते हैं । तो यहाँ से निकलने पर एक शरीर मिलता है। एक रूहानी सफ़र शुरू हो जाता है । कभी लेटे-लेटे भी हो जाता है। महापुरुषों ने सफ़र किया। साहिब कह रहे हैं- खेल ब्रह्माण्ड का, पिण्ड में देखिया, जगत की भ्रमना दूर भागी ।

बाहरा भीतरा एक आकाशवत, सुषुम्ना डोर तहाँ पलट लागी ॥

इस प्रकार साधक आंतरिक लोकों का भ्रमण करने के बाद पुनः अपने शरीर में वापिस आ जाता है, क्योंकि 10वें द्वार से चले जाने पर भी एक अंश हमारे शरीर में रहता है, इसलिए साधक वापिस आ जाता है । आओ, अब चलते हैं 11वें द्वार की ओर । कहाँ है यह? कैसे प्रवेश करें इसमें? नौ द्वारे संसार सब, दसवें योगी साध ।

एकादश खिड़की बनी, जानत संत सुजान।।

कबीर साहिब से पहले 11वें द्वार की ख़बर किसी को नहीं थी । इसी 11वें द्वार का संबंध सत्य - भक्ति से है, क्योंकि इसमें से निकल जाने पर आत्मा अपने सही मुकाम पर पहुँच जाती है । उसके बाद उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है कि पुनः शरीर में वापिस आए या नहीं । यह 11वां द्वार हमारी सुरति के अन्दर है । अब सवाल यह है कि यह खुले कैसे ? यह गुरु- कृपा से खुलता है । मात्र गुरु- कृपा से । करोड़ों साल तपस्या करते रहने पर भी यह नहीं खुल सकता । यही कारण है कि बड़े - बड़े योगी भी 10वें द्वार तक ही रह गये । यह अपने ज़ोर से नहीं खुलता। जैसे डॉ० अपना ऑप्रेशन स्वयं नहीं कर सकता, इसी तरह बिना सद्गुरु के यह काम नहीं हो सकता। जब गुरु और शिष्य में एकरसता आ जाती है, तब यह काम पूरा हो जाता है। तभी तो साहिब कह रहे हैं-

तीनों त्रिधारा बनीं, आगे गंगा गुरु शिष्य और ईश्वर, मिल कीना भक्ति विवेक । एक ।।