करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंऊपर चढ़ी थी, नाभि में आ जाती है । कोई साढ़ियाँ चढ़ता जा रहा हो, चढ़ता जा रहा हो और ऊपर जाकर गिर पड़े तो क्या हाल होगा ! इस तरह साधक नीचे गिर पड़ता है। इसलिए सावधान रहना है। धीरे-धीरे आनन्द भी आने लगता है। ध्यान हट गया तो कुछ भी नहीं है । मन - माया की तरंगें हैं । लहरें उठती हैं। मन तरंगें उठाकर अन्य - अन्य चीज़ों में ले जाता है । फिर बंदा सोचता है कि गुरु की मेहर नहीं है। मन की कोशिश है कि उस बिंदू तक आने नहीं देता है । उसका प्रयास रहता है कि संसार - सागर में ही भटकता रहे। वो अनेक तरह के भाव अन्दर में लाता है और भटका देता है । पर यदि साधक एकाग्र रहे तो स्वाँसा सिमटती जाती है। मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय |
ऐसी मरनी न मुआ, बहुरि न मरना होय ॥
साहिब कह रहे हैं—
जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द ।
कब मरहूँ कब पाउहूँ, पूरन परमानन्द॥
कभी-कभी लगता है कि मौत वाली हालत हो गयी है। मुट्ठी बंद करने लगो तो बंद नहीं होती है। कुछ आकर कहते भी हैं कि डर लग गया। सुषुमना में सभी वायुएँ समाती हैं, तभी जाकर वो खुलती है। कफ़ हट जाता है । कुछ कहते हैं कि बड़ी मौज थी, पर फिर गुम हो गयी । वहाँ कुछ नहीं सोचना है ।
मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मरतबा चाहे ।
कि दाना खाक में मिलकर, गुले गुलज़ार होता है ॥
पलटू साहिब कह रहे हैं-
पलटू पहले मर रहा, पाछे मुआ जगत ॥
यह है - जीते-जी मरना । तो धीरे-धीरे स्वाँसा सिमटती जाती है। मुश्किल मन को लगता है । कोई दौड़ना भी नहीं है, तैरना भी नहीं है, केवल बैठना ही है- एकाग्रता से । साधक को धीरे-धीरे लगता है कि शरीर ही नहीं है। फौरन कल्पना करने लगता है कि भटक तो नहीं गये ! मन ऐसा चिंतन भी करवाता है। सोचता है कि मरने लगा हूँ । ये शंकाएँ उत्पन्न होती हैं। मन की कशिश होती है कि ध्यान को हटा दे। धीरे-धीरे एकाग्र होता जायेगा । शरीर पथरा जायेगा। साधक फौरन शरीर को ढूँढ़ने लगता है।
मृतक होय के पावे संता ॥