भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 264 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

शून्य से स्वांसा उठत है, नाभि दल में आय॥

यह शून्य से उठती है । मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय | जब भी चाहो, शरीर को खाली करके बाहर निकल सकते हैं। यह नहीं कि कोठरी खाली करवाई जायेगी, तभी निकलेंगे। खुद भी निकल सकते हैं। राजा जनक जानते थे यह विद्या । तभी विदेही कहे जाते थे । पर इस क्रिया से ब्रह्माण्ड के आगे नहीं जा सकते हैं। तो स्वांसा नाभि में जाती है तो नहीं जाने देते हैं । आजकल बिजली की कटौती है। पहले किसी मौहल्ले में देते हैं, फिर वहीं से बदलकर दूसरी जगह कर देते हैं । इसी प्रकार- पवन को पलट कर शून्य में घर किया । जब साहिब और गोरख की गोष्ठी हुई तो गोरखनाथ ने साहिब से पूछा- कबीर काया मध्ये सार क्या ?

साहिब ने कहा— काया मध्ये स्वांसा सार ॥

गोरखनाथ– कहाँ से स्वांसा उठत है, कहाँ को है जाय ॥

साहिब - शून्य से स्वांसा उठत है, नाभि दल में आय॥

गोरख - हाथ पाँव इसके नहीं, कैसे पकड़ी जाय ॥

साहिब— हाथ पाँव इसके नहीं, यह सुरति से पकड़ी जाय ॥

इसे मोड़ा जा सकता है । टॉयर में भी तो हवा भरी जाती है। यह सिस्टम है, जिससे हवा को इकट्ठा किया । इस तरह कह रहे हैं

सुरति से पकड़ी जाय ॥

आगे साहिब कह रहे हैं- सुरति के दण्ड से, घेर मन पवन को । फेर उलटा

चले ॥

सुरति रूपी डण्डे से मन और पवन को घेर कर इसका फेर उलट दो । ... फेर उलटा चले । धर औ अधर विच ध्यान लावै ।

कहैं कबीर सो संत निर्भय हुआ, जन्म औ मरण का भ्रम भानै ॥

इसी को गोस्वामी जी ने रामायण में कहा-

उलटा जाप जपा जब जाना । बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ॥