भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक ।

तिसका पटतर ना तुला, संतन किया विवेक ॥

यह संत-मत लोप होता गया । ये निर्गुण-भक्ति वाले इस पर हावी होते गये। संतों के जाने के बाद कुछ महत्वांकाक्षी लोगों ने और उनके रिश्तेदारों ने अधिकार जमाए। पर संतमत को समझ न पाए। इसलिए अपनी निर्गुण-सगुण को भी मिला दिया, मिश्रित कर दिया। बस, ऐसी बात कर दी कि कोई ग्राहक वापिस न जाए। कोई कह रहा है कि जिसका नाम पहले जप रहे थे, वही जपो । अगर ऐसा ही है तो गुरु किसलिए किया जा रहा है ?

संत-मत पापुलर हुआ। पर उनके पास पारस सुरति नहीं है ।

पारस सुरति संत के पासा ।।

अगर परम-पुरुष से पारस सुरति नहीं मिली तो धोखा कर रहा है गुरु शिष्य से। क्योंकि तब अपने समान नहीं बना पायेगा । पारस में अरु संत में, तू बड़ो अन्तरो मान ।

वह लोहा कंचन करे, वह करिले आप समान ॥

गुरु को कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परणाम ।

कीट न जाने भृंग को, करिले आप समान ॥

ये शब्द बोल रहे हैं कि गुरु बड़ा है। ये गुरु के अस्तित्व को स्थापित कर रहे हैं। वो नाम देकर एक ताक़त आपमें प्रविष्ट कर देता है।

पुरुष शक्ति जब आन समाई । तब नहीं रोके काल कसाई ॥

तो साहिब ने खण्डन तो किया नहीं। वो कह रहे हैं कि जिन साधनों से पार होने की सोच रहे हैं, वो नाकाफ़ी हैं।

बिन सतगुरु बांचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ॥

तब ही काल के जाल से निकल सकोगे। वो ताक़तवर है । तो जो कह रहा है कि कमाई करो, तब परम तत्व की प्राप्ति होगी तो शंका आ जाती है। गोस्वामी जी भी कह रहे हैं-

यह सब साधन से न होई । तुम्हरी कृपा पाय कोई कोई ॥

साहिब भी कह रहे हैं-

अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को ॥

तुम अदा करो, अपने खजाने से। यह जीव अपनी ताक़त से छूटने में