भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 264 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 143

सक्षम नहीं है । क्योंकि बेगाने देश में आकर उसका हंस बहुत बंधनों से बँधा है । और नाम - कमाई से या अपनी ताक़त से जीव कभी भी इन बंधनों से छूटकर उस अमर-लोक में नहीं पहुँच पायेगा। सगुण-निर्गुण दोनों भक्तियों में कमाई की बात है, गुरु का ज़्यादा महत्व नहीं है। इनमें गुरु केवल रास्ता बता देता है। अब साधक जितनी कमाई करता है, उतना ही ऊपर उठ पाता है । 'बेचारे साधन नहीं कर पाते, उनका जीवन बेकार चला जाता है । पर सत्य - भक्ति में कमाई का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि अपनी कमाई से जीव केवल तीन-लोक तक ही घूम सकता है, उससे आगे नहीं जा सकता। महाशून्य में बड़े- बड़े चुंबकीय आकर्षण हैं। जीव वहाँ अपने को भूल जाता है। ऐसे में सद्गुरु उसे होश में लाकर अपने में समाता है और अमर-लोक ले जाता है । अन्यथा करोड़ों जन्म तपस्या करते रहने पर भी वहाँ से पार नहीं हुआ जा सकता है। धीरे-धीरे दूषित होती गयी संतत्व की धारा । विहंगम चाल लोप होती गयी। मीन और पपील ही रह गयीं। पपील चींटी को कहते हैं और मीन मछली को। पपील मार्ग यानी चींटी की चाल से ब्रह्माण्ड की यात्रा करनी और मीन मार्ग यानी मछली की चाल से तीव्रता से ऊपर की ओर बढ़ना । पंच मुद्राएँ हैं । पहली दो मुद्राएँ पपील चाल कहलाती हैं जबकि बाकी तीन मीन चाल । पर विहंगम चाल केवल संत चलते हैं।

कहैं कबीर विहंगम चाल हमारी ।।

ब्रह्माण्डों की यात्रा में भी साधक शरीर से निकलता है; उसे आभास होता है कि चल रहा हूँ..... सपना नहीं होता है । पर गति नहीं होती है। 14 लोकों को भी देखता है। ये साधारण नहीं है यात्रा । पर अमर - लोक की यात्रा अपने बल पर नहीं होती है । लगता है कि कोई साथ चल रहा है। मुहम्मद साहिब कह रहे हैं— चला जब लोक को, शोक सब त्यागिया । हंस का रूप सतगुरू बनाई ।

कीट ज्यों भृंग को, पलट भृंगी करे ।

आप संग रंग ले, ले उड़ाई ॥

यानी यह जीव अपने बल पर नहीं जा सकता है । जब ऐसा होता है तो दसों दिशाओं में एक-साथ दिखता है ।