भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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तो आओ, सद्गुरु यानी एक पूर्ण गुरु की तरफ चलते हैं । वर्तमान युग में भारत में हज़ारों पंथ हैं और लाखों गुरु हैं। करीब करीब 60 लाख गुरु पूंजीकृत (रजिस्ट्रड) हैं और कई लाख ऐसे भी होंगे। इनमें से अधिकांश गुरु परमात्मा के नाम पर धन इकट्ठा करके अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं और बड़े ठाठ से जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।

बहुत गुरु हैं अस जग माहिं । हरें द्रव्य दुख कोऊ नाहिं ।।

साधारण श्रद्धालू इस स्थिति में नहीं होते कि एक सच्चे सद्गुरु को चुन सकें । वे भेड़चाल ही चलते हैं । अत: सच्चाई की खोज करने वालों को सावधान रहना है। उन्हें गुरु धारण करने में औरों की अँधाधुँध नकल नहीं करनी है। 'गुरु' और 'सद्गुरु' । इसे भी समझना होगा अन्यथा साधारण गुरु कोही सद्गुरु मान लिया तो काम नहीं बनेगा, अमर-लोक नहीं पहुँच पाओगे, वैकुण्ठ आदि तक ही सीमित रह जाओगे । सगुण और निर्गुण-दोनों में से किसी भक्ति का ज्ञान देने वाला साधारण गुरु है जबकि सगुण-निर्गुण भक्ति से परे साहिब की भक्ति, परम-पुरुष की भक्ति देने वाला सद्गुरु है । पर आज तो दुनिया में सभी सद्गुरु बने हुए हैं । ऐसे में फिर जीव तो भटक जाता है न! कुछ सगुण-निर्गुण भक्ति का ज्ञान देने वाले भी सद्गुरु बने हुए हैं जबकि कुछ ऐसे ही 'सत्लोक'' सत्लोक' कहे जा रहे हैं, पर वास्तव में वे वहाँ पहुँचे ही नहीं हैं । पहली बात तो भक्त-जन समझ सकते हैं यानी जो भी सगुण-निर्गुण भक्ति का ज्ञान दे रहा है, समझ लेना कि ये सद्गुरु नहीं हैं । .. पर ये गुरु वास्तव में वहाँ पहुँचे हैं या नहीं, इसका फैसला कैसे हो ? साहिब जानते थे कि यह कलयुग है, नकली संत-सद्गुरु भी जीवों को भटकाने लग जायेंगे, इसलिए वे सद्गुरु के लक्षण भी समझा गये हैं, जिन्हें संतों ने भी स्वीकार किया है। वास्तव में 'सद्गुरु' शब्द संतकाल से पहले नहीं मिलता है । 'सद्गुरु' नाम दिया ही सर्वप्रथम कबीर साहिब ने। पहले गुरु की बात होती थी, पहले सगुण-निर्गुण भक्ति की बात होती थी, पर साहिब ने ही सर्वप्रथम सद्गुरु भक्ति की - बात कही। उन्हें प्रथम संत-सद्गुरु कहा जाता है । वास्तव में वे संत नहीं थे। वे तो संत-सम्राट थे । उन्होंने संतों का सृजन किया । इसलिए सब