करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
तो आओ, सद्गुरु यानी एक पूर्ण गुरु की तरफ चलते हैं । वर्तमान युग में भारत में हज़ारों पंथ हैं और लाखों गुरु हैं। करीब करीब 60 लाख गुरु पूंजीकृत (रजिस्ट्रड) हैं और कई लाख ऐसे भी होंगे। इनमें से अधिकांश गुरु परमात्मा के नाम पर धन इकट्ठा करके अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं और बड़े ठाठ से जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।
बहुत गुरु हैं अस जग माहिं । हरें द्रव्य दुख कोऊ नाहिं ।।
साधारण श्रद्धालू इस स्थिति में नहीं होते कि एक सच्चे सद्गुरु को चुन सकें । वे भेड़चाल ही चलते हैं । अत: सच्चाई की खोज करने वालों को सावधान रहना है। उन्हें गुरु धारण करने में औरों की अँधाधुँध नकल नहीं करनी है। 'गुरु' और 'सद्गुरु' । इसे भी समझना होगा अन्यथा साधारण गुरु कोही सद्गुरु मान लिया तो काम नहीं बनेगा, अमर-लोक नहीं पहुँच पाओगे, वैकुण्ठ आदि तक ही सीमित रह जाओगे । सगुण और निर्गुण-दोनों में से किसी भक्ति का ज्ञान देने वाला साधारण गुरु है जबकि सगुण-निर्गुण भक्ति से परे साहिब की भक्ति, परम-पुरुष की भक्ति देने वाला सद्गुरु है । पर आज तो दुनिया में सभी सद्गुरु बने हुए हैं । ऐसे में फिर जीव तो भटक जाता है न! कुछ सगुण-निर्गुण भक्ति का ज्ञान देने वाले भी सद्गुरु बने हुए हैं जबकि कुछ ऐसे ही 'सत्लोक'' सत्लोक' कहे जा रहे हैं, पर वास्तव में वे वहाँ पहुँचे ही नहीं हैं । पहली बात तो भक्त-जन समझ सकते हैं यानी जो भी सगुण-निर्गुण भक्ति का ज्ञान दे रहा है, समझ लेना कि ये सद्गुरु नहीं हैं । .. पर ये गुरु वास्तव में वहाँ पहुँचे हैं या नहीं, इसका फैसला कैसे हो ? साहिब जानते थे कि यह कलयुग है, नकली संत-सद्गुरु भी जीवों को भटकाने लग जायेंगे, इसलिए वे सद्गुरु के लक्षण भी समझा गये हैं, जिन्हें संतों ने भी स्वीकार किया है। वास्तव में 'सद्गुरु' शब्द संतकाल से पहले नहीं मिलता है । 'सद्गुरु' नाम दिया ही सर्वप्रथम कबीर साहिब ने। पहले गुरु की बात होती थी, पहले सगुण-निर्गुण भक्ति की बात होती थी, पर साहिब ने ही सर्वप्रथम सद्गुरु भक्ति की - बात कही। उन्हें प्रथम संत-सद्गुरु कहा जाता है । वास्तव में वे संत नहीं थे। वे तो संत-सम्राट थे । उन्होंने संतों का सृजन किया । इसलिए सब
संतों ने उनकी बात को माना । जो साहिब की बात पर चले, जिन्हें उन्होंने अमर-लोक पहुँचाया, जिन्हें उन्होंने सत्पुरुष का दर्शन करवाया, वे ही संत-सद्गुरु कहलाए। साहिब तो एक सच्चे सद्गुरु की पहचान बताकर गये हैं । सद्गुरु के लक्षण बताते हुए वो कह रहे हैं- -
गुरु के लक्षण कहत हौं, सुनो धीर चितलाय ।।
गुरु के लक्षण बताते हुए साहिब ने पहला लक्षण निर्वासना बताया है। आओ, ये लक्षण समझें, जिससे हम एक सच्चे सद्गुरु की खोज में भ्रमित होने से बच सकें । 1. निर्वासना : निर्वासना से मतलब है कि वो स्त्री- सहवास कभी न करे । इसके लिए या तो बालब्रह्मचारी हो । बालब्रह्मचारी है तो समझो कि कभी माया में फँसा ही नहीं है । ज्ञान चदरिया जिसने लीनी, मैली कर धर दीनी ।
एक कबीर जतन से लीनी, ज्यों की त्यों धर दीनी ।।
विवाह से मतलब ही इंद्रिय सुख की प्राप्ति है और इंद्रिय सुख का आनन्द लेने वाला सच्चा गुरु कैसे हो सकता है ! यदि कोई गुरु इंद्रियों के सुख में डूबा हुआ है तो समझो कि अभी तक उसे आत्मा का सुख मिला ही नहीं है। अतः वो अपने शिष्यों को इंद्रिय सुखों से दूर सच्चे आनन्द की ओर कैसे ले जा सकता है ! साहिब यहाँ चेता कर कह रहे हैं-
जाका गुरु है गीरही, चेला गिरही होय ।
कीच कीच के धोवते, मैल न जावे कोय।।
जिसका गुरु गृहस्थ है, उसका शिष्य चाहे सन्यासी ही क्यों न हो, वो भी गृहस्थ हो जायेगा, क्योंकि कीचड़ का दाग़ कीचड़ से तो साफ़ नहीं हो सकता है। इसलिए कबीर साहिब ने बालब्रह्मचारी गुरु करने को कहा है। बालब्रह्मचारी गुरु का मिलना बड़ा कठिन है, इसलिए यदि ऐसा गुरु न मिले तो दूसरे ऐसे गुरु की खोज करनी चाहिए, जो ज्ञान हो जाने पर सन्यासी हो चुका हो । गुरु- पद पर आसीन होने के लिए विषय-वासनाओं का त्याग अति अनिवार्य है। शिष्य ने तो अपना तन, मन, धन गुरु को समर्पित करना है। इसलिए तो कह रहे हैं-
तन मन वाको दीजिए, जाके विषया नाहिं ।।
नानक देव जी कह रहे हैं-
यह दुनिया सकली तजी, लियो वैष वैराग ।
कह नानक सुन रे मना, ता घट ब्रह्म निवास ।।
वर्तमान में गुरुओं को इस एक लक्षण की कसौटी पर उतारने की कोशिश करेंगे तो अधिकांश इसी में फेल हो जायेंगे । 2. निर्बन्धन : निर्बन्धन से मतलब है कि उसका भाई, बहन, बेटा, बेटी, नातेदार आदि से गहरा संबंध नहीं होना चाहिए। उसका नाता मात्र शिष्यों से होना चाहिए। यदि घर-परिवार के लोगों से विशेष प्रेम होगा तो शिष्यों द्वारा दिये जाने वाले धन को उन्हीं की सेवा में लगा देगा और परमार्थ के काम में नहीं लगायेगा। इसके अलावा अंत में पक्षपात होगा। वो जाते समय अपनी गद्दी अपने बेटे को या किसी सगे-संबंधी को देकर जायेगा, चाहे वो उसके लायक हो या नहीं। साहिब ने इस विषय पर सतर्क किया है।
बीज बिंदु नहीं चले गुरु आई । नाद बिंद से चले गुरु आई ।।
कहा कि शब्द पुत्र को ही गद्दी देनी है। यदि कोई अपने बेटे को या रिश्तेदार को गद्दी देकर जा रहा है तो समझो कि मोह-माया में फँसा है । तब आपकी आत्मा का काम नहीं हो पायेगा।
बंधे को बंधा मिले, छूटे कौन उपाय।
कर सेवा निर्बन्ध की, पल में लेय छुड़ाय ।।
3. सारग्राही : गुरु को अपनी ही कमाई से खाना है । किसी से माँग कर नहीं
खाना है। शिष्यों के धन से नहीं खाना है । साहिब तो कह रहे हैं-
माँगन मरन समान है, मत कोई माँगो भीख।
माँगन मरना भला, सतगुरु देते सीख।।
यदि गुरु स्वयं माँग कर खा रहा है तो शिष्यों को भी यही सीख देगा। वो भी कहीं पर्चियाँ कटवाकर माँगेंगे तो कहीं ऐसे ही हाथों-हाथ माँगना शुरू हो जायेंगे । इसलिए साहिब चेता रहे हैं- स्वांग यती का पहिन के घर घर माँगी भीख । पूरा सतगुरु ना मिला, सुनी अधूरी सीख । , 4. निर्लोभी : गुरु को शिष्य के धन से प्रेम नहीं होना चाहिए । शिष्य के द्वारा
दिये जाने वाले धन को परमार्थ के काम में लगाने वाला होना चाहिए । यदि वो अपने निजि स्वार्थ के लिए उसका इस्तेमाल कर रहा है तो समझो—
गुरु लोभी शिष्य लालची, दोनों खेले दाँव ।
दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पत्थर की नाव।।
5. सत्यवान एवं निष्कामी : सत्य को तो संतों ने सब धर्मों का मूल माना है ।
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप ।।
स्वयं सत्यवादी होने वाला गुरु ही शिष्यों को सत्य की ओर ले जा सकता है। उस सत्य तक पहुँचने के लिए साहिब ने गुरु, शिष्य और नाम- - तीनों की सत्यता पर बल दिया है।
गुरु सत्य नाम सत्य हो, आप सत्य जो होय ।
तीन सत्य जब एक हों, विष से अमृत होय।।
6. सर्वज्ञी : गुरु को सभी धर्म - शास्त्रों का ज्ञान होना चाहिए। उसे आन्तरिक
मंडलों का भी पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए। तभी वो शिष्य की शंकाओं का
निराकरण कर सकेगा । यहाँ पर साहिब कह रहे हैं-
जा गुरु ते भ्रम ना मिटे, भ्रांति न जिव का जाय ।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।।
7. सातवाँ लक्षण : सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी आत्मा परमात्मा में
मिल चुकी होनी चाहिए ।
सतपुरुष को जानसी, तिसका सतगुरु नाम ।।
जिस गुरु में उपर्युक्त छः लक्षण हों, उसी में अंतिम सातवाँ लक्षण भी हो सकता है और जिसमें उपर्युक्त सातों लक्षण हों, वो ही एक पूर्ण गुरु हो सकता है। ऐसा सद्गुरु परमात्मा का सच्चा प्रतिनिधि हो सकता है। यदि आप पूर्ण गुरु की तलाश में हैं तो ऊपर बताए गये सद्गुरु के प्रमुख सात लक्षणों को ध्यान में रखना । जब ये लक्षण किसी में मिल जाएँ तो समझना कि पूर्ण गुरु मिल गये । यदि ये लक्षण नहीं मिलें तो कबीर साहिब इस विषय में कह रहे हैं—
जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा।।
आमतौर पर भक्तों में एक वहम देखा गया है । वे समझते हैं कि यदि
उन्होंने कोई गुरु पहले से ही किया हुआ है तो अन्य गुरु करने से उन्हें पाप लग जायेगा। नहीं, ऐसा नहीं है । उपर्युक्त शब्द में साहिब ने यही तो समझाया है कि जब तक पूर्ण गुरु न मिल जाएँ, तब तक दस-पाँच गुरु अगर कर भी लो तो कोई बात नहीं है, क्योंकि पूर्ण गुरु बड़ी मुश्किल से मिलता है । पर जब पूर्ण गुरु मिल जाए तो अन्य गुरु करना वैसा ही है जैसे समुद्र में गोता लगाते-लगाते अचानक हीरा मिल जाए और उसे पुन: समुद्र में फेंक दिया जाए। बस, यह समझ लेना कि बिना सद्गुरु के संसार-सागर से पार करने वाला कोई नहीं है । सतगुरु के उपदेश का, सुनिया एक विचार ।
जो सतगुरु मिलता नहीं, जाता यम के द्वार ।।
यम द्वारे में दूत सब, करते ऐं चातानि ।
उनते कभू न छूटता, फिरता चारों खानि ।।
चारि खानि में भरमता, कबहुँ न लगता पार ।
सो फेरा सब मिटि गया, सतगुरु के उपकार ।।
सद्गुरु का भेद देते हुए साहिब धर्मदास को समझाते हैं—
भृंग मता होय जेहि पासा । सोई गुरु सत्य धर्मदासा ॥
कह रहे हैं कि जिसके पास भृंग मता हो, वही सच्चा गुरु है, वही सद्गुरु है। अब यह भृंग मता क्या है ? 27 लाख कीट हैं । भृंगा उन सबमें निराला है । वो केवल पुरुष ही है । उसकी मादा नहीं है। उसका वंश कैसे चलता है ? वो किसी भी कीड़े को पकड़ लाता है। मिट्टी का घर बनाता है वो । उड़ता भी बड़ी स्पीड में है । उसकी आवाज़ में एक जादू है। वो कीड़े को मिट्टी के घर में रख कर अपनी आवाज़ सुनाता है । बड़ी रोमांचित करने वाली है उसकी आवाज़। उस आवाज़ से उसे वो अपने जैसा कर देता है । पर यदि कीड़ा उसकी आवाज़ सुने ही न तो नहीं हो पाता है वो उसकी तरह। तो भृंगा उसे छोड़कर इधर-उधर चक्कर काट कर आता है और फिर आकर अपना शब्द सुनाने लगता है। यदि वो फिर भी न सुने तो भृंगा फिर उड़कर चला जाता है और फिर एक चक्कर काटकर आता है और अपनी आवाज़ सुनाने लगता है । यदि वो सुन ले तो उसकी तरह हो जाए, पर यदि तीसरी बार भी न सुने तो भृंगा उसे छोड़ देता है। वो कीड़ा ही रह जाता है, भृंगा नहीं बन पाता है। अब वो दूसरे कीड़े को पकड़कर लाता है और यही खेल उसके साथ भी शुरू करता है ।
यही काम सद्गुरु का है शिष्य के कान में अपना शब्द सुनाता है। सद्गुरु भी शिष्य को अपनी सुरति से अपने समान कर देता है। कीड़े को कुछ नहीं करना है। पकड़कर भी उसे भृंगा ही लाता है, नीचे गिराकर शब्द भी उसे खुद ही सुनाता है। उस कीड़े को तो केवल सहमति जतानी है, शब्द सुनना है। पर वो सुने ही नहीं तो कैसे होगा ! यहां पर नोट करने वाली बात यह है कि अगर सद्गुरु पूरा होगा तो आप में आटोमैटिक बदलाव आना शुरु हो जायेगा । मन काबू में आने लगेगा । इसी पर साहिब कह रहे हैं-
भृंगी शब्द कीट जो माना ।
वरण फेर आपन कर जाना ॥
जो कीड़ा भृंगे का शब्द सुन लेता है, वो अपना वर्ण भूलकर उसकी तरह हो जाता है। यानी गोबरैला होगा तो वो अपनी आदतें भूलकर भृंगा हो जायेगा, ततैया होगा तो वो ततैया वाली आदतें, ततैया वाले गुण छोड़कर भृंगे के गुण अपना लेगा, उसकी तरह ही हो जायेगा ।
कोई कोई कीट परम सुखदाई ।
प्रथम आवाज़ गहे चित्तलाई ॥
पर साहिब कह रहे हैं कि कोई-कोई कीट बड़ा सुखदाई होता है, जो पहली आवाज़ में ही शब्द को ग्रहण कर लेता है और उसी की तरह हो जाता है ।
कोई दूजे कोई तीजे मानै ।
तन मन रहित शब्द हित जानै ॥
कोई दूजे और कोई तीजे शब्द में ग्रहण करता है । कुछ-कुछ क कठिन हैं, जो पहली में परिवर्तित नहीं होते हैं, दूसरी या तीसरी आवाज़ में परिवर्तित हो जाते हैं । भृंगी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे
रहई ॥
पर जो कीड़ा उसका शब्द सुनता ही नहीं, तीसरी बार भी डर जाता है या सुनना नहीं चाहता, वो फिर कीड़ा ही रह जाता है। गुरुशब्द निश्चय सत्य माने, भृंगि मत तब पावई ।
तजि सकल आसा शब्द बासा, कागा हंस कहावई ॥
ऐसे ही गुरु शब्द सुखदाई है । भृंगे की भू-भू की प्रकिया में स्पन्दन है। कुछ कीट पहले में नहीं हो पाते हैं परिवर्तित । क्यों नहीं हुए? क्योंकि समर्पित नहीं होते । जब तक समर्पित होकर नहीं सुनता, उसका परिवर्तन नहीं हो पाता। फिर तीन बार में भी न हो तो भृंगा उसे छोड़ देता है, दूसरे को ढूँढ़ता है तो पुनि कीट आसरे रहई .. फिर नहीं बन पाता है वो भृंगा, कीट ही रह जाता है। उसने सहमति नहीं दी। यह सहमति साधारण नहीं है ।
पहले दाता शिष्य भया, जिन तन मन अरपा शीश ।
पीछे दाता सतगुरु भया, जिन नाम दिया बखशीश ॥
सभी सहज-मार्ग, सहज - मार्ग कहे जा रहे हैं, पर कमाई - कमाई क जा रहे हैं । ये दो पहलू हैं । साहिब कह रहे हैं कि तुम्हें कुछ भी नहीं करना है, सद्गुरु सभी चीजें उत्पन्न कर देगा । ये चीजें अपने-आप आपमें आती जायेंगी । ज्ञान भी खुद ही आ जायेगा, भक्ति भी खुद ही आ जायेगी, मन पर कण्ट्रोल भी खुद ही आ जायेगा, रूहानियत भी खुद ही आ जायेगी, शक्तियाँ भी खुद ही आती जायेंगी। आप कहेंगे कि हम नहीं करेंगे तो कैसे होगा ! यह जो 'हम' है, इसे संचालित कौन कर रहा है नाम के बाद ! गुरु की ताक़त ही इसका संचालन कर रही है, इसलिए अपनी 'मैं' नहीं लाना बीच में, केवल सहमति रखना । एक ने कहा कि यदि गुरु की कृपा से ही सब होता है तो जो हम ठगी कर रहे हैं, वो भी उसकी ही इच्छा से होता होगा । मैंने कहा – सुन, पूरा-पूरा जबाव दूँगा। यह तब होता है जब हम पूर्ण रूप से समर्पित नहीं हो जाते हैं । आप जब पूर्ण रूप से समर्पित हो जाते हैं तब चाहकर भी ग़लत नहीं कर पायेंगे। अभी आप प्रभु के भरोसे चल रहे हैं, प्रारब्ध आपका संचालन कर रहा है, कर्मानुसार आपको फल मिलेगा। मान लो कि कुँए में गिरना होगा तो पक्का गिरोगे। पर जब सद्गुरु पर आश्रित होते हैं सद्गुरु कर्म को एक तरफ कर देते हैं। वो घटना टल जाती है।
कोटि कर्म पल में कटे, जो आवे गुरु ओट ॥
जो भी काम करेंगे, जो भी नुकसान या अहित होने वाला होगा, वहाँ गुरु की ताक़त रक्षा करेगी। जो भी होगा वो हित में ही होगा। इसलिए हित-
अनहित सबमें उसी की रज़ा मानना । ...तो कहने का भाव है कि सब कुछ वही करेगा, तुम्हें कुछ नहीं करना है । आप ही हम बह जायेंगे, जो न सुरति करौ मम साईंया, हम हैं
भवजल माहिं ।
गहोगे बाहिं ॥
अर्थात साहिब ने इंगित किया कि वो अविलंब बदल देगा । कैसा बना देगा? स्वयंमय बना देगा | यही कह रहे हैं कि परिश्रम करने की ज़रूरत नहीं है। दुनिया में अनेक गुरु हैं जो कहते हैं कि आपको पार कर देंगे, पर जब उनके लोगों को देखते हैं तो पता चलता है कि उनमें कोई बदलाव नहीं है । यानी वे सच्चे गुरु नहीं हैं। इसलिए साहिब ने सतर्क करते हुए कहा-
भृंग मता होय जिहि पासा । सोई गुरु सत्य धर्मदासा ॥
जैसे भृंगा कीट के बिना प्रयास के उसे बदल देता है, ऐसे ही शिष्य की चेष्टा बिना ही यह काम गुरु कर देता है। आप नहीं देख रहे हैं अपने बच्चों को कि उनमें आपकी आदतें आ रही हैं। यह आपका एक शुक्राणु है । गुरु की सुरति शिष्य की आत्मा तक पहुँची। उसमें सब चीज़ें सहज ही आ गयीं। फिर काम, क्रोध नहीं लगेगा। साहिब ने ऐसे गुरु के लिए कहा कि जो भृंग की तरह बदलने की क्षमता रखता हो । 'गुरु मिलने से झगड़ा ख़त्म हो गया॥' अध्यात्म की खोज समाप्त हो जाती है। योग में यह प्रावधान नहीं है। सहज मार्ग क्या है ? पूरी जिम्मेदारी गुरु की है। आपकी मोह- माया हटती जायेगी, आपके अंदर के विकार समाप्त होते जायेंगे, एक चौकीदार आपकी सुरक्षा के लिए खड़ा रहेगा हमेशा । 'मेरा हरि मौको भजे, मैं सोऊँ पाँव पसार ॥ ' वाली बात हो जायेगी । यह है – सहज- मार्ग । तुम्हें कुछ नहीं करना है। यह है – भृंग मता । - गुरु को कीजे दण्डवत्, कोटि कोटि प्रणाम ।
कीट न जाने भृंग को, करिले आप समान॥
आदमी तो शंका में है कि हमें क्या करना है । कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ। अपनी ताक़त से आप माया को नहीं छोड़ सकते हैं। गुरु नाम की ताक़त खुद यह काम करेगी।
जो आपको कह रहा है कि कुछ कर, कमाई कर, समझना कि वो संत नहीं है, संत वेश में कोई पाखण्डी है, जिसे यथार्थ ज्ञान कुछ भी नहीं है, केवल किताबों से पढ़कर सुना रहा है। संत तो सक्षम होता है, पर वो अक्षम है; संत आँखों देखी वाली बात करता है, वो किताबों वाली बात कर रहा है; संत यथार्थ में अमर - लोक से होकर आते हैं, उसने कभी अमर-लोक सपने में भी नहीं देखा है । यदि सपने में भी देखा होता तो जान जाता कि अपनी ताक़त से नहीं देखा, कोई दिखा गया। यह पक्की बात है कि सपने में भी अमर - लोक नहीं देखा जा सकता है। फिर वहाँ पहुँचना तो बड़ी दूर की बात है । इसलिए जिसके पास भृंग मते वाली थ्यूरी नहीं है, वो आपका बहुत बड़ा बैरी है, क्योंकि आपको धोखे में रखे हुए हैं। इस बात को अपने दिल में गहराई से उतार लेना कि वो आपका सर्वनाश करने पर तुला है, जो कह रहा है कि कुछ कमाई कर, कुछ साधना कर, तभी कुछ होगा। क्योंकि उस पाखण्डी को पता नहीं है कि- -
ना कुछ किया ना करि सका, ना करने योग शरीर ।
जो कुछ किया साहिब किया, भया कबीर कबीर ॥
जो कमाई करने को कह रहा है, इसका सीधा सा मतलब है कि वो कहना चाह रहा है कि उसने भी अपनी कमाई से ही सब कुछ हासिल किया है । इससे स्पष्ट हो जाता है कि वो कभी अमर - लोक गया ही नहीं है । उसका गुरु भी संत नहीं हो सकता है। यदि होता तो वो ऐसी बात नहीं करता । कहीं से भी उसका मत संत-मत नहीं है, कहीं भी उसका मत भृंग-मत नहीं है। वो एक झूठा है, जो अपने साथ-साथ आपको भी भवसागर में डुबाने में लगा हुआ है। उसका मुद्दा केवल धन कमाना हो सकता है, आपकी मुक्ति नहीं । हमारे देश में शीश पर हाथ रखकर नाम दिया जाता है । कोई कहता है कि हमें गुरु जी ने माइक पर नाम दिया, कोई कहता है कि टी. वी. पर दिया। नहीं, नाम ऐसे नहीं दिया जाता। एक ने मुझसे भी पूछा कि यदि आपको हज़ार आदमी को एक साथ नाम देना पड़ेगा तो क्या तब भी ऐसे ही शीश पर हाथ रखकर देंगे? मैंने कहा कि यदि एक लाख आदमी को भी नाम देना पड़ा तो ऐसे ही दूँगा, क्योंकि नाम देने
की विधि ही यही है। वो ऐसे ही दिया जाता है। यही सिस्टम है नाम का। क्योंकि वो किरणें शिष्य को प्रदान करनी हैं । एक शराबी मेरे पास आया, थोड़े दिन हुए थे शराब छोड़े; कहा नाम दो। मैंने कहा कि अभी थोड़ा कण्ट्रोल करो, बाद में दूँगा। बाद में वो किसी दूसरे महात्मा से नाम लेकर आया, अपने ही गुरु को गालियाँ देने लगा, कहने लगा कि मैं शराब में धुत था तो नाम दे दिया। क्या ऐसे देते हैं नाम ! मुझे तो पता भी न चला कुछ। यानी गुरु जी को शिष्य की कुछ ख़बर ही नहीं थी कि क्या मामला है । तभी कहा – 'पानी पीजिये छानि के, गुरु कीजे जानि के ॥' गुरु जी तो बस अपनी संख्या बढ़ाने में लगा था। मैं समाज को कह रहा हूँ कि ऐसे लोगों से सतर्क रहो, जिनको आपकी ख़बर ही नहीं है कि क्या कर रहे हैं आप। यदि गुरु जी को आपके पाप कर्मों की ख़बर नहीं है तो फिर वो आपका कल्याण भी नहीं कर पायेगा, क्योंकि जब काल आपकी आत्मा को लेने आयेगा तो भी उसे ख़बर न होगी और वो आपको कहीं भी जाकर पटक देगा। आपका वो पाखण्डी गुरु आपको काल से बचा नहीं पायेगा । इसलिए पूर्ण गुरु की खोज करनी होगी। साहिब के ये शब्द याद रखने होंगे-
भृंग मता होय जिहि पासा । सोई गुरु सत्य धर्मदासा ॥
काग पलट हंसा कर दीना ।
ऐसा नाम सतगुरु मैं दीना ॥
3. सतगुरु क्या करेगा
सतगुरु क्या करेगा
जब आपने नाम-दान प्राप्त किया तो क्या होगा ? गुरु क्या काम करेगा ? वर्तमान में आपकी आत्मा मन-माया के जाल में पड़कर अपने स्वरूप भूल हुई है। नाम-दान के समय एक काम सद्गुरु यह करता है कि मन और आत्मा को अलग कर देता है। वैसे आत्मा पूरे शरीर में समाई हुई है। वो उसे उठाकर आज्ञाचक्र पर एकाग्र कर देता है । इसके बाद मन चाहकर भी इसे अपने में समा नहीं सकता है। अब धीरे-धीरे शिष्य आत्मा को समझने लगता है। सद्गुरु ने यह काम किया। उसने आत्मा को कोई ताक़त नहीं दी। आत्मा किसी ताक़त की ज़रूरत नहीं है । वो परम - पुरुष की अंश होने से बड़ी ताक़तवर है। उसे किसी अतिरिक्त ताक़त की ज़रूरत नहीं है । गुरु केवल उसके ऊपर से मन-माया के आवरण को हटा देता है, जिससे उसे अपने स्वरूप को समझने का अवसर मिल जाता है । साहिब ने बड़े सुंदर अलंकार से इस तथ्य की पुष्टि की है—
बिना सतगुरु नर फिरत भुलाना ।
खोजत फिरत न मिलत ठिकाना ॥
बड़े अच्छे अलंकार से साहिब ने आत्मतत्व विस्मृत कैसे हो गया, यह बताया है । अपनी ताक़त यह कैसे खो दिया है, यह बता रहे हैं । कह रहे हैं कि बिना सच्चे सद्गुरु के यह भूला हुआ है ।
के हर सुत इक आन गड़रिया ।
पाल पोस के कियो सयाना ॥
'केहर' शेर को कहते हैं । 'सुत' बच्चे को कहते हैं । एक बार एक शेर का बच्चा बक्करवाल की बकरियों में आ गया। वो अपनी माँ से बिछड़ गया । बक्करवाल उसे उठाकर ले गया ।
पाल पोस के कियो सयाना ॥
माँ से बिछड़ा हुआ था। माँ नहीं मिली। अब वो भेड़-बकरियों के साथ रहने लगा।
करत कलोल फिरत अंजियन संग |
आपन मरन उनहूँ न जाना॥
'अजा' बकरी को कहते हैं । 'कलौल' यानी खेलकूद। वो गड़रिये की बकरियों के साथ खेलता था। अपना भेद उसे मालूम नहीं था कि शेर हूँ । बड़ा हो गया। घास भी खाने लगा। घास क्यों खाने लगा ? आपके बच्चे भी कभी मिट्टी खाते हैं। बच्चों की जीभ इंद्री तेज़ होती है। मिट्टी में एक तत्व है। खाने की चीज़ नहीं थी । विषैले पदार्थ भी हैं। पर आदत पड़ गयी । मिट्टी खाना गंदी आदत है। आत्मा को इंद्रियों के साथ रहने की बड़ी गंदी आदत पड़ गयी है । मेरा भतीजा मिट्टी खाता था । उसकी माँ कहती थी कि यह मिट्टी खाता है । मैंने कहा कि घर में मिट्टी न रखा करो। बाद में वो कहने लगी कि यह बाहर जाकर मिट्टी खाता है। मैंने कहा कि बाहर न जाने दो। फिर एक दिन कहने लगी कि जूते के तलवे से मिट्टी निकालकर खाता है । देखा न, कितनी गंदी आदत थी ! मैंने कहा कि जूते ऊँची जगह पर रखा करो। फिर एक दिन कहने लगी कि अब दीवारों को चाटता है । अब दीवारें थोड़ा तोड़नी थीं । वाह ! ऐसा ही है मन।
तीन लोक में मनहिं विराजी । ताहिं न चीह्नत पंडित काजी ॥
तो उसे बाद में समझाया, भय दिया कि नहीं खाओ । मिट्टी खाने की चीज़ नहीं है । इस तरह शेर के लिए घास खाने की चीज़ नहीं है। एक भैंस का कट्टा है। भैंस को चारा देने जाऊँ तो वो मेरे पैर की टो पकड़कर नौचता है। उसने दोनों टो खा ली हैं। भूखा होता है तो कुछ खाना चाहता है। वो खाने की चीज़ नहीं है; पर भूखा था । संभवतः, शेर का बच्चा भी घास खाना इसलिए सीख गया होगा, क्योंकि उसे कुछ और न मिला होगा। उसने देखा होगा कि बाकी भी यही खा रहे हैं। वो भी खाने लग गया। वो लड़ाई भी भेड़ की तरह ही करने लग गया। बोलने भी भेड़ की तरह ही लगा । गरजने की जगह मिनमिनाने लगा। कुत्ता भौंकता है, हाथी चिंगाड़ता है, शेर गरजता है, बकरी मिनमिनाती है । वो मिनमिनाने लगा। शेर को मिनमिनाना नहीं है । पर वो भेड़ों को मिनमिनाते देखता था। पूरे काम बकरियों वाले करने लगा । चलना भी बकरियों की तरह
हो गया। वो बकरियों के साथ रह-रहकर बकरी बन गया। शेर कैसे बकरी बन सकता है ? बकरियों की संगत में रहने से सुभाव से बकरी बन गया ।
मृगपति और जंगल से आयो ।
ताहि देख वो बहु डराना॥
अब जो बक्करवाल था, वो जब भी बकरियों को डंडा मारता था तो शेर को भी मारता था। जैसे सभी उसके काबू में थे, वो भी था। जब कहीं खो जाता तो बक्करवाल उसे पकड़ लाता था । क्या आदमी शेर को पकड़ सकता है? नहीं, बकरियों के संग में उसका यह हाल हो गया। वो पूरी-पूरी बकरी बन गया। अपने को नहीं जानता था । तो—
मृगपति और जंगल से आयो, पाल पोस कर कियो सयाना ॥
'मृगपति' शेर को कहते हैं । मृगा 27 फीट छलाँग लगाता है। शेर 28 फीट मारता है। शेर का स्वभाव है कि अपना शिकार एक्टिव करके मारता है । जैसे आप भोजन लचीला करके खाते हैं। शेर पहले दौड़ाता है । आप फुलका ठीक से बनाकर खा रहे हैं। शेर भी ऐसे ही करता है । वो पीछे से वार नहीं करता है। पहले भयभीत करता है। भागने का मौका देता है। दौड़ा-दौड़ाकर फिर मारता है। यह उसका स्वभाव है । उसे मृगा से चुनौती मिलती है। वो शेर को चैलिंज देता है। मृगा को शेर बड़े शौक से मारकर खाता है। पर जो शेर इंसान का माँस एक बार खा ले, वो फिर नरभक्षी हो जाता है, फिर दूसरे जानवर का शिकार करना उसे अच्छा नहीं लगता है। वो इंसान को ही खाता है। क्योंकि इंसान की चमड़ी ही माँस है । भालू को खायेगा तो पहले बाल हैं; वो नौचता है । जिस शेर के मुँह पर इंसान का खून एक बार लग जाए तो वो दूसरे जानवर का शिकार नहीं करता है। तो दूसरे जंगल का मृगपति आया । उसे देखकर वो बकरी बना हुआ शेर का बच्चा डर गया ।
ताहि देख वो बहु डराना ॥
शेर ने देखा कि यह शेर का बच्चा है और घास खा रहा है, बकरियों के साथ में है और डंडे भी पड़ रहे हैं । यह तो बकरी बना हुआ है। यह तो शेर के धर्म के ख़िलाफ़ है। वो उसके पास पहुँचा । उसे देख बच्चा डर गया। एक बार लंगूरों के टोले में इंसान भी था । वो क्या कर रहा था ? जैसे
लंगूर छलाँग मार रहे थे, वो भी मार रहा था । इतना तेज़ कोई आदमी पेड़ों में नहीं जा सकता है। वो लंगूरों के साथ लंगूर हो गया था। जहाँ लँगूर जाएँ, वो भी चला जाता था । अव सवाल उठा कि वो कैसे लंगूर बन गया ? था वो आदमी। 2-3 चीजें हैं। पहली बात है कि 90 प्रतिशत मेलजोल है। आदमी की 90 प्रतिशत आदतें मिलती हैं। पर टेक्निकॅल् कारण कुछ और है। वो क्यों छलाँगें मार रहा था? क्योंकि फल खाने और दूध पीने से उसका शरीर लचीला हुआ। छोटेपन ही लंगूरन उठाकर ले गयी होगी और उसे ममता दे दी होगी, अपना दूध पिला दिया होगा । मैंने अखबार में पढ़ा कि एक कुत्तिया कूड़े के ढेर पर पड़े हुए छोटे- से बच्चे को रोज़ दूध पिलाने जाती थी । किसी ने बच्चे को कूड़े के ढेर पर फेंक दिया था। कुतिया ने सोचा होगा कि कचरे में पड़ा है। वो रोज़ दूध पिलाने जाती थी। उसका टॉइटल भी था - कुतिया की ममता । संभवता लंगूरनी ले गयी होगी और प्यार दे दिया होगा। बच्चे ने भी उसे ही अपनी माँ समझ लिया होगा । जैसे कोई बच्चा अपनाते हैं तो वो तो उन्हें ही अपने माता-पिता समझता है न! ऐसा ही हुआ होगा। अब धीरे-धीरे उसे सब सिखा दिया होगा । पर उसके शरीर का ढाँचा आदमी की तरह था । दूध पीने और फल खाने से आदमी तेज़ होगा । पर यह नहीं कह रहा हूँ कि अनाज नहीं खाना। क्योंकि लोग मेरी बात को उलट-पुलट कर देते हैं। एक दिन मुझे किसी ने कहा कि गाय माता है तो भैंस क्या है? लोग सवाल पूछते हैं। भैंस की दो चीज़ें उसे थोड़ा किनारा कर रही हैं। भैंस पहले अपना शरीर बनाती है, पर गाय जितना खिलाओ, वापिस कर देती है । पर ईमानदारी से देखें तो-
जिसका पीजिए दूध, तिसको कहिये माय ॥
इसलिए सभी की रक्षा करनी है । तो वो बच्चा लंगूर हो गया। वो इंसान से किनारा करता गया । लंगूर बन गया। छलाँगें इसलिए मार रहा था कि दूध वही पिया, जीनस् आ गये। लंगूरों के टोले में भाषा भी सीख गया। बच्चों की याददाश्त भी बड़ी तेज़ होती है।
एक बार गुरुदेव के पास कुछ लोग आए, कहा कि यह कैसा कलयुग आ गया है, इंसान का बच्चा लंगूर बन गया है। तो गुरुदेव ने यह बात बताई थी । वो लंगूरों की तरह ही काट भी रहा था, लंगूरों की तरह आदमी से चिढ़ रहा था, सब काम कर रहा था, उलटे लटक रहा था। संभवतः वो शेर का बच्चा भी वैसे ही हो गया। एक गाय ने बच्चा दिया तो दूसरे दिन मर गयी । अब दूसरी गाय उसे दूध पिलाने लगी। वो समझ रही थी कि इसकी माँ मर गयी है। कभी-कभी वो दूध पिला देती थी। फिर उसे निप्पल से दूध पिलाने लगे। पहले विरोध हुआ । पर बाद में वो समझ गया कि उसकी जीविका का कोई और साधन नहीं है। संभवत: इसी तरह हमारी आत्मा मन और इंद्रियों के संग में बिगड़ी है। तो जंगल के शेर ने देख लिया कि घास खा रहा है । फिर आश्चर्य हुआ। वो वहाँ गया तो उसे देख बच्चा डरने लगा। शेर ने कहा कि डरो नहीं। उसने कहा कि तुम मुझे खा जाओगे। शेर ने कहा कि तू भी शेर है । उसने कहा कि मैं तो बकरी हूँ। वो डरने लगा।
पकड़ भेद ताहि समझाना ॥
वो बच्चे को चश्मे के पास ले गया और उसे दिखाया कि देख, मैं और तू एक जैसे ही हैं। उसने कहा कि क्या सच में मैं शेर हूँ ? शेर ने कहा कि तू शेर है। उसने उसे सब कुछ सिखा दिया। पंजा चलाना भी सिखा दिया । दहाड़ना भी सिखा दिया। उसकी वो ताक़त तो थी ही । इस तरह आत्मा की ताक़त कम नहीं हुई है, केवल मन के संग में कुंद हो गयी है ।
सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल ॥
...तो मृगपति और जंगल से आयो......
तो जब जंगल का शेर आया तो सब सिखा दिया ।
पकड़े भेद ताहि समझाना ॥
पानी के चश्मे में दिखाया कि तू क्या है। कहा कि तू अपनी माँ से बिछड़ गया था । उसे सब कुछ सिखाया, कहा कि अब जा ! सभी सिखाते हैं। चिड़िया उड़ना सिखाती है । कुत्तिया भी अपने बच्चे को सिखाती है । तो जब वो बकरियों के बीच में गया तो जैसे गडरिया पहले सबकी तरह उसे भी डंडा
मारता था, अब भी मारने लगा तो वो दहाड़ा। सारी भेड़ें भाग गयीं; गडरिया भी भाग गया। रूपांतर यह है कि परमात्म रूपी शेर का बच्चा इंद्रिय रूपी भेड़ों के साथ विषय रूपी घास खा रहा है । मन रूपी गडरिया उसे डंडे मार रहा है। जंगल के शेर रूपी संतजन मिलते हैं तो आज्ञाचक्र रूपी चश्मे के पास ले जाते हैं, कहते हैं कि देख, तू आत्मा है। उसकी ताक़त कहीं कम नहीं हुई थी। पर कहाँ थी ताक़त ? ताक़त भेड़ों जैसी बन गयी क्या ? नहीं, भेड़ों के साथ रहकर भी शेर जैसी ही ताक़त थी। ताक़त नहीं बदली। वही थी। स्वभाव बदल गया । भेड़ों की संगत में रह- रहकर भेड़ों की तरह ही हो गया । शेर मिला तो उसे उसका स्वरूप दिखा दिया । इस तरह संतजन मिलते हैं तो आत्मा को जगा देते हैं । इंद्रिय रूपी भेड़ें भी डरने लगती हैं। मन कहीं भटकाता है तो आत्मा कहती है कि यह नहीं करना है । मन की ताक़त नहीं रह जाती है । इस तरह आपको बदल दिया । यह बदलाव कैसे आया? आत्मदेव अपनी ताक़त समझ चुका कि मेरी इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता है। इसलिए आप स्थिर हो गये और इच्छाएँ ख़त्म हो गयीं । आप अनूठे हो गये । आप निराले हो गये। अब आत्मदेव भ्रमित नहीं हो रहा है । जगत के पदार्थों का आकर्षण ख़त्म हो गया। कैसे ख़त्म हो गया ? जैसे भ्रमवश रस्सी को साँप मानने के भ्रम से भयभीत थे। अगले पल यथार्थ ज्ञान हो गया तो भ्रम ख़त्म हो गया। फिर चाहें कि डरें तो भी उस रस्सी से भय नहीं लगता है । इस तरह चाहने पर भी अब दुनिया के कामों में मज़ा नहीं मिलने वाला है।
सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण ।
नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्वाण ॥
सद्गुरु ने बड़ा ही अनूठा काम किया।
पकड़े भेद ताहि समझायो ॥
इस तरह मन का बड़ा ज़ोर है । आत्मा को भ्रमित करता है । गुरु आत्मरूप दिखाकर इस मन से पार कर देता है ।
कोटि जन्म का पंथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥
यह काम गुरु नाम-दान के समय एक पल में कर देता है । साहिब ने
एक भी बात झूठी नहीं बोली है, एक भी बात बेकार नहीं कही है। वो कह रहे है गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह । लगा बिलगे नहीं,
एक रूप दो देह ॥
क्या यथार्थ में गुरु शिष्य में समा जाता है। जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति साँकरी, जामें दो ना समाहिं ॥
एक बात ज़ाहिर हो रही है, एक बात का अनुभव मिल रहा है, इन शब्दों से एक बात साफ़ हुई कि यर्थाथ में गुरु शिष्य में समा सकता है। वाणी में साहिब पुकार कर कह रहे हैं - अब गुरु हैं मैं नाहिं.... । एक बात पता चल रही है, दो तथ्यों से सामने आ रही है। इसका मतलब है, कुछ बात है कि गुरु शिष्य में समा सकता है। और 'बिलगाए बिलगे नहीं।' यानी एक दूसरे के तद्रूप भी हो सकते हैं। इसका मतलब है कि तथ्यों से पता चल रहा है कि संभव है । फिर साहिब कह रहे हैं—
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अन्तरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, वह करले आप समान ॥
ये दोहे यथार्थ में एक बिंदू की तरफ ले चल रहे हैं । कुछ ऐसा आध्यात्मिक जेनिसिस्म है । कुछ ऐसा आध्यात्मिक खेल है कि जीव उस महान स्थिति तक पहुँच सकता है। यह काम पल भर में हो जाता है। एक बड़ी असमंजस आई। यह तो ठीक है - गुरु करले आप समान । एक डॉ० किसी को भी डॉ० बना सकता है । एक इंजीनियर किसी को भी इंजीनियर बना सकता है । पर एक इंजीनियर अपने अंदर का इंजीनियर निकालने में बड़ा समय लगा देता है। वो अपने अंदर का इंजीनियर निकालने में 4-5 साल लगा देता है। एक डॉ० अपने अंदर का डॉ० निकालने में बड़ा समय लगा देता है। पर यह काम गुरु पल भर में कर देता है। गुरु अपना ज्ञान, अपने गुण, अपनी आदतें, अपनी शक्तियाँ सभी चीजें पल-भर में स्थानांतरित कर देता है। यह बड़ा कौतुकमय विषय है । इशारा मिल रहा है।
गुरु को कीजे दण्डवत, कोटि कोटि प्रणाम ।
कीट न जाने भृंग को, गुरु करले आप समान ॥
कभी-कभी आप सब एक दूसरे को समझाते हैं, अपना रंग चढ़ाने की कोशिश करते हैं, पर पूरा रंग नहीं चढ़ा पाते हैं। बच्चों को समझाते हैं कि अच्छे काम करो, झूठ नहीं बोलो, पर उसपर इस समझ की पूरी रंगत नहीं चढ़ पाती है, लेकिन साहिब कह रहे हैं गुरु अपने समान बना लेता है। ऐसा क्या फार्मूला है पूर्ण गुरु के पास कि अपनी तरह कर देता है। यह बहुत बड़ी बात हुई । वो अपनी तरह कर देता है। अभी तक विज्ञान इसको समझ नहीं पा रहा है। यह क्या चीज़ है ? किस तरह बदल देता है ? इसमें सत्य कितना है, इसमें वास्तिविकता कितनी है, वज़न कितना है ? इसके प्रमाण मिल रहे हैं कि यह चीज़ हो सकती है। आदमी परमात्मा के दर्शन क्यों करना चाहता है ? क्योंकि उसमें गुण है कि जो भी उसे देखता है, उसकी तरह हो जाता है । अब ध्यान क्यों कर रहे हैं? बड़ी खास चीज़ है यह। जाने-अनजाने यह मानव जानता है कि ध्यान से परमात्मा मिल जाते हैं। यानी ध्यान में परमात्मा तक पहुँचने की, उनसे बात करने की ताक़त है। दिव्य शक्तियाँ हैं ध्यान में कहीं। कभी-कभी महात्मा को कहते हैं कि ध्यान करके देखो कि हमारा काम सफल होगा या नहीं। इसका मतलब है कि गुरु जो शक्तियाँ स्थानांतरित करता है, ध्यान से करता है। माता-पिता नहीं कर पाते हैं यह काम | वो केवल ढाँचा ही बदल पाते हैं, पर व्यक्तित्व को नहीं । हमें अपनी तरह नहीं बना पाते हैं । साहिब एक जगह और कह हैं-
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अंतरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, गुरु करले आप समान ॥
उदाहरण देता हूँ । जबसे आप मेरे संपर्क में आए, पहले वाला व्यक्तित्व ख़त्म कर दिया। मैंने पहले वाले को मार दिया और उसे मधुमय बना दिया। अब आपकी विचारधारा, आपका स्वभाव सब मिलेगा मुझसे। माँ - बाप से नहीं मिलता है। आप कहते भी हैं कि बेटा अच्छा नहीं है, पता नहीं किस पर गया है, पर गुरु यह कला करता है। इस बात में वज़न है । भृंगा को भण्डारिन भी कहते हैं । वो बड़ा अजीब जीव है। सभी स्त्री-पुरुष हैं, पर वो केवल पुरुष
है, उसकी मादा नहीं है । फिर वो बड़े प्यारे तरीके से अपनी पीढ़ी चलाता है। वो कीड़े को पकड़ अपनी आवाज़ सुनाता है और अपनी तरह कर लेता है। साहिब कह रहे हैं कि इस तरह गुरु भी अपनी तरह कर लेता है । प्रमाण मिल रहे हैं। जब भी आप अपने व्यक्तित्व को देख रहे हैं तो बहुत बड़ा बदलाव मिल रहा है। कभी अपने में बदलाव देख अचरज होता होगा आपको । एक दिन अवतार सिंह ने कहा कि मुझे लगता था कि मुझसे बुरा कोई नहीं है दुनिया में, सभी गलत काम कर लेता था मैं, पर अब लगता है कि मुझसे अच्छा कोई नहीं है। मैं बदल गया हूँ । कहा- अगर मैं कई जन्म तपस्या भी करता तो भी शायद इतना नहीं बदल सकता था । साहिब सच ही तो कह रहे हैं- सतगुरु मोर रंगरेज, चुनरि मोरि रंग डारी....... आपको बदल दिया। फिर वाणी में आ रहा है-
जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गलि अति साँकरी, तामें दो ना समाहिं ॥
आख़िर क्या करते हैं गुरुदेव ? आप हम सब वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। क्लोन्स बन रहे हैं। बकरी के क्लोन्स, इंसान के क्लोन्स, पर वो हमारे बाहरी रूप को बदल रहे हैं, स्वभाव को नहीं बदल पा रहे हैं । यह वैज्ञानिकों की पकड़ से बाहर है। फिर क्या है संत के पास, जो वो बदलने में सक्षम है। पारस सुरति संत के पास ........ उनकी सुरति में एक ताक़त है । जैसे सीपी में स्वाति की बूँद को मोती में बदलने की ताक़त है। उसके पेट में यह सिस्टम है। पर पानी की बूँद को मोती बनाना वैज्ञानिकों के बस की बात नहीं है। किसी ने आज तक यह काम नहीं किया है। यह काम एक वैज्ञानिक नहीं कर सकता है । उसके बस की बात नहीं है। मृगा की नाभि में सिस्टम है कि वो कस्तूरी का सृजन करता है । कस्तूरी मृगा का वीर्य है। वो कस्तूरी में बदल जाता है। पर अभी तक कोई केमिकल्स से कस्तूरी नहीं बना पाया है। इस तरह एक महापुरुष की सुरति के अंदर ताक़त है कि आपको बदल सकता है । क्या है ध्यान ? यह ध्यान ही आत्मा है। जब वहाँ पहुँचती है तो बाकी सब कुछ छूट जाता है, कुछ बचता है तो ध्यान, सुरति बचती है। वो परमात्मा के सम्मुख पहुँचती है, भौतिक शरीर छूट जाता है। वो उसका विषय नहीं है, उसमें वहाँ पहुँचने की ताक़त नहीं है।
जैसे नासिका में सूँघने की ताक़त है, पर यह काम कानों से नहीं हो सकता है। ऐसे ही वो परमात्मा केवल आत्मा से जाना जा सकता है। इसका मतलब है कि आत्मा में ताक़त है। तो वो परम चेतन हो जाती है । यही चीज़ महापुरुषों के सान्निध्य में मिलती है । उनकी हाज़िरी में बड़ा अंतर है, बड़ी अनुभूतियाँ होती हैं। उनकी सुरति से हो जाता है । कभी आप कहते हैं कि गुरु जी, हमपर | ध्यान रखना, सुरति देना, कृपा करना । ऐसा क्यों कहा गया ? जैसे बरसात में छाता रख देते हैं तो धूप नहीं लगती है । इस तरह उनकी छत्रछाया में कुछ अजीब मिलेगा, ठंडक मिलेगी । यह तय है कि मिलेगा। इस तरह उनका ध्यान सक्षम है। तभी तो साहिब कह रहे हैं— सुरति में रच्यो ससारा, सुरति का है खेल सारा । आपके व्यक्तित्व में सबसे अलग सुरति ही है। सुरति संभाले काज है, तू मत भरम भुलाय। अगर दुनिया में आपका कुछ भटक रहा है तो वो है—ध्यान, अगर उत्थान - पतन हो रहा है हैन । वो हमारी सुरति को भ्रमित कर रहा है। गुरुजनों से पास जाकर कहते हैं कि हृदय में प्रकाश कर दो। क्या किया जा सकता है? हाँ ! कौन-सा प्रकाश ? क्या बल्ब जगाना है कोई ? यह हृदय प्रकाश से क्या मतलब है? कैसा प्रकाश चाहते हैं हम ? 'शून्य महल में घोर अँधेरा, करो नाम उजियारा ।' भाइयो, यह प्रकाश यानी सुरति से गुरु आपकी आत्मा को चेतन करता है । तब हृदय के विकार दिखते हैं। कमरे में अँधकार है तो कुछ नहीं देख पाते हैं। रोशनी होती है तो सब चीज़ दिखने लग जाती है। जब गुरुजन हृदय में प्रकाश करते हैं तो मन के सब खेल नज़र आने लग जाते हैं, काम, क्रोध आदि दिखने लग जाते हैं । कोई बल्ब, कोई दिया नहीं जलाना है। क्या प्रकाश होता है ? बिलकुल । साहिब वाणी में कह रहे हैं—
नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥
तो नाम दान की क्रिया हृदय को प्रकाशित करती है । अब आप बहुत बदल गये। पहले मन जहाँ चाहता था, वहाँ बरबस खींच ले जाता था, पर अब उसका ज़ोर नहीं चल रहा है, लगता है कि हृदय प्रकाशित हो गया । स्वभाव बदल गया। अब आप चाहकर भी पाप नहीं कर पा रहे हैं। जब आप अपनी पहली ज़िदगी से अपने को तौलते हैं तो पाते हैं कि बहुत बदलाव आ गया। हर