करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 21, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंयही काम सद्गुरु का है शिष्य के कान में अपना शब्द सुनाता है। सद्गुरु भी शिष्य को अपनी सुरति से अपने समान कर देता है। कीड़े को कुछ नहीं करना है। पकड़कर भी उसे भृंगा ही लाता है, नीचे गिराकर शब्द भी उसे खुद ही सुनाता है। उस कीड़े को तो केवल सहमति जतानी है, शब्द सुनना है। पर वो सुने ही नहीं तो कैसे होगा ! यहां पर नोट करने वाली बात यह है कि अगर सद्गुरु पूरा होगा तो आप में आटोमैटिक बदलाव आना शुरु हो जायेगा । मन काबू में आने लगेगा । इसी पर साहिब कह रहे हैं-
भृंगी शब्द कीट जो माना ।
वरण फेर आपन कर जाना ॥
जो कीड़ा भृंगे का शब्द सुन लेता है, वो अपना वर्ण भूलकर उसकी तरह हो जाता है। यानी गोबरैला होगा तो वो अपनी आदतें भूलकर भृंगा हो जायेगा, ततैया होगा तो वो ततैया वाली आदतें, ततैया वाले गुण छोड़कर भृंगे के गुण अपना लेगा, उसकी तरह ही हो जायेगा ।
कोई कोई कीट परम सुखदाई ।
प्रथम आवाज़ गहे चित्तलाई ॥
पर साहिब कह रहे हैं कि कोई-कोई कीट बड़ा सुखदाई होता है, जो पहली आवाज़ में ही शब्द को ग्रहण कर लेता है और उसी की तरह हो जाता है ।
कोई दूजे कोई तीजे मानै ।
तन मन रहित शब्द हित जानै ॥
कोई दूजे और कोई तीजे शब्द में ग्रहण करता है । कुछ-कुछ क कठिन हैं, जो पहली में परिवर्तित नहीं होते हैं, दूसरी या तीसरी आवाज़ में परिवर्तित हो जाते हैं । भृंगी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे
रहई ॥
पर जो कीड़ा उसका शब्द सुनता ही नहीं, तीसरी बार भी डर जाता है या सुनना नहीं चाहता, वो फिर कीड़ा ही रह जाता है। गुरुशब्द निश्चय सत्य माने, भृंगि मत तब पावई ।
तजि सकल आसा शब्द बासा, कागा हंस कहावई ॥