भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 264 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

दिये जाने वाले धन को परमार्थ के काम में लगाने वाला होना चाहिए । यदि वो अपने निजि स्वार्थ के लिए उसका इस्तेमाल कर रहा है तो समझो—

गुरु लोभी शिष्य लालची, दोनों खेले दाँव ।

दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पत्थर की नाव।।

5. सत्यवान एवं निष्कामी : सत्य को तो संतों ने सब धर्मों का मूल माना है ।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।

जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप ।।

स्वयं सत्यवादी होने वाला गुरु ही शिष्यों को सत्य की ओर ले जा सकता है। उस सत्य तक पहुँचने के लिए साहिब ने गुरु, शिष्य और नाम- - तीनों की सत्यता पर बल दिया है।

गुरु सत्य नाम सत्य हो, आप सत्य जो होय ।

तीन सत्य जब एक हों, विष से अमृत होय।।

6. सर्वज्ञी : गुरु को सभी धर्म - शास्त्रों का ज्ञान होना चाहिए। उसे आन्तरिक

मंडलों का भी पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए। तभी वो शिष्य की शंकाओं का

निराकरण कर सकेगा । यहाँ पर साहिब कह रहे हैं-

जा गुरु ते भ्रम ना मिटे, भ्रांति न जिव का जाय ।

सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।।

7. सातवाँ लक्षण : सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी आत्मा परमात्मा में

मिल चुकी होनी चाहिए ।

सतपुरुष को जानसी, तिसका सतगुरु नाम ।।

जिस गुरु में उपर्युक्त छः लक्षण हों, उसी में अंतिम सातवाँ लक्षण भी हो सकता है और जिसमें उपर्युक्त सातों लक्षण हों, वो ही एक पूर्ण गुरु हो सकता है। ऐसा सद्गुरु परमात्मा का सच्चा प्रतिनिधि हो सकता है। यदि आप पूर्ण गुरु की तलाश में हैं तो ऊपर बताए गये सद्गुरु के प्रमुख सात लक्षणों को ध्यान में रखना । जब ये लक्षण किसी में मिल जाएँ तो समझना कि पूर्ण गुरु मिल गये । यदि ये लक्षण नहीं मिलें तो कबीर साहिब इस विषय में कह रहे हैं—

जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा।।

आमतौर पर भक्तों में एक वहम देखा गया है । वे समझते हैं कि यदि