करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतन मन वाको दीजिए, जाके विषया नाहिं ।।
नानक देव जी कह रहे हैं-
यह दुनिया सकली तजी, लियो वैष वैराग ।
कह नानक सुन रे मना, ता घट ब्रह्म निवास ।।
वर्तमान में गुरुओं को इस एक लक्षण की कसौटी पर उतारने की कोशिश करेंगे तो अधिकांश इसी में फेल हो जायेंगे । 2. निर्बन्धन : निर्बन्धन से मतलब है कि उसका भाई, बहन, बेटा, बेटी, नातेदार आदि से गहरा संबंध नहीं होना चाहिए। उसका नाता मात्र शिष्यों से होना चाहिए। यदि घर-परिवार के लोगों से विशेष प्रेम होगा तो शिष्यों द्वारा दिये जाने वाले धन को उन्हीं की सेवा में लगा देगा और परमार्थ के काम में नहीं लगायेगा। इसके अलावा अंत में पक्षपात होगा। वो जाते समय अपनी गद्दी अपने बेटे को या किसी सगे-संबंधी को देकर जायेगा, चाहे वो उसके लायक हो या नहीं। साहिब ने इस विषय पर सतर्क किया है।
बीज बिंदु नहीं चले गुरु आई । नाद बिंद से चले गुरु आई ।।
कहा कि शब्द पुत्र को ही गद्दी देनी है। यदि कोई अपने बेटे को या रिश्तेदार को गद्दी देकर जा रहा है तो समझो कि मोह-माया में फँसा है । तब आपकी आत्मा का काम नहीं हो पायेगा।
बंधे को बंधा मिले, छूटे कौन उपाय।
कर सेवा निर्बन्ध की, पल में लेय छुड़ाय ।।
3. सारग्राही : गुरु को अपनी ही कमाई से खाना है । किसी से माँग कर नहीं
खाना है। शिष्यों के धन से नहीं खाना है । साहिब तो कह रहे हैं-
माँगन मरन समान है, मत कोई माँगो भीख।
माँगन मरना भला, सतगुरु देते सीख।।
यदि गुरु स्वयं माँग कर खा रहा है तो शिष्यों को भी यही सीख देगा। वो भी कहीं पर्चियाँ कटवाकर माँगेंगे तो कहीं ऐसे ही हाथों-हाथ माँगना शुरू हो जायेंगे । इसलिए साहिब चेता रहे हैं- स्वांग यती का पहिन के घर घर माँगी भीख । पूरा सतगुरु ना मिला, सुनी अधूरी सीख । , 4. निर्लोभी : गुरु को शिष्य के धन से प्रेम नहीं होना चाहिए । शिष्य के द्वारा