करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहात्म है। शिष्य को केवल गुरु की शरणागत में रहना है। सारा काम गुरु का है । साहिब कह रहे हैं- तीन लोक नव खण्ड में, गुरु से बड़ा ना कोय |
कर्त्ता करे ना कर सके, गुरु करे सो होय ॥
गुरु ही सब करेगा। साहिब की वाणियाँ गुरुत्व को स्थापित कर रही हैं।
कबीर हरि के रूठते, गुरु की शरणी जाय ।
कहैं कबीर गुरु रूठते, प्रभु नहीं होत सहाय ॥
कबीर ते नर अँध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर हैं, गुरु रूठे नहीं ठौर॥
क्या अन्य जगह यह बात मिलती है ! नहीं, इतना महात्म गुरु का कहीं नहीं मिलेगा। यदि योग- काल में जाते हैं तो गुरु-शिष्य की लड़ाई भी होती रही है, पर संतत्व की धारा बोल रही है-
गुरु गूँगे गुरु बाँवरे, गुरु के रहिये दास ।
जो गुरु भेजें नरक में, तो रखिये स्वर्ग की आस ॥
....तो शरणागति की बात आई । शरणागति बहुत बड़ी चीज़ होती है। जो जिसकी शरण में जाता है, वो उसकी रक्षा करता है ....... पक्का करता है। I देखो, विभीषण रामजी की शरण में गया था। युद्ध में रावण ने विभीषण पर शक्ति चलायी तो रामचंद्र जी ने आगे होकर उसे अपने ऊपर लिया था। अगर आप सद्गुरु की शरण में आ जायेंगे तो फिर सद्गुरु की ताक़तें आपकी रक्षा करेंगी। तब आपको अपने कल्याण का प्रयत्न करने की ज़रूरत नहीं रहेगी।
जो सतगुरु की शरण हो ताकी । तेहि कुछ यतन रहै नहिं बाकी ।।
ताते शरणागत सब पर है । शरण गहै ते जीव उबर है ।।
अगर शरण ग्रहण के बाद भी उसे अपने कल्याण का प्रयास करने की ज़रूरत है तो फिर समझो कि अभी शरणागति हुई ही नहीं । वास्तव में शरणागति अपने-आप में बहुत बड़ी भक्ति है । शरणागत में ज्ञान भी खुद आ जाएगा, ताक़तें भी खुद आ जायेंगी, समस्त पापों का नाश हो जायेगा । शरणागति महान् चीज़ है।