भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 264 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

एक ने कहा तो खा फिर लड्डू । उसने कहा कि नहीं, मुझे नहीं खाना लड्डू । दूसरे चोर ने कहा कि पक्का कोई बात है। मारे दो- -चार तमाचे और ठूंस दिये लड्डू उसके मुँह में। फिर पहले चोर ने धीरे से कहा कि पूड़ी भी खिलाओ। वो फिर कहने लगा कि मुझे नहीं खानी पूड़ी। फिर पड़े 5-6 तमाचे...... खा पूड़ी। खिला दी वो भी । इस तरह फिर हलवा, फिर मिठाइयाँ... . सब कुछ खिला दिया । दूसरे दिन बंदा महात्मा के पास आया, चरणों पर गिर पड़ा, कहा सच है, प्रभु जब चाहे, खिला के छोड़ता है। चाहे हम नहीं खाएँ, वो तब भी खिला देगा। सच है, पहले वो सीधे तरीके से काम करता है, फिर डंडे-सोटे मारकर भी खिला देगा। यदि हममे विश्वास है, हममे श्रद्धा है, तभी हो पायेगा ऐसा। लेकिन हममें छल, कपट है, तो नहीं हो पायेगा ऐसा । इसलिए शरणागति पक्की करना.... .. दिल से । आओ, बताता हूँ, शरणागति क्या चीज़ है ।

शरणागत हो षटगुण गहिये । ऐसे ताको व्यौरा कहिये ।।

विषि निषेध निजगुरु की टेवा । दुतिये सतगुरु प्रीत अरु सेवा।।

तृतीये यह निश्चय उर धारे। मो अध बिसरि नाथ मोहि तारे ।।

चौथे यह निश्चय मन माही । प्रभु तजि मोर सहायक नाहीं ।।

कैसे हु दुख सांकरे गूढा । प्रभु तजि और सहाय न ढूँढ़ा।।

पंचम सतगुरु मूर्ति को ध्याना । ताके सन्मुख विनती ठाना ।।

प्रभु तजि मोर ठिकाना नाहीं । पावन पतित नाम प्रभु आहीं।।

मो सम पतित न कतहु निहारा । प्रभु सम और न तारनहारा।।

छठयें आपको प्रभुहिं समर्पे । तोको कबहुँ काल नहिं दर्पे ।।

यह षटगुन जो कोई धारा । शरणागत पल में कर पारा ।।

कह रहे हैं कि शरणागत में छ: गुण होने चाहिए। जिसमें ये गुण आ गये, वो पल-भर में पार हो जायेगा । गुरु के बताए नियमों का पालन करना यानी जो नियम गुरु ने बताए हैं, उनका उल्लंघन न करे । जैसे आपको नाम-दान के समय सात नियम बताए, उनमें से किसी भी नियम का उल्लंघन

करूँ जगत से न्यार · पृष्ठ 222, कुल 264 में से · BharatKosha