करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं करना । यदि कहा है कि माँस नहीं खाना, तो कभी नहीं खाना । जुआ नहीं खेलना कहा है तो कभी नहीं खेलना । यदि किसी भी नियम का उल्लंघन करोगे तो बुद्धि पर कुप्रभाव पड़ेगा, कुंद हो जायेगी बुद्धि। आपको ज़रूरत ही क्या पड़ी है छल, कपट की, चोरी की । एक समय खाना मिले तो उसी में गुज़ारा कर लेना, उसी में खुश रह लेना, पर भूले से भी कभी चोरी नहीं करना । किसी भी नियम के विरुद्ध नहीं जाना । यह बहुत बड़ी भक्ति है । यह शरणागति की आधारशिला है, पहली सीढ़ी है। सतगुरु प्रीत अरु सेवा यानी तन, मन, धन से गुरु की सेवा करें। जब आपने नाम लिया तो मैंने आपसे एक बात बोली, कहा कि अपना तन, मन, धन मुझे दो। पर ऐसे नहीं; कहा— आँखें बंद करके सच्चे दिल से दो । आपने कहा- दिया । आपने दे दिया। गोरखनाथ जिसे दीक्षा देता था, फिर उसका तन उसे वापिस नहीं करता था, अपने साथ-साथ गेड़े खिलाता था । पर हमने ऐसा नहीं किया। हमने आपका तन आपको वापिस कर दिया, कहा - आज से हमारा मानकर इसकी सुरक्षा करना, हमारी अमानत मानना । आज के बाद इससे कोई ग़लत काम नहीं करना । आपको वापिस इसलिए किया कि घर में माता-पिता होंगे, बड़े- बूढ़े होंगे, उनकी सेवा करना । पर जब ज़रूरत होगी तो बुला लूँगा। शिष्य को चाहिए कि जब-जब समय मिले, गुरु- आश्रम में आकर सेवा करे, जिसके भी वो लायक हो । तन से सेवा करोगे तो तन के रोग नहीं सतायेंगे । फिर आपका मन भी हमने आपको वापिस कर दिया, कहा- घर - परिवार के पालन के लिए इसकी ज़रूरत पड़ेगी, इसलिए इसे भी अपने पास ही रखो। पर आज के बाद इसका इस्तेमाल कहीं ज़लत जगह नहीं करना, किसी पर झूठा मुकद्दमा नहीं करना । शास्त्रानुसार शिष्य को अपनी कमाई का 10वां अंश गुरुजनों की सेवा में लगाना चाहिए, पर मैंने आपसे यह नहीं कहा, क्योंकि यदि आप नहीं दे पाओगे तो गुरु का शब्द कट जायेगा । इसलिए शब्द में आपको नहीं बाँधा । फिर तीसरी चीज़ थी - आपका मन । यह हमने आपको वापिस नहीं किया, कहा - इसे मेरे पास ही रखना । यह मन वापिस क्यों नहीं किया ? क्योंकि इसी मन से रिश्ते-नाते हैं,