भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

नहीं करना । यदि कहा है कि माँस नहीं खाना, तो कभी नहीं खाना । जुआ नहीं खेलना कहा है तो कभी नहीं खेलना । यदि किसी भी नियम का उल्लंघन करोगे तो बुद्धि पर कुप्रभाव पड़ेगा, कुंद हो जायेगी बुद्धि। आपको ज़रूरत ही क्या पड़ी है छल, कपट की, चोरी की । एक समय खाना मिले तो उसी में गुज़ारा कर लेना, उसी में खुश रह लेना, पर भूले से भी कभी चोरी नहीं करना । किसी भी नियम के विरुद्ध नहीं जाना । यह बहुत बड़ी भक्ति है । यह शरणागति की आधारशिला है, पहली सीढ़ी है। सतगुरु प्रीत अरु सेवा यानी तन, मन, धन से गुरु की सेवा करें। जब आपने नाम लिया तो मैंने आपसे एक बात बोली, कहा कि अपना तन, मन, धन मुझे दो। पर ऐसे नहीं; कहा— आँखें बंद करके सच्चे दिल से दो । आपने कहा- दिया । आपने दे दिया। गोरखनाथ जिसे दीक्षा देता था, फिर उसका तन उसे वापिस नहीं करता था, अपने साथ-साथ गेड़े खिलाता था । पर हमने ऐसा नहीं किया। हमने आपका तन आपको वापिस कर दिया, कहा - आज से हमारा मानकर इसकी सुरक्षा करना, हमारी अमानत मानना । आज के बाद इससे कोई ग़लत काम नहीं करना । आपको वापिस इसलिए किया कि घर में माता-पिता होंगे, बड़े- बूढ़े होंगे, उनकी सेवा करना । पर जब ज़रूरत होगी तो बुला लूँगा। शिष्य को चाहिए कि जब-जब समय मिले, गुरु- आश्रम में आकर सेवा करे, जिसके भी वो लायक हो । तन से सेवा करोगे तो तन के रोग नहीं सतायेंगे । फिर आपका मन भी हमने आपको वापिस कर दिया, कहा- घर - परिवार के पालन के लिए इसकी ज़रूरत पड़ेगी, इसलिए इसे भी अपने पास ही रखो। पर आज के बाद इसका इस्तेमाल कहीं ज़लत जगह नहीं करना, किसी पर झूठा मुकद्दमा नहीं करना । शास्त्रानुसार शिष्य को अपनी कमाई का 10वां अंश गुरुजनों की सेवा में लगाना चाहिए, पर मैंने आपसे यह नहीं कहा, क्योंकि यदि आप नहीं दे पाओगे तो गुरु का शब्द कट जायेगा । इसलिए शब्द में आपको नहीं बाँधा । फिर तीसरी चीज़ थी - आपका मन । यह हमने आपको वापिस नहीं किया, कहा - इसे मेरे पास ही रखना । यह मन वापिस क्यों नहीं किया ? क्योंकि इसी मन से रिश्ते-नाते हैं,

इसी से पूरी दुनिया है, इसी कारण आत्मा मेरा-मेरा कह रही है। जब मन गुरु ने ले लिया तो आपका अपना मान कैसा रहा ! इसलिए गुरुजनों से कभी मान नहीं चाहना । उनकी बात काटकर कभी अपनी न चलाना ।

गुरु की बात मान सब लीजे । सत्य असत्य विचार न कीजे ॥

अपना दिमाग़ नहीं लड़ाना कि गुरु जी सत्य कह रहे हैं या असत्य। जो कहें, मान लेना; जो कहें, बिना अपने तर्क लड़ाए कर देना। जीवन में कभी गुरु- आज्ञा न टालना। गुरु के आगे अपनी नहीं चलानी है, चाहे आपको आपके हित में लगे या नहीं । गुरु की सेवा ही सफल है । यह मानव-तन में सेवा को मौका मिला है तो इससे गुरु की सेवा कर लो। इस शरीर को तो निचोड़ देना है, क्योंकि- आखिर यह तन ख़ाक मिलेगा... इसलिए जुट जाना है। बाकी जितने भी कर्म हैं, किसी खाते में नहीं आयेंगे। यदि दिन-रात खेती-बाड़ी की, नौकरी-पेशा किया, कोई काम नहीं आयेगा। पर गुरु की जो सेवा की, वो ही काम आयेगी। यदि शिष्य गुरु की सेवा नहीं किया तो यह अपराध है । इसलिए यह ज़रूरी है।

नानक जो गुरु सेवे अपना, हौं तिस बलिहारी जाऊँ ॥

गुरु-सेवा बहुत बड़ी बात है । साहिब कह रहे हैं-

गुरु सेवे कटे दुख पापा । जनम जनम को मिटे सन्तापा ॥

गुरु की सेवा सदा चित दीजे । जीवन जन्म सुफल करि लीजै ॥

चौबीस रूप हरि आपुहि धरिया । गुरु सेवा करि सबहि बिरिया ॥

शिव बिरंचि गुरु सेवा कीन्हा | नारद दीक्षा ध्रुव को दीन्हा ॥

सकल मुनि गुरु सेवा चाही । गुरु सेवा करि पंथ अवगाही ॥

गुरु की सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हंसा भवजल आवे॥

गुरु-सेवा की बड़ी महिमा है । बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने भी गुरु- सेवा की। हरि ने भी अवतार धारण करके गुरु- सेवा में मन को लगाया। जिसने मानव-तन को पाकर गुरु धारण नहीं किया वो तो अभागा है ही, पर जिसने गुरु धारण करके फिर उनकी सेवा नहीं की, वो महामूर्ख है।

योग दान जप तीर्थ नहाना । गुरु सेवा बिनु निष्फल जाना ॥

गुरु सेवा बिनु बहु पछतावे । फिरि फिरि यम के द्वारे जावे ॥

गुरु सेवा बिनु कौन जो तारे । भव सागर से बाहर डारे ॥

गुरु सेवा बिनु कछु न सरि है । महाअन्ध कूपै महँ परि है ॥

गुरु सेवा बिनु घट अँधियारा । कैसे प्रकटे ज्ञान उजियारा॥

गुरु सेवा बिनु द्वन्द अँधेरा । गुरु सेवा बिनु काल को चेरा ॥

गुरु सेवा बिनु प्रेम विहूना । दिन दिन मोह होय भ्रम दूना ॥

साहिब कह रहे हैं गुरु-सेवा के बिना योग, जप, तप, तीर्थ सब व्यर्थ हैं। यदि गुरु की सेवा नहीं की तो बाद में पछताना ही पड़ेगा । गुरु-सेवा के बिना ज्ञान का प्रकाश नहीं हो सकता है। गुरु सेवा से हृदय प्रकाशित होता है । जिसमें गुरु-सेवा का भाव नहीं है, वो गुरु- प्रेम से रहित है। शिष्य को चाहिए कि गुरु-सेवा करते हुए मन में अहंकार न आने दे। यदि अहंकार होगा तो गुरु सेवा किसी काम की नहीं रह जायेगी । गुरु के अधीन होकर ही रहना है, ताकि उनकी कृपा मिलती रहे ।

गुरु आगे राखे माथ । करै विनय दुख मेटो नाथ ॥

अहौं अधीन तुम्हारे दासा । देहू अपने चरनन वासा ॥

यह तन मैं तोहि भेंट चढ़ायो । अपनी इच्छा कुछ न रखायो ॥

जो चाहो सो तुम अब करो । या भांड को जेहि विधि भरो ॥

भावै धूप छाँह में डारो । भावै बोरो भावै तारो॥

गुण पौरुष कछु ओ नहिं मेरो । सब विधि शरण गही गुरु तेरो ॥

मैं अब बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सो करिये पारी ॥

अपना कीजै गरिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गोसाईं ॥

बहु विधि विनती गुरु से करई । मान मोह हृदय नहिं धरई ॥

देखि विनय गुरु होहिं अनन्दा | तब पावै सिख परमानन्दा ॥

देखि प्रसन्नता गुरु की भाई । गुरु ते कहिये शीश नवाई ॥

ऋद्धि सिद्धि फल मैं कछु नहिं चाहूँ । जगत कामना को नहिं लाहूँ ॥

चौरासी में बहु दुख पायो । ताते शरण तुम्हरी आयो ॥

होहु दयाल दया अब कीजे । डूबत भव में बाँह गहीजे ॥

शिष्य का विनय भाव देखकर गुरु शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते हैं। जब गुरु प्रसन्न हो जाएँ तो जो कहना है, कह लें ।

जितनी महिमा गुरु-सेवा की है, उतनी किसी अन्य चीज़ की नहीं । साहिब कह रहे हैं— नामवंत कहैं कबीर धर्मदास से, गुरुवंता कोई एक ॥ बहुते मिले, ज्ञानवंत अनेक । गुरु-सेवा में सब फल मिल जायेंगे, सब सुखों को प्राप्ति हो जायेगी। साहिब कह रहे हैं—

गंगा यमुना बद्रीश समेते । जगन्नाथादि धाम हैं तेते॥

सेवे फल प्राप्त होय न तेतो । गुरु सेवा में पावै फल तेतो ॥

कह रहे हैं कि गंगा, यमुना, बद्रीनाथ, जगन्नाथ आदि धाम जाकर भी वो फल प्राप्त नहीं होने वाला, जो फल गुरु की सेवा में मिल जायेगा ।

यह निश्चय उर धारे, मो अघ बिसरि नाथ मोहि तारे ॥

यानी भरोसा रहे, चाहे मैं कुछ करूँ या नहीं, मेरे गुरु मुझे पार कर देंगे। यह विश्वास, यह भरोसा बहुत बड़ी चीज़ है । तन सबको नहीं देते। पर आपने दे दिया। एक भरोसा, एक विश्वास था । मैंने नाम-दान के समय आपसे कुछ नहीं माँगा, केवल विश्वास ही माँगा था । विश्वास क्या ? विश्वास यह कि कभी झूठ नहीं बोलते । विश्वास यह कि—

गुरु को अखंड ब्रह्म कर जाने । गुरु को नहीं मानुष कर माने ।।

यह निश्चय मन माहीं । गुरु तजि मोर सहायक नाहीं ॥

गुरु के अलावा कोई सहारा न ढूँढ़ना । यह भरोसा रखना कि के अलावा मेरा कोई सहायक नहीं हो सकता है । जब सच्चा सद्गुरु मिल गया तो कहीं माथा पटकने की आपको ज़रूरत ही क्या पड़ी है ! मत करो ऐसा । दो किश्तियों में पाँव मत रखो। सद्गुरु मिल गया तो सद्गुरु की ताक़त सुपर है, वहीं सब कुछ मिल जायेगा । नहीं भी मिला तो भी उसी की रज़ा में रहना । | चाहे कितनी भी आफत आ जाए, यही सोचना-

दुनिया के लखां सहारे, मेरा सहारा तू है ।।

यह नहीं कि थोड़ी-सी मुसीबत आई तो कहीं सयाने के पास चल पड़े तो कहीं ज्योतिषि के पास । ऐसा न हो।

गुरु शरणागति छाड़ि करि, करै भरोसा और ।

सुख सम्पत्ति की कह चली, नहीं नरक में ठौर ।।

तो शरणागति पक्की रखना ।

एक आस विश्वास तुम्हारी । पड़ा द्वार सब विधि मैं हारी।।

विश्वास को ठीक से समझना । कच्चा जीव विचलित हो जायेगा । मुझे एक उदाहरण याद आ गया। एक माता आई, कहा- माता : सिर में दर्द होता है मैं : भजन करो माता : भजन भी करती हूँ, आरती भी करती हूँ, माता की जोत भी जगाती हूँ। यह क्या था! मतलब कि वो भक्ति ठीक से नहीं समझ पाई। एक पागल लड़के को उसके माता-पिता मेरे पास लाए, कहा कि आपका नाम लेकर कुछ देर ठीक रहा, फिर नुक्स हो गया है। मैंने लड़के से पूछा तो उसने कहा कि आपकी कृपा है, कुछ नहीं, ठीक हूँ । ये ऐसे ही कभी सयाने के पास ले जाते हैं, कभी डोरा बाँध देते हैं। मेरा पूरा विश्वास है, पर ये मानते नहीं है। तो मैं पूछना चाहता हूँ कि यह कितनी कपट थी ! बस, यह नहीं करना, यह विश्वास नहीं है ।

सद्गुरु मूर्ति को ध्याना । ताके सन्मुख विनती ठाना ॥

यानी गुरु का ही ध्यान करता रहे। सोच यही हो -

मो सम पतित न कतहुँ निहारा । प्रभु सम और न तारनहारा ।।

गुरु के आगे कभी अपने गुणों का बखान नहीं करना, हमेशा अपने दोषों को ही बताना ताकि वे दयाल हों और दोषों को निकाल दें। मैं कामी मैं कुटलू, मैं अवगुण की खान । मो पर कृपा न छाड़िए,

दास आपनो जान ॥

अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार । भावे बंदा बक्श दो, भावे गर्दन

मार ॥

सतगुरु दीन दयाल जी, तुम लग मेरी दौड़ । जैसे काग जहाज पर सूझत कतहु न

ठौर ॥

यानी इन विरह की प्रार्थनाओं से मिल रहा है कि मैं सक्षम नहीं हूँ । अपनी बढ़ाई करोगे तो कुछ नहीं रह जायेगा । साहिब बड़ा प्यारा शब्द कह रहे हैं—

गुरु को शब्द न सुने अज्ञानी । भवसागर डूबे अभिमानी ॥

सतगुरु की मरयाद न धरई । लख चौरासी कुण्ड में परई ॥

साहिब कह रहे हैं कि हमेशा गुरु-मर्यादा में रहना है। जो गुरु-मर्यादा का उलंघन करता है, वो चौरासी में ही पड़ेगा।

गुरु को देख धरत अभिमाना । व्यास बचन पड नरकनिधाना ॥

जो गुरु के आगे अपना अहंकार दिखाता है, वो तो सीधा नरक में जायेगा।

गुरु को ज्ञान मेटि मत थापी । तीन लोक में बड़ो ते पापी ॥

गुरु को मेटि बखानत आपा । धरती भार मरत तेहि पापा ॥

गुरु से ऊँचा चढ़ि बैठे । सात कुण्ड नरक में पैठे॥

जो गुरु के ज्ञान को काटकर अपना ज्ञान दिखाता है, वो तीन लोक में सबसे बड़ा पापी कहलाता है । ऐसे पापी का भार धरती भी सहन नहीं कर पाती है। वो तो गुरु से ऊँचा चढ़कर बैठने का प्रयास कर रहा है। इसलिए जो ऐसा कर रहा है, वो सप्त कुंभी नरकों में ही पड़ता है।

गुरु से उलटा बचन सुनावै । सात जनम कोढ़ी को पावै ॥

गुरु को उलट सुनावै बैना । सात जनम अँधा होय सो नैना ॥

जो गुरु से बहस करता है, उन्हें उलटे बचन सुनाता है, वो सात जन्मों तक कोढ़ी का शरीर पाता है या फिर सात जन्म अँधा होता है ।

गुरु के सम्मुख हमेशा विनय के शब्द ही बोलने हैं।

दोउ कर जोरि गुरु के आगे । करि बहु विनती चरनन लागे ॥

अति शीतल बोलै सब बैना । मेटे सकल कप के बैना ॥

हे गुरु तुम हो दीनदयाला। मैं हूँ दीन करो प्रतिपाला॥

तुम बन्दीछोर अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥

यो अधीन होय शिष जबहीं । शिष पर कृपा करै गुरु तबहीं ॥

साहिब कह रहे हैं कि जब शिष्य गुरु के अधीन हो जाता है तब ही गुरु की कृपा मिलती है ।

छठयें आपको प्रभुहिं समर्पे । ताको कबहुँ काल नहिं दर्पे ॥

यानी खुद को समर्पित कर दे। आप अपने जीवन का सब भार साहिब पर सौंपकर देखना। दिल में यही भाव रखना-

जीवन का सब सौंप दिया अब भार तुम्हारे हाथों में ।

है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में ।।

समर्पण ध्यान-भजन से भी बढ़कर है । यदि श्रद्धा है तो बहुत लाभ मिल जायेगा। उदाहरण देता हूँ। एक बंदे ने नाम लिया; बड़ा भोला था। नाम लेने के कुछ समय बाद वो आया, कहा- गुरु जी, जबसे नाम लिया है, बड़े मज़े में हूँ। वो कहने लगा, गुरु जी, आपने नाम-दान के समय कहा था न कि तन, मन, धन तीनों आँख बंद करके दो। मैंने सोचा, सच में देने पड़ रहे हैं। मैंने दे दिये गुरु जी । मैंने सोचा, अब बीवी, बच्चे, घर सब आपका, क्योंकि सब कुछ दे दिया था। गुरु जी, मेरी छोटी-सी दुकान है। जब मैं खोलता हूँ तो आपकी समझकर। 24 घंटे गुरु जी आप खड़े रहते हैं, मेरा सब काम करते हैं। सच में गुरुजी, पूरी दुकान आप चला रहे हैं । कहीं घाटा होने वाला हो तो खुद ही खड़े हो जाते हो। मेरा तो कुछ चल ही नहीं रहा है। अब आप - ही - आप हो । मैं तो समझ रहा हूँ कि बीवी भी आपकी, बच्चे भी आपके, बस, मैं तो नौकर हूँ, जिसे आपने अपने आश्रम में न रखकर घर-परिवार की सेवा का काम सौंप दिया है। मेरी सारी ममता ही ख़त्म हो गयी है। उसने बहुत कुछ कहा। बड़ा भोला था वो, कहा—गुरु जी, एक बात बताऊँ, कभी-कभी रात को आप आते हो, मुझे घुमाने भी ले चलते हो । देखा न, कितना भोला था ! उसने सच में समर्पण कर दिया था, इसलिए साहिब को उसका सारा काम करना पड़ा। क्या तत्व की प्राप्ति में हम भागीदार हो सकते हैं? हमें क्या करना है ? साहिब ने एक बात बोली । इसमें वज़न है । भृंग का प्रमाण दिया। वो किसी भी कीट को पकड़ कर आवाज़ से बदल देता है । पर यहाँ एक शर्त है। भृंगी शब्द कीट जो माना ।

वरण फेर आपन कर जाना ॥

कोई कोई कीट परम सुखदाई |

प्रथम आवाज़ गहे चित्तलाई ॥

कोई दूजे कोई तीजे मानै । तन मन रहित शब्द हित जानै ॥

भृंगी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे रहई ॥

कोई-कोई कीट पहली आवाज़ में ही शब्द को ग्रहण कर लेता है, कोई दूसरे और कोई तीसरे शब्द में ग्रहण करता है । कुछ-कुछ कीट कठिन हैं, जो पहली में परिवर्तित नहीं होते हैं। हालांकि वो आवाज़ सुनाई दी, पर कीट डर जाता है, भयभीत हो जाता है, संशय में आ जाता है। जैसे माताएँ बच्चों को बंदगी करवाने महापुरुष के पास ले जाती हैं तो वो बच्चा रोता है, सोचता है कि शायद डॉ० है, मुझे टीका लगा देगा। क्योंकि वो डॉ० के पास जा चुका होता है। ऐसे ही कीट को शंका होती है कि कहीं यह मुझे खा न ले । पर वो हितैषी है, सुखदायी है।

गुरु शब्द निश्चय सत्य माने, भृंगि मत तब पावई ।

तजि सकल आसा शब्द बासा, कागा हंस कहावई॥

ऐसे ही गुरु-शब्द सुखदाई है । भृंगे की भू-भू की प्रक्रिया में स्पन्दन है। कुछ कीट पहले में नहीं हो पाते हैं परिवर्तित । क्यों नहीं हुए। क्योंकि समर्पित नहीं होते । जब तक समर्पित होकर नहीं सुनता, उसका परिवर्तन नहीं हो पाता। फिर तीन बार में भी न हो तो भृंगा उसे छोड़ देता है, दूसरे को ढूँढ़ता है। तो पुनि कीट आसरे रहई .... फिर नहीं बन पाता है वो भृंगा ..... कीट ही रह जाता है । स्वामी परमानंद जी ने इसी बात को बड़े प्यारे शब्द में कहा है-

भृंगी जो आन कीट को खुद रंग लगावे ।

आवाज़ अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥

वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।

गुरु शब्द से फिलफौर रंग पलट सो जावे ॥

कोई और क़िस्म कर्म को ज़िनदार न देखे।

भृंगी जो अपने ढंग कीट ढूँढ़ के लावे ॥

वह ढूँढ़ काम अपने ही हम रंग हमेशा ।

दिल दे के उसको तबही अपने रूप बनावे ॥

दिल उसको देना चाहिए दिलदार कोई हो ।

हिंदू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

हैं कीट लाख सदमें कोई एक ही मेरा ।

जहाँ जाके बार बार भृंग करता है फेरा ॥

वही कीट जेहल अपने से गुरुबात न माने ।

तब जाके पास उसके भृंग करता है डेरा ॥

कहता है कीट तुमको लगी आन खराबी ।

नहीं अक्ल ठिकाने रही नहीं इल्म है तेरा ॥

तू बात मेरी मान अबकी बार कान धर।

हो मेरी तू दमशक्ल तेरा होवे निबटेरा ॥

दिल उसको देना चाहिए दिलदार कोई हो ।

हिंदू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

लाखों में कोई कीट ही होता है, जिसे भृंग बनाने के लिए कीट बार- बार फेरा लगाता है। वो उसको अपना दिल देकर फिर अपने समान करता है । इसलिए कह रहे हैं कि दिल उसे देना चाहिए, जो दिलदार हो, जो सच्चा ख़रीदार हो। इस तरह समर्पण चाहिए। मन में विचार आ सकता है कि क्यों चाह रहा है, क्या ज़रूरत है । यथार्थ में तीनों बंधनकारक हैं। आत्मा मानती है कि धन आवश्यक है तो उसके लिए कई तरह की क्रियाएँ करती है । आख़िर तन, मन, धन की ज़रूरत क्या पड़ी? क्यों लिया जा रहा है हमसे ? आत्मा ने माना कि तन मेरा है। जैसे माना, एक त्रुटि आ गयी । आत्मा देहाभास में आ गयी तो काम करने लगी।

जबते जीव भयो संसारी । छूटे न ग्रंथी न होय सुखारी ॥

फिर धन को अपना मान लिया, उसके लिए बड़े प्रयास कर रही है। चाहे उचित हो, चाहे अनुचित हो, पर काम कर रही है। इस तरह मन से पूरा ब्रह्माण्ड है । यही बंधनकारक है । ये तीनों लिये। क्या मतलब है ? तन दिया, एक भ्रम समाप्त हुआ कि शरीर हूँ। धन लिया तो लोभ समाप्त हुआ । मन क्या है ? यानी बुद्धि, अहंकार आदि का इस्तेमाल नहीं करना । ऐसा क्यों ? जो भी इस मन से करोगे, धोखा होगा। जो भी बुद्धि से काम कर रहे हैं, जो भी चित्त से काम कर रहे हैं, जो भी अहंकार से कर रहे हैं, विनाशकारी हैं। ये चारों बहुत भ्रमित करते हैं।

इसलिए कहा कि समर्पित हो जाओ। तब आप गुरुजी की बात को स्वीकार करेंगे। जो भी कहें, स्वीकार करना है । ....तो ये छ: गुण जिसमें आ गये, वो पल में पार हो जायेगा। उसे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है । जैसे बच्चा जब तक छोटा होता है, जब तक माँ की शरण मे रहता है, तब तक माँ उसका कितना ख़्याल रखती है ! हाथों से खाना खिलाती है, पानी पिलाती है, सुलाती है, सब काम करती है। लेकिन जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो फिर थोड़े इतना ख़्याल रखती है । खाना बनाकर आगे ज़रूर रख देती है, पर अपने हाथों से खिलाती थोड़े है। ऐसे ही जब तक जीव सद्गुरु की शरण में रहता है, तब तक सद्गुरु को उसका बड़ा ध्यान रहता है। ज्ञानी शिष्य की चिंता गुरु को ज़्यादा नहीं है । इसलिए हमें हमेशा गुरुजनों के सामने छोटे बनकर रहना है, शरणागति में रहना है ताकि सद्गुरु को बराबर हमारा ध्यान रहे और हम सहजता से अपने लक्ष्य को पा लें।

बलिहारी गुरु आपने, घड़ी-घड़ी सौ-सौ बार ।

मनुष्य से देवता किया, करत न लागी बार ॥

चाह मिटी चिन्ता, मिटी मनुआ बेपरवाह ।

वोही शहनशाह है, जिसको नाहीं चाह ॥

12. पाखण्डियों से बचना

पाखण्डियों से बचना

इस तीन लोक में सभी काल - पुरुष की भक्ति कर रहे हैं।

गण गन्धर्व ऋषि मुनि अरु देवा, सब मिल लाग निरंजन सेवा ।।

आख़िर दुनिया के लोग ग़लत भक्ति में क्यों लगे हैं? कुछ कारण तो होगा!

अगर हम अपने आस-पास देखें तो एक बात ज़ाहिर होती है कि सभी ग़लत भक्तियों में लगे हैं । कोई पेड़ों की, कोई नदियों की, कोई पत्थरों की भक्ति कर रहा है। आख़िर इंसान ने ग़लत तरह की भक्तियाँ क्यों कीं ? इसमें आदमी का दोष नहीं है। आदमी को ग़लत भक्ति में लगाया गया। कुछ लोगों ने अपने हितों के लिए ऐसा किया। यदि कोई किसी पहाड़ पर कोई मूर्ति गाड़कर कह देता है कि फलाने पहाड़ पर त्रेता युग की मूर्ति निकल आयी है तो पूरी दुनिया वहाँ जुट जाती है। वो कहते हैं कि यहाँ माथा टेको तो सब कार्य पूरे हो जायेंगे। ऐसे ही लोग किसी की समाधि बनाकर कहते हैं कि फलाने का स्थान है। पास में कोई छपड़ी बना देते हैं। नाटक है कि जो यहाँ नहायेगा, उसकी खुजली ख़त्म हो जायेगी, रोग ख़त्म हो जायेंगे । आदमी को वैसे भी बीमारियाँ ज़्यादा लगी हुई हैं, इसलिए कई पहुँच जाते हैं । फिर पानी तो इतना गन्दा होता है कि यदि कोई अच्छा भला भी हो, वो भी बीमार हो सकता है । पर दुनिया कहाँ मानती है ! दो डुबकियाँ लगाती है, पैसा चढ़ाती है समाधि पर और घर आ जाती है | विचार तो कोई करता ही नहीं । कोई यह नाटक समझने का प्रयास नहीं करता। यही है अपने स्वार्थ में, ग़लत भक्ति में लगाना । इसी बहाने पाखण्डी लोग धन इकट्ठा करते हैं। पूरे समाज को स्वार्थियों ने भटका दिया है, इन्हीं चीज़ों में । 'खरे सयाने सबही भटके, तीन लोक में सबही अटके।' इन चीज़ों का प्रचार भी ज़ोरदार है । लोग भोले भाले हैं; उन्हें भ्रमित किया जाता है।

फिर गाँव के कुछ बदमाश लोग त्यौहारों के उपलक्ष्य में घर-घर से चन्दा इकट्ठा करते हैं। सबसे जबरन चंदा लिया जाता है । एक सदस्य के 50-100 रुपये तय होते हैं । कुछ ग़रीबों को तो उधार लेकर देना पड़ता है चंदा । कारण बड़ा ही प्यारा होता है - देवताओं की पूजा और भण्डारा । वाह ! क्या भक्ति है! फिर नारे क्या होते हैं ! यहाँ आकर बकरा चढ़ाओ, पैसे चढ़ाओ, खुश करो देवतों को ...... मनोकामना पूर्ण होगी। साहिब बार-बार समझा रहे हैं—'ये केवल भ्रम के उत्पाती' । इनका लक्ष्य है कि आदमी भटकता रहे। मैं जितना पाखण्ड का विरोध डंके की चोट पर कर रहा हूँ, उतना कोई नहीं। आए दिन छल-कपट बढ़ता जा रहा है। कोई तांत्रिक बनकर, कोई ज्योतिषि बनकर, कोई सयाना बनकर, तो कोई पुजारी बनकर दुनिया को लूट रहा है । मेरी लड़ाई किसी देवी-देवता से नहीं है, किसी जाति विरादरी से नहीं है । मेरा लक्ष्य पाखण्डियों से सावधान करके यह बताना है कि ईश्वर आपमें है ...... कहीं बाहर नहीं। अच्छे पढ़े-लिखे लोगों को भी भ्रम में डाल दिया गया है। घर में सिनक निकल आए तो सयाना आकर कहता है कि फलाने बाबा जी निकल आए हैं। फिर कहता है कि मेरे पास आओ, मैं सब ठीक कर दूँगा । फिर पूरे परिवार वालों को ढोल बजा-बजाकर नचाता है । कुछ समय पहले राँजड़ी में ढोल बज रहा था । एक माई उठकर नाचने लगी। मैंने देखा; समझ गया कि इसे सयाने ने खूब नचाया है। ढोलक पर नाचते-नाचते उसे आदत हो गयी थी । एक लड़के को चौकी आती थी । जब उसे नाम दिया तो चौकी आना बंद हो गयी। एक दिन वो कहने लगा कि दिल करता है कि सिर घुमाऊँ। मैंने कहा- नहीं ! अब यह काम नहीं करना । व्यायाम कर और इस बीमारी से छूट। सयानों के इस भ्रम में केवल अनपढ़ लोग ही नहीं फँसे हैं। एक इंजीनियर के घर में सिनक निकल आई। अब वो एक दिन अपने घर ले आया। सारा घर दिखाया। फिर उस कमरे में ले गया, जहाँ सिनक निकली हुई थी।

कहा-इधर भी नज़र डालो । वहाँ मखमल का कपड़ा डाला था। मैंने सोचा कि कीमती सामान होगा; कहा-उठा कपड़ा । जैसे ही उसने कपड़ा उठाया, मुझे फौज की याद आ गयी । फौज में जहाँ लड़ने जाना हो, उसके लिए छोटी- छोटी पहाड़ियाँ बना लेते हैं। वहाँ भी ऐसी ही पहाड़ियाँ बनी थीं। मैंने पूछा- क्या है? कहा-मेरे दादे की हत्या है। मैंने कहा- यह तो सिनक है। उसने कहा- नहीं ! नहीं ! हत्या है। मिटाओ तो और हो जाती है । सिनक नुक़सानकारक है । इसका घर तोड़ो तो जल्दी बना लेती है । अगली बार मजबूत बनाती है। पर सयाना तो वहाँ आकर ढोल बजाता था, बुद्धू बनाकर पैसे लूटता था । मैंने सोचा, यदि इसे कहूँगा कि हटा तो यह नहीं समझेगा, क्योंकि सयाने ने इसे खूब वहम में डाला हुआ है। इसलिए कहा- गुरुवार के दिन 5 से 6 बजे के बीच में साहिब का नाम लेकर हटा देना । ..इसी तरह पाखण्डी तपके ने सब मत-मतान्तरों को भी ख़त्म कर दिया। अन्य पंथों के लोग सब काम कर रहे हैं, वहम में है । मुझसे भी तो पाखण्डी यही कह रहे हैं कि चंदा भी देने दो अपने लोगों को, हत्या भी मनाने दो, तब ठीक है । फिर नहीं करेंगे आपकी निन्दा | पाखंडी बड़े दाँव लगायेंगे। वो आपको भक्ति से हटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनसे बचना। पाखंडी आपको कसौटी पर खड़ा करेंगे। वो आपका विरोध भी जमकर करेंगे। पर आप दृढ़ रहना । | आपको कसौटी पर खड़ा किया जायेगा यह दुनिया बड़ी ही ज़ालिम है । परम - पुरुष की सत्य-भक्ति में को लाने के लिए मुझे बड़ा ही संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि काल - पुरुष का संसार है, जीव आसानी से आता नहीं है । फिर जो भूले-भटके इस भक्ति में पहुँचते हैं, दुनिया उन्हें भी इस भक्ति से हटाने में लगी रहती है । हमारे नामी को कहीं ठोकर भी लग जाए तो कहते हैं कि बड़े साहिब बंदगी, साहिब बंदगी करते रहते हो; देखा न, लगी न ठोकर । लो, कर लो अब बात! सुख-दुख से भरी इस दुनिया में कसौटी

तो देखो न, कैसी ली जा रही है ! आत्मज्ञान को नहीं देखा जा रहा है, भक्ति के गुणों को नहीं देखा जा रहा है, अंदर की शांति को नहीं देखा जा रहा है। यदि देखा जा रहा है तो नश्वर संसार में मिलने वाले दुखों को। यदि यह कसौटी है तो फिर महापुरुषों को तो दुख ही सहने पड़े हैं। कबीर साहिब को 52 कसनी सहनी पड़ी, गुरु नानक देव जी को जेल में जाना पड़ा, अर्जुन देव जी को तत्ते तवे पर बैठना पड़ा, पलटू साहिब को जिंदा जलाया गया । कितना कष्ट मिला ! मीराबाई को कितने कष्ट दिये गये! काल - पुरुष के इस संसार में सत्य - भक्ति का संदेश देने वाले महापुरुषों पर यदि ज़ुल्म होते आए हैं तो सत्य - भक्ति करने वालों को तो दुख मिलने ही हैं। काल - पुरुष के इस संसार से निकलकर आप अपने देश जाना चाहते हैं तो काल - पुरुष रोकने का प्रयास तो करेगा ही । यह तो एक पहलू बताया। अब दूसरा पहलू बताता हूँ । जितनी रक्षा जीव को सत्य-भक्ति में मिलती है, उसकी कल्पना भी काल-पुरुष की भक्ति करने वाला नहीं कर सकता है । जितना संरक्षण सच्चा नाम जीव को देता है, उसका लेश मात्र भी काल - पुरुष का नाम नहीं देता है । काल - पुरुष की भक्ति करने वाले जीव को आगे तो दुख भोगने ही हैं, भवसागर में फिर-फिर आना ही है, पर इस संसार में भी वो दुखी है। पहले तो उसमें अंदर की शांति नहीं होगी; फिर कोई मुसीबत आए तो सुरक्षा भी नहीं मिलेगी। क्योंकि यह काम केवल सद्गुरु करता है जबकि काल - पुरुष की भक्ति में सद्गुरु नहीं है, मात्र एक गाइड है, जो पोथियाँ पढ़कर जीवों को ईश्वर-प्राप्ति का केवल मार्ग बता रहा है। तो दूसरे पहलू में आप देखना, दुनिया में बड़ी-बड़ी घटनाएँ हो रही हैं, कई लोग मर रहे हैं, पर उनके लिए कोई कुछ नहीं कह रहा है। मैं पूछना चाहता हूँ कि यदि परमात्मा का संसार है तो वो परमात्मा रक्षा क्यों नहीं करता है! यानी उसे मंजूर है न यह सब ! धार्मिक स्थानों पर यात्रा के दौरान कई घटनाएँ हो जाती हैं और लोग बुरी तरह घायल हो जाते हैं, कई मर जाते हैं। हस्पताल में उन्हें देखने जाते वो लोग, जो हमारे नामियों की ठोकर देखकर हँसते हैं कि बड़ा साहिब बंदगी करता रहता है, कहते हैं कि प्रभु ने बचा लिया । कहीं किसी बेचारे की टाँग टूटी होगी, कहीं किसी के बाजू चले

गये होंगे, कोई बेचारा अँधा हो गया होगा, कोई कॉमा में चला गया होगा, पर वो कहता है कि प्रभु ने बचा लिया। कई मरे भी होंगे, उनकी ख़बर तो उसे होगी ही नहीं । यदि पूछ लिया जाए तो कहेगा कि प्रभु ने मुक्ति दे दी। वाह! मुक्ति दे दी। यह है दुनिया । 12 अक्तूबर 2007 को अख़बार में मैंने पढ़ा कि कुछ लोग देवतों का दर्शन करने जा रहे थे तो गाड़ी खाई में गिर गयी । उसमें 40 लोग मर गये । कुछ जख्मी हो गये; उन्हें हस्पताल ले जाया गया । अब विचार करो न ! हमारी किसी से कोई दुश्मनी थोड़ा है। हमें दुख है कि इतने लोग मर गये; पर हम तो उनसे पूछना चाहते हैं, जो हमारे नामियों को कहते हैं कि बड़ा साहिब बंदगी करते रहते हो, देखो तुम्हारा लड़का बीमार हो गया । हम तो उनसे पूछना चाहते हैं जो यह कहते हैं कि बड़ा साहिब बंदगी करते रहते हो, देखो तुम्हें चोट लग गयी न, तुम्हारा नुक़सान हो गया न । तो थोड़ा विचार तो करो न ! बद्रीनाथ की तरफ जब भी बस गिरती है तो कोई नहीं बचता है; बड़े लोग मरते हैं। कई बार ऐसे हादसे हुए हैं, कई मर गये हैं, कई घायल हुए हैं। कोई नहीं कहेगा कि वहाँ जा रहे थे, इतने बड़े तीर्थ-स्थान पर जा रहे थे, किसी ने रक्षा नहीं की । पर साहिब बंदगी वाले का एक बच्चा भी बीमार हो जाए तो कहेंगे कि देवते छोड़ दिये, इसलिए बीमार हो गया। जो इतने मर गये, उसके बारे में कुछ नहीं कहेंगे। जब कुछ कहते नहीं बनेगा तो अंत में कह देंगे कि प्रभु ने मुक्ति दे दी। अर्जुन युद्ध नहीं करना चाह रहा था, क्योंकि बंधुओं का वध करना बहुत बड़ा पाप है । पर उसे करना पड़ा युद्ध । बाद में पाण्डवों को इस पाप का प्रायश्चित करना पड़ा। पहले तो यज्ञ करना पड़ा । पर उससे भी उनका पिण्डा नहीं छूटा। फिर हिमालय में जाकर गलना पड़ा। यह थी मुक्ति ! लोग उसे मुक्ति कह रहे हैं । साहिब कह रहे हैं-

बहु गंजन जीवन कहँ दीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥

आगे कह रहे हैं—

बलि से तो छल कीन्ह बहूता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥

छल बुद्धि दीन्हे ताहिं पताला। कोई न लखै प्रपंची काला॥

लघु सरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवी लीन्ह स्वस्ति कराये ॥

स्वस्ति कराई तबै प्रगटाना । दीर्घ रूप देखि बलि भय माना ॥

तीन पग तीनौ पुर भयऊ। आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥

देहु पुराय नृप पातालहिं दीन्हा । अँधा जीव छल प्रगट न चीन्हा ॥

तब लै पीठ नपाय तेहि तीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥

यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्ति हरि हमको दीन्हा ॥

आधा पाँव राजा बलि नहीं दे पाया था । उसे पाताल में भेज दिया गया। साहिब कह रहे हैं कि यह संसार का अँधा जीव स्पष्ट देखकर भी कुछ नहीं समझ पाता है और कहता है कि हरि ने मुक्ति दी । ... तो हमारे नामियों की कसौटी ली जाती है। भाइयो, सच तो यह है कि काल-पुरुष आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यदि आपको कोई दुख मिला तो वो साहिब की ही रज़ा मानना । सच है, काल - पुरुष आपको दुखी नहीं कर सकता है। वो आपको कोई कष्ट देने में सक्षम नहीं है, क्योंकि सद्गुरु की ताक़त साथ में खड़ी है; वो बचाती चलेगी। यदि कहीं कष्ट हुआ तो कहीं आप ग़लत चले होंगे, तभी सज़ा मिली होगी। पर यह सज़ा भी ऐसी होगी कि आप सहन कर सकें। लेकिन अगर आप गुरु सीढ़ी से उतर जायेंगे, अन्य - अन्य भक्तियों में लग जायेंगे, गुरु शब्द का उल्लंघन करना शुरू कर देंगे, नियमों के ख़िलाफ़ चलने लगेंगे तो फिर काल आपको घसीटकर ले जायेगा और वो ताक़त, जो आपके साथ थी, वो भी पीछे हट जायेगी ।

गुरु सीढ़ी से उतरे, शब्द बिहूना होय।

ताको काल घसीटहि, राख सकै न कोय॥

फिर उसे कोई नहीं बचा सकता है । पर यदि आप गुरु-मार्ग पर दृढ़ रहे तो काल - पुरुष का ज़ोर आप पर नहीं चलेगा। दूसरी ओर काल-पुरुष की भक्ति करने वालों को काल जो कष्ट देता है वो असहनीय होते हैं और फिर वहाँ कोई न्याय भी नहीं होता है; बिना ग़लती के भी कष्ट मिलते हैं। क्योंकि वहाँ पर आपको पिछले जन्मों के कर्मों की सज़ा भी तो मिलनी है, जबकि सद्गुरु के यहाँ पिछले कर्म ही कट जायेंगे, फिर सज़ा कैसी ! इसलिए सद्गुरु की शरण में जो सुख है, वो कहीं नहीं है। वो काल-पुरुष तो बिना ग़लती के भी कष्ट देगा। साहिब इस पर बड़ा ही प्यारा कह रहे हैं-

निरंजन धन तुमरो दरबार, जहाँ तनिक न न्याय विचार ॥

रंगमहल में बसें मसखरे, पास तेरे सरदार ।

धूर-धूप में साधू बिराजैं, भये जो भवनिधि पार ॥

वेश्या ओढ़े खासा मलमल, गल मोतियन को हार ।

पतिव्रता को मिले न खादी, सूखा निरस अहार ॥ पाखण्डी को जग में आदर, संत को कहैं लबार ।

अज्ञानी को परम विवेकी, ज्ञानी को मूढ़ गँवार ॥

कहहिं कबीर फकीर पुकारी, उलटा सब व्यवहार।

साँच कहे जग मारन धाये, झूठन को एतबार ॥

साहिब कह रहे हैं कि हे निरंजन ! तेरे दरबार में कोई न्याय नहीं है । भवसागर पार करने वाले साधुओं को धूप में तपना पड़ता है। वेश्या तो मलमल के कपड़े पहनती है और उसके गले में मोतियों का हार पड़ा रहता है। दूसरी ओर पतिव्रता को खादी तक नसीब नहीं होती और खाना भी उसे रूखा-सूखा ही मिलता है। जो पाखण्डी साधु हैं, उनका तो तेरे दरबार में बड़ा ही आदर होता है, पर जो सच्चे संत हैं, उन्हें दुनिया झूठा कहती है । जो अज्ञानी लोग हैं, केवल किताबें पढ़कर दुनिया को बुद्ध बनाते हैं, दुनिया कहती है कि बड़े ही ज्ञानवान हैं। दूसरी ओर जो ज्ञानी लोग हैं, अपने अनुभव की बात कहते हैं, उन्हें दुनिया मूर्ख और अनपढ़ कहती है । निरंजन के इस संसार के सब काम उलटे हैं। जो सच्चे परमात्मा की बात कहने वाला है, उसे दुनिया मारने को दौड़ती है और जो झूठे परमात्मा यानी निरंजन की बात कहने वाला है, उसकी बातों पर विश्वास कर लेती है । ... तो भाइयो, आपकी कसौटी ली जायेगी, पर आप निश्चिंत रहना। आप दृढ़ रहना। आपका विरोध होगा दुनिया के लोगों में भक्ति का नूर दिखाई नहीं दे रहा है । भक्ति समाप्त हो गयी है, केवल दिखावा रह गया है । आप देखना, आदमी पाप कर्म की तरफ चल पड़ा है और अपने को भक्त भी कहला रहा है। वो कह रहा है कि

हम भक्त भी हैं। हम कह रहे हैं कि नहीं, यह भक्ति नहीं है । लोग माँस खा रहे हैं, शराब पी रहे हैं, छल-कपट आदि कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हम भक्त हैं । हम कह रहे हैं कि नहीं, कम-से-कम यह भक्ति नहीं है। ख़ामोशी से एक चीज़ और देख लेना कि आपका विरोध करने वाले लोग ठीक नहीं मिलेंगे; उनका खान-पान ठीक नहीं होगा, आचरण भी ठीक नहीं होगा । यह मेरा दावा है। वे छल-कपट भी कर रहे होंगे । लेकिन आपकी जीवन-शैली उत्तम है । आप माँस नहीं खा रहे हैं, चोरी नहीं कर रहे हैं, गंदे काम नहीं कर रहे हैं, घूस नहीं ले रहे हैं । फिर क्यों विरोध है आपका ? इस युग में आदमी दूसरे को कन्स्ट्रेटिली भटकाना चाहता है। कलयुग कैसा है, बताता हूँ । एक बीरपुर का रहने वाला आदमी था। उसने ईसाई धर्म को अपना लिया। उसके रिश्तेदारों ने नहीं छोड़ा उसे कुछ नहीं कहा उसे; गाँव वालों ने भी कोई नाराज़गी नहीं दिखाई । उसने माता-पिता, भाई-बहनों को भी ईसाई बना दिया । सब ईसाई बन गये। किसी ने एतराज़ नहीं किया। रिश्तेदारों ने उसके यहाँ आना- जाना नहीं छोड़ा। वो चर्च में आता-जाता था, माँस भी खाता था । कुछ हमारे नामी उसके संपर्क में आए तो बात हुई । वो सत्संग सुनने आया। वो प्रभावित हुआ; उसने नाम ले लिया। अब वो वापिस हिंदू धर्म में आ गया; माँस खाना, शराब पीना भी छोड़ दिया, गंदे काम भी छोड़ दिये । अब क्या हुआ कि रिश्तेदारों ने उसके यहाँ आना-जाना छोड़ दिया, गाँव वाले भी उससे नाराज़ हो गये । आप मानेंगे, सबने उसे छोड़ दिया । आप गौर करें। जब ईसाई बना तो गाँव वाले भी नाराज़ नहीं हुए, उसकी निंदा नहीं की, पर साहिब बंदगी में आया तो उसकी निंदा होने लगी । क्यों हुई निंदा? क्या गाँव के लोगों ने नहीं देखा कि अब यह माँस नहीं खा रहा है, चोरी नहीं कर रहा है, गंदे काम नहीं कर रहा है, झूठ नहीं बोल रहा है, अच्छा हो गया है। देखा, सबने देखा । पर फिर भी क्यों हुए नाराज़ ? यह तो बड़ी उलटी बात लग रही है । भाई, ईसाई बन गया तो कोई नाराज़ नहीं हुआ । वो तो गाय का माँस भी खा लेते हैं। पर जब साहिब बंदगी में आया तो नाराज़ हुए। ऐसा क्यों हुआ ? कोई बुरा पंथ तो है नहीं। दो बेहतरीन चीजें बोल रहे - सत्य और अहिंसा । फिर बुरे कहाँ से हैं ! तो अब निंदा होने लगी। यह बड़े

जुल्म की बात थी । उसने ग़लत रास्ता पकड़ा था क्या ! बात यह थी कि पाखण्डी, शास्त्री आदि ने महसूस किया कि यह साहिब बंदगी से जुड़ गया है और बाकी को भी वहाँ ले जायेगा, हमारे काम में रुकावट पड़ेगी, इसलिए उसका बहिष्कार किया था । आपका विरोध होना ही है, क्योंकि लोग चाहते हैं कि आप सही राह पर न आएँ। एक चीज़ दावे से बताता हूँ कि मुझसे नाम लेने के बाद आदमी की आर्थिक दशा भी सुधर जाती है। ग़रीबी के सारे कारण माँस, शराब आदि छुड़ा दी। अब लोगों से हड्डी चबाना छूट नहीं रहा है । आपको अब यह सब अच्छा नहीं लग रहा है । इसलिए रिश्तेदार छूट गये हैं । आप अब ऐसे लोगों के घर नहीं जाना चाहेंगे जो माँस खाते हैं। वो कहते हैं कि हमने आपको छोड़ दिया। पर उन्होंने क्या छोड़ना था, आपने ही उन्हें छोड़ दिया है। इसलिए परेशान होकर विरोध कर रहे हैं । आप देखें, शराब की 100-200 की बोतल के लिए दुकान में लाइन लगी हुई है, जबकि सेहतमंद दूध गली-गली गुज्जर दे रहा है, पर उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है । तो हमारी निंदा शराबी - कबाबी ही कर रहे हैं । किसी भी शराबी से यह उम्मीद नहीं करना कि वो ठीक काम करेगा । आप परिश्रमी बन गये; आपने गंदे काम छोड़ दिये। वो चाहते हैं कि आप भी गंदे बनें। जब तक दुनिया में गंदे लोग रहेंगे, आपका विरोध होगा, इसलिए आपका विरोध कभी ख़त्म नहीं होने वाला है, क्योंकि दुनिया से बुरे लोग कभी ख़त्म नहीं होंगे। जब तक यह दुनिया रहेगी, आपकी तरह अच्छे लोग भी रहेंगे और आपकी निंदा का बीड़ा उठाने के लिए बुरे लोग भी रहेंगे। रामगढ़ में छोटा आश्रम है । वहाँ संगत बहुत आती है । वहाँ गाड़ी खड़ी करने की जगह भी नहीं मिलती है । एक ने कहा कि रोड़ पर खड़ी करें तो लोग गाली देते हैं। उसने कहा कि आपने सबको अमीर बना दिया है; सबके पास गाड़ी हो गयी है। मैं कहना चाहता हूँ कि नाम पाने के बाद ग़रीबी कम हो जाती है। सबसे बड़ी बात है कि आप संतुष्ट हैं । मैं सभी आश्रमों में जाता हूँ। सबमें पूरा-पूरा इंतजाम किया है। कुछ

ऐसी ऐसी जगहों पर हैं कि वहाँ की पब्लिक यदि चाहे भी तो 100 साल में भी इतना पैसा नहीं दे पायेगी, जितना वहाँ लगाया है । क्योंकि ग़रीब पब्लिक है। ... तो एक बात के लिए दुनिया हैरान है कि साहिब बंदगी में ग़रीब, बीमार ज्यादा हैं, फिर इन्होंने इतने कम समय में 132 आश्रम कैसे बना दिये ! इतनी बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें हैं, पैसा कहाँ से आया, यह सोचकर वो परेशान हो जाते हैं । बस, जो परेशान हैं, वही तो विरोध कर रहे हैं । तो मेरे विचार से आपकी फ़िजूल खर्ची कम हो गयी, बीमारियाँ कम हो गयीं। हमने आपके सेहतमंद रहने के फार्मूले बताये, जिससे आपकी बीमारियाँ कम हुईं। आप फालतू घूमते-फिरते भी नहीं । आपकी आर्थिक दशा ठीक हुई। फिर आपका विरोध क्यों ? आप किसी को परेशान भी नहीं कर रहे, किसी के साथ मारपीट भी नहीं कर रहे । हर नामी महात्मा वाला जीवन जी रहा है। आप किसी से छल-कपट नहीं कर रहे। फिर क्या बात है ? मैंने एक उदाहरण दिया। लोग चाहते हैं कि आप सच पर न चलें, आप अच्छे काम न करें । फिर कैसे लोग हैं ये ! आज ईर्ष्या का युग है। किसी को इस बात से परेशानी नहीं है कि उसके पास यह चीज़ क्यों नहीं है; उसे परेशानी है तो इस बात की कि दूसरे के पास यह क्यों है । वो दूसरों के सुख से दुखी है | आप संतुष्ट हैं। इसलिए आपको लोग असंतुष्ट करने की कोशिश करना चाहेंगे। मैं कमलसिंह का उदाहरण देता हूँ। पहले वो बड़ा ही ख़तरनाक था; शिकारी टाइप था। मारकाट करना, कुछ भी खा जाना। बड़ा खूँखार था। सभी बुराइयाँ थी उसमें । उसने जमीनें ख़रीदीं, मकान बनाए, 3 दुकानें बना लीं, अच्छा बन गया। जो उसने होटल बनाई, उसमें पत्नी खाना बनाती है और खुद वो परोसता है, कहता है कि हलवाई नहीं रखना चाहता हूँ, क्योंकि खाते-पीते हैं, गंदे होते हैं। ऐसे राक्षस को अच्छा बनाया तो नमस्कार करना चाहिए, धन्यवाद देना चाहिए या निंदा करनी चाहिए ! यानी बुरे लोगों का समूह चाहता है कि आप भी बुराई से न निकलें। आप तो अब चाहकर भी पाप नहीं कर पा रहे हैं । आप नेक इंसान बन गये हैं। यदि आप अपने पूर्व जीवन की तरफ देखें तो पायेंगे कि आपकी