भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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जहाँ जाके बार बार भृंग करता है फेरा ॥

वही कीट जेहल अपने से गुरुबात न माने ।

तब जाके पास उसके भृंग करता है डेरा ॥

कहता है कीट तुमको लगी आन खराबी ।

नहीं अक्ल ठिकाने रही नहीं इल्म है तेरा ॥

तू बात मेरी मान अबकी बार कान धर।

हो मेरी तू दमशक्ल तेरा होवे निबटेरा ॥

दिल उसको देना चाहिए दिलदार कोई हो ।

हिंदू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

लाखों में कोई कीट ही होता है, जिसे भृंग बनाने के लिए कीट बार- बार फेरा लगाता है। वो उसको अपना दिल देकर फिर अपने समान करता है । इसलिए कह रहे हैं कि दिल उसे देना चाहिए, जो दिलदार हो, जो सच्चा ख़रीदार हो। इस तरह समर्पण चाहिए। मन में विचार आ सकता है कि क्यों चाह रहा है, क्या ज़रूरत है । यथार्थ में तीनों बंधनकारक हैं। आत्मा मानती है कि धन आवश्यक है तो उसके लिए कई तरह की क्रियाएँ करती है । आख़िर तन, मन, धन की ज़रूरत क्या पड़ी? क्यों लिया जा रहा है हमसे ? आत्मा ने माना कि तन मेरा है। जैसे माना, एक त्रुटि आ गयी । आत्मा देहाभास में आ गयी तो काम करने लगी।

जबते जीव भयो संसारी । छूटे न ग्रंथी न होय सुखारी ॥

फिर धन को अपना मान लिया, उसके लिए बड़े प्रयास कर रही है। चाहे उचित हो, चाहे अनुचित हो, पर काम कर रही है। इस तरह मन से पूरा ब्रह्माण्ड है । यही बंधनकारक है । ये तीनों लिये। क्या मतलब है ? तन दिया, एक भ्रम समाप्त हुआ कि शरीर हूँ। धन लिया तो लोभ समाप्त हुआ । मन क्या है ? यानी बुद्धि, अहंकार आदि का इस्तेमाल नहीं करना । ऐसा क्यों ? जो भी इस मन से करोगे, धोखा होगा। जो भी बुद्धि से काम कर रहे हैं, जो भी चित्त से काम कर रहे हैं, जो भी अहंकार से कर रहे हैं, विनाशकारी हैं। ये चारों बहुत भ्रमित करते हैं।

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