करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसलिए कहा कि समर्पित हो जाओ। तब आप गुरुजी की बात को स्वीकार करेंगे। जो भी कहें, स्वीकार करना है । ....तो ये छ: गुण जिसमें आ गये, वो पल में पार हो जायेगा। उसे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है । जैसे बच्चा जब तक छोटा होता है, जब तक माँ की शरण मे रहता है, तब तक माँ उसका कितना ख़्याल रखती है ! हाथों से खाना खिलाती है, पानी पिलाती है, सुलाती है, सब काम करती है। लेकिन जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो फिर थोड़े इतना ख़्याल रखती है । खाना बनाकर आगे ज़रूर रख देती है, पर अपने हाथों से खिलाती थोड़े है। ऐसे ही जब तक जीव सद्गुरु की शरण में रहता है, तब तक सद्गुरु को उसका बड़ा ध्यान रहता है। ज्ञानी शिष्य की चिंता गुरु को ज़्यादा नहीं है । इसलिए हमें हमेशा गुरुजनों के सामने छोटे बनकर रहना है, शरणागति में रहना है ताकि सद्गुरु को बराबर हमारा ध्यान रहे और हम सहजता से अपने लक्ष्य को पा लें।
बलिहारी गुरु आपने, घड़ी-घड़ी सौ-सौ बार ।
मनुष्य से देवता किया, करत न लागी बार ॥
चाह मिटी चिन्ता, मिटी मनुआ बेपरवाह ।
वोही शहनशाह है, जिसको नाहीं चाह ॥