भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

इसलिए कहा कि समर्पित हो जाओ। तब आप गुरुजी की बात को स्वीकार करेंगे। जो भी कहें, स्वीकार करना है । ....तो ये छ: गुण जिसमें आ गये, वो पल में पार हो जायेगा। उसे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है । जैसे बच्चा जब तक छोटा होता है, जब तक माँ की शरण मे रहता है, तब तक माँ उसका कितना ख़्याल रखती है ! हाथों से खाना खिलाती है, पानी पिलाती है, सुलाती है, सब काम करती है। लेकिन जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो फिर थोड़े इतना ख़्याल रखती है । खाना बनाकर आगे ज़रूर रख देती है, पर अपने हाथों से खिलाती थोड़े है। ऐसे ही जब तक जीव सद्गुरु की शरण में रहता है, तब तक सद्गुरु को उसका बड़ा ध्यान रहता है। ज्ञानी शिष्य की चिंता गुरु को ज़्यादा नहीं है । इसलिए हमें हमेशा गुरुजनों के सामने छोटे बनकर रहना है, शरणागति में रहना है ताकि सद्गुरु को बराबर हमारा ध्यान रहे और हम सहजता से अपने लक्ष्य को पा लें।

बलिहारी गुरु आपने, घड़ी-घड़ी सौ-सौ बार ।

मनुष्य से देवता किया, करत न लागी बार ॥

चाह मिटी चिन्ता, मिटी मनुआ बेपरवाह ।

वोही शहनशाह है, जिसको नाहीं चाह ॥

12. पाखण्डियों से बचना

पाखण्डियों से बचना

इस तीन लोक में सभी काल - पुरुष की भक्ति कर रहे हैं।

गण गन्धर्व ऋषि मुनि अरु देवा, सब मिल लाग निरंजन सेवा ।।

आख़िर दुनिया के लोग ग़लत भक्ति में क्यों लगे हैं? कुछ कारण तो होगा!

अगर हम अपने आस-पास देखें तो एक बात ज़ाहिर होती है कि सभी ग़लत भक्तियों में लगे हैं । कोई पेड़ों की, कोई नदियों की, कोई पत्थरों की भक्ति कर रहा है। आख़िर इंसान ने ग़लत तरह की भक्तियाँ क्यों कीं ? इसमें आदमी का दोष नहीं है। आदमी को ग़लत भक्ति में लगाया गया। कुछ लोगों ने अपने हितों के लिए ऐसा किया। यदि कोई किसी पहाड़ पर कोई मूर्ति गाड़कर कह देता है कि फलाने पहाड़ पर त्रेता युग की मूर्ति निकल आयी है तो पूरी दुनिया वहाँ जुट जाती है। वो कहते हैं कि यहाँ माथा टेको तो सब कार्य पूरे हो जायेंगे। ऐसे ही लोग किसी की समाधि बनाकर कहते हैं कि फलाने का स्थान है। पास में कोई छपड़ी बना देते हैं। नाटक है कि जो यहाँ नहायेगा, उसकी खुजली ख़त्म हो जायेगी, रोग ख़त्म हो जायेंगे । आदमी को वैसे भी बीमारियाँ ज़्यादा लगी हुई हैं, इसलिए कई पहुँच जाते हैं । फिर पानी तो इतना गन्दा होता है कि यदि कोई अच्छा भला भी हो, वो भी बीमार हो सकता है । पर दुनिया कहाँ मानती है ! दो डुबकियाँ लगाती है, पैसा चढ़ाती है समाधि पर और घर आ जाती है | विचार तो कोई करता ही नहीं । कोई यह नाटक समझने का प्रयास नहीं करता। यही है अपने स्वार्थ में, ग़लत भक्ति में लगाना । इसी बहाने पाखण्डी लोग धन इकट्ठा करते हैं। पूरे समाज को स्वार्थियों ने भटका दिया है, इन्हीं चीज़ों में । 'खरे सयाने सबही भटके, तीन लोक में सबही अटके।' इन चीज़ों का प्रचार भी ज़ोरदार है । लोग भोले भाले हैं; उन्हें भ्रमित किया जाता है।

फिर गाँव के कुछ बदमाश लोग त्यौहारों के उपलक्ष्य में घर-घर से चन्दा इकट्ठा करते हैं। सबसे जबरन चंदा लिया जाता है । एक सदस्य के 50-100 रुपये तय होते हैं । कुछ ग़रीबों को तो उधार लेकर देना पड़ता है चंदा । कारण बड़ा ही प्यारा होता है - देवताओं की पूजा और भण्डारा । वाह ! क्या भक्ति है! फिर नारे क्या होते हैं ! यहाँ आकर बकरा चढ़ाओ, पैसे चढ़ाओ, खुश करो देवतों को ...... मनोकामना पूर्ण होगी। साहिब बार-बार समझा रहे हैं—'ये केवल भ्रम के उत्पाती' । इनका लक्ष्य है कि आदमी भटकता रहे। मैं जितना पाखण्ड का विरोध डंके की चोट पर कर रहा हूँ, उतना कोई नहीं। आए दिन छल-कपट बढ़ता जा रहा है। कोई तांत्रिक बनकर, कोई ज्योतिषि बनकर, कोई सयाना बनकर, तो कोई पुजारी बनकर दुनिया को लूट रहा है । मेरी लड़ाई किसी देवी-देवता से नहीं है, किसी जाति विरादरी से नहीं है । मेरा लक्ष्य पाखण्डियों से सावधान करके यह बताना है कि ईश्वर आपमें है ...... कहीं बाहर नहीं। अच्छे पढ़े-लिखे लोगों को भी भ्रम में डाल दिया गया है। घर में सिनक निकल आए तो सयाना आकर कहता है कि फलाने बाबा जी निकल आए हैं। फिर कहता है कि मेरे पास आओ, मैं सब ठीक कर दूँगा । फिर पूरे परिवार वालों को ढोल बजा-बजाकर नचाता है । कुछ समय पहले राँजड़ी में ढोल बज रहा था । एक माई उठकर नाचने लगी। मैंने देखा; समझ गया कि इसे सयाने ने खूब नचाया है। ढोलक पर नाचते-नाचते उसे आदत हो गयी थी । एक लड़के को चौकी आती थी । जब उसे नाम दिया तो चौकी आना बंद हो गयी। एक दिन वो कहने लगा कि दिल करता है कि सिर घुमाऊँ। मैंने कहा- नहीं ! अब यह काम नहीं करना । व्यायाम कर और इस बीमारी से छूट। सयानों के इस भ्रम में केवल अनपढ़ लोग ही नहीं फँसे हैं। एक इंजीनियर के घर में सिनक निकल आई। अब वो एक दिन अपने घर ले आया। सारा घर दिखाया। फिर उस कमरे में ले गया, जहाँ सिनक निकली हुई थी।

कहा-इधर भी नज़र डालो । वहाँ मखमल का कपड़ा डाला था। मैंने सोचा कि कीमती सामान होगा; कहा-उठा कपड़ा । जैसे ही उसने कपड़ा उठाया, मुझे फौज की याद आ गयी । फौज में जहाँ लड़ने जाना हो, उसके लिए छोटी- छोटी पहाड़ियाँ बना लेते हैं। वहाँ भी ऐसी ही पहाड़ियाँ बनी थीं। मैंने पूछा- क्या है? कहा-मेरे दादे की हत्या है। मैंने कहा- यह तो सिनक है। उसने कहा- नहीं ! नहीं ! हत्या है। मिटाओ तो और हो जाती है । सिनक नुक़सानकारक है । इसका घर तोड़ो तो जल्दी बना लेती है । अगली बार मजबूत बनाती है। पर सयाना तो वहाँ आकर ढोल बजाता था, बुद्धू बनाकर पैसे लूटता था । मैंने सोचा, यदि इसे कहूँगा कि हटा तो यह नहीं समझेगा, क्योंकि सयाने ने इसे खूब वहम में डाला हुआ है। इसलिए कहा- गुरुवार के दिन 5 से 6 बजे के बीच में साहिब का नाम लेकर हटा देना । ..इसी तरह पाखण्डी तपके ने सब मत-मतान्तरों को भी ख़त्म कर दिया। अन्य पंथों के लोग सब काम कर रहे हैं, वहम में है । मुझसे भी तो पाखण्डी यही कह रहे हैं कि चंदा भी देने दो अपने लोगों को, हत्या भी मनाने दो, तब ठीक है । फिर नहीं करेंगे आपकी निन्दा | पाखंडी बड़े दाँव लगायेंगे। वो आपको भक्ति से हटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनसे बचना। पाखंडी आपको कसौटी पर खड़ा करेंगे। वो आपका विरोध भी जमकर करेंगे। पर आप दृढ़ रहना । | आपको कसौटी पर खड़ा किया जायेगा यह दुनिया बड़ी ही ज़ालिम है । परम - पुरुष की सत्य-भक्ति में को लाने के लिए मुझे बड़ा ही संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि काल - पुरुष का संसार है, जीव आसानी से आता नहीं है । फिर जो भूले-भटके इस भक्ति में पहुँचते हैं, दुनिया उन्हें भी इस भक्ति से हटाने में लगी रहती है । हमारे नामी को कहीं ठोकर भी लग जाए तो कहते हैं कि बड़े साहिब बंदगी, साहिब बंदगी करते रहते हो; देखा न, लगी न ठोकर । लो, कर लो अब बात! सुख-दुख से भरी इस दुनिया में कसौटी

तो देखो न, कैसी ली जा रही है ! आत्मज्ञान को नहीं देखा जा रहा है, भक्ति के गुणों को नहीं देखा जा रहा है, अंदर की शांति को नहीं देखा जा रहा है। यदि देखा जा रहा है तो नश्वर संसार में मिलने वाले दुखों को। यदि यह कसौटी है तो फिर महापुरुषों को तो दुख ही सहने पड़े हैं। कबीर साहिब को 52 कसनी सहनी पड़ी, गुरु नानक देव जी को जेल में जाना पड़ा, अर्जुन देव जी को तत्ते तवे पर बैठना पड़ा, पलटू साहिब को जिंदा जलाया गया । कितना कष्ट मिला ! मीराबाई को कितने कष्ट दिये गये! काल - पुरुष के इस संसार में सत्य - भक्ति का संदेश देने वाले महापुरुषों पर यदि ज़ुल्म होते आए हैं तो सत्य - भक्ति करने वालों को तो दुख मिलने ही हैं। काल - पुरुष के इस संसार से निकलकर आप अपने देश जाना चाहते हैं तो काल - पुरुष रोकने का प्रयास तो करेगा ही । यह तो एक पहलू बताया। अब दूसरा पहलू बताता हूँ । जितनी रक्षा जीव को सत्य-भक्ति में मिलती है, उसकी कल्पना भी काल-पुरुष की भक्ति करने वाला नहीं कर सकता है । जितना संरक्षण सच्चा नाम जीव को देता है, उसका लेश मात्र भी काल - पुरुष का नाम नहीं देता है । काल - पुरुष की भक्ति करने वाले जीव को आगे तो दुख भोगने ही हैं, भवसागर में फिर-फिर आना ही है, पर इस संसार में भी वो दुखी है। पहले तो उसमें अंदर की शांति नहीं होगी; फिर कोई मुसीबत आए तो सुरक्षा भी नहीं मिलेगी। क्योंकि यह काम केवल सद्गुरु करता है जबकि काल - पुरुष की भक्ति में सद्गुरु नहीं है, मात्र एक गाइड है, जो पोथियाँ पढ़कर जीवों को ईश्वर-प्राप्ति का केवल मार्ग बता रहा है। तो दूसरे पहलू में आप देखना, दुनिया में बड़ी-बड़ी घटनाएँ हो रही हैं, कई लोग मर रहे हैं, पर उनके लिए कोई कुछ नहीं कह रहा है। मैं पूछना चाहता हूँ कि यदि परमात्मा का संसार है तो वो परमात्मा रक्षा क्यों नहीं करता है! यानी उसे मंजूर है न यह सब ! धार्मिक स्थानों पर यात्रा के दौरान कई घटनाएँ हो जाती हैं और लोग बुरी तरह घायल हो जाते हैं, कई मर जाते हैं। हस्पताल में उन्हें देखने जाते वो लोग, जो हमारे नामियों की ठोकर देखकर हँसते हैं कि बड़ा साहिब बंदगी करता रहता है, कहते हैं कि प्रभु ने बचा लिया । कहीं किसी बेचारे की टाँग टूटी होगी, कहीं किसी के बाजू चले

गये होंगे, कोई बेचारा अँधा हो गया होगा, कोई कॉमा में चला गया होगा, पर वो कहता है कि प्रभु ने बचा लिया। कई मरे भी होंगे, उनकी ख़बर तो उसे होगी ही नहीं । यदि पूछ लिया जाए तो कहेगा कि प्रभु ने मुक्ति दे दी। वाह! मुक्ति दे दी। यह है दुनिया । 12 अक्तूबर 2007 को अख़बार में मैंने पढ़ा कि कुछ लोग देवतों का दर्शन करने जा रहे थे तो गाड़ी खाई में गिर गयी । उसमें 40 लोग मर गये । कुछ जख्मी हो गये; उन्हें हस्पताल ले जाया गया । अब विचार करो न ! हमारी किसी से कोई दुश्मनी थोड़ा है। हमें दुख है कि इतने लोग मर गये; पर हम तो उनसे पूछना चाहते हैं, जो हमारे नामियों को कहते हैं कि बड़ा साहिब बंदगी करते रहते हो, देखो तुम्हारा लड़का बीमार हो गया । हम तो उनसे पूछना चाहते हैं जो यह कहते हैं कि बड़ा साहिब बंदगी करते रहते हो, देखो तुम्हें चोट लग गयी न, तुम्हारा नुक़सान हो गया न । तो थोड़ा विचार तो करो न ! बद्रीनाथ की तरफ जब भी बस गिरती है तो कोई नहीं बचता है; बड़े लोग मरते हैं। कई बार ऐसे हादसे हुए हैं, कई मर गये हैं, कई घायल हुए हैं। कोई नहीं कहेगा कि वहाँ जा रहे थे, इतने बड़े तीर्थ-स्थान पर जा रहे थे, किसी ने रक्षा नहीं की । पर साहिब बंदगी वाले का एक बच्चा भी बीमार हो जाए तो कहेंगे कि देवते छोड़ दिये, इसलिए बीमार हो गया। जो इतने मर गये, उसके बारे में कुछ नहीं कहेंगे। जब कुछ कहते नहीं बनेगा तो अंत में कह देंगे कि प्रभु ने मुक्ति दे दी। अर्जुन युद्ध नहीं करना चाह रहा था, क्योंकि बंधुओं का वध करना बहुत बड़ा पाप है । पर उसे करना पड़ा युद्ध । बाद में पाण्डवों को इस पाप का प्रायश्चित करना पड़ा। पहले तो यज्ञ करना पड़ा । पर उससे भी उनका पिण्डा नहीं छूटा। फिर हिमालय में जाकर गलना पड़ा। यह थी मुक्ति ! लोग उसे मुक्ति कह रहे हैं । साहिब कह रहे हैं-

बहु गंजन जीवन कहँ दीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥

आगे कह रहे हैं—

बलि से तो छल कीन्ह बहूता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥

छल बुद्धि दीन्हे ताहिं पताला। कोई न लखै प्रपंची काला॥

लघु सरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवी लीन्ह स्वस्ति कराये ॥

स्वस्ति कराई तबै प्रगटाना । दीर्घ रूप देखि बलि भय माना ॥

तीन पग तीनौ पुर भयऊ। आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥

देहु पुराय नृप पातालहिं दीन्हा । अँधा जीव छल प्रगट न चीन्हा ॥

तब लै पीठ नपाय तेहि तीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥

यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्ति हरि हमको दीन्हा ॥

आधा पाँव राजा बलि नहीं दे पाया था । उसे पाताल में भेज दिया गया। साहिब कह रहे हैं कि यह संसार का अँधा जीव स्पष्ट देखकर भी कुछ नहीं समझ पाता है और कहता है कि हरि ने मुक्ति दी । ... तो हमारे नामियों की कसौटी ली जाती है। भाइयो, सच तो यह है कि काल-पुरुष आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यदि आपको कोई दुख मिला तो वो साहिब की ही रज़ा मानना । सच है, काल - पुरुष आपको दुखी नहीं कर सकता है। वो आपको कोई कष्ट देने में सक्षम नहीं है, क्योंकि सद्गुरु की ताक़त साथ में खड़ी है; वो बचाती चलेगी। यदि कहीं कष्ट हुआ तो कहीं आप ग़लत चले होंगे, तभी सज़ा मिली होगी। पर यह सज़ा भी ऐसी होगी कि आप सहन कर सकें। लेकिन अगर आप गुरु सीढ़ी से उतर जायेंगे, अन्य - अन्य भक्तियों में लग जायेंगे, गुरु शब्द का उल्लंघन करना शुरू कर देंगे, नियमों के ख़िलाफ़ चलने लगेंगे तो फिर काल आपको घसीटकर ले जायेगा और वो ताक़त, जो आपके साथ थी, वो भी पीछे हट जायेगी ।

गुरु सीढ़ी से उतरे, शब्द बिहूना होय।

ताको काल घसीटहि, राख सकै न कोय॥

फिर उसे कोई नहीं बचा सकता है । पर यदि आप गुरु-मार्ग पर दृढ़ रहे तो काल - पुरुष का ज़ोर आप पर नहीं चलेगा। दूसरी ओर काल-पुरुष की भक्ति करने वालों को काल जो कष्ट देता है वो असहनीय होते हैं और फिर वहाँ कोई न्याय भी नहीं होता है; बिना ग़लती के भी कष्ट मिलते हैं। क्योंकि वहाँ पर आपको पिछले जन्मों के कर्मों की सज़ा भी तो मिलनी है, जबकि सद्गुरु के यहाँ पिछले कर्म ही कट जायेंगे, फिर सज़ा कैसी ! इसलिए सद्गुरु की शरण में जो सुख है, वो कहीं नहीं है। वो काल-पुरुष तो बिना ग़लती के भी कष्ट देगा। साहिब इस पर बड़ा ही प्यारा कह रहे हैं-

निरंजन धन तुमरो दरबार, जहाँ तनिक न न्याय विचार ॥

रंगमहल में बसें मसखरे, पास तेरे सरदार ।

धूर-धूप में साधू बिराजैं, भये जो भवनिधि पार ॥

वेश्या ओढ़े खासा मलमल, गल मोतियन को हार ।

पतिव्रता को मिले न खादी, सूखा निरस अहार ॥ पाखण्डी को जग में आदर, संत को कहैं लबार ।

अज्ञानी को परम विवेकी, ज्ञानी को मूढ़ गँवार ॥

कहहिं कबीर फकीर पुकारी, उलटा सब व्यवहार।

साँच कहे जग मारन धाये, झूठन को एतबार ॥

साहिब कह रहे हैं कि हे निरंजन ! तेरे दरबार में कोई न्याय नहीं है । भवसागर पार करने वाले साधुओं को धूप में तपना पड़ता है। वेश्या तो मलमल के कपड़े पहनती है और उसके गले में मोतियों का हार पड़ा रहता है। दूसरी ओर पतिव्रता को खादी तक नसीब नहीं होती और खाना भी उसे रूखा-सूखा ही मिलता है। जो पाखण्डी साधु हैं, उनका तो तेरे दरबार में बड़ा ही आदर होता है, पर जो सच्चे संत हैं, उन्हें दुनिया झूठा कहती है । जो अज्ञानी लोग हैं, केवल किताबें पढ़कर दुनिया को बुद्ध बनाते हैं, दुनिया कहती है कि बड़े ही ज्ञानवान हैं। दूसरी ओर जो ज्ञानी लोग हैं, अपने अनुभव की बात कहते हैं, उन्हें दुनिया मूर्ख और अनपढ़ कहती है । निरंजन के इस संसार के सब काम उलटे हैं। जो सच्चे परमात्मा की बात कहने वाला है, उसे दुनिया मारने को दौड़ती है और जो झूठे परमात्मा यानी निरंजन की बात कहने वाला है, उसकी बातों पर विश्वास कर लेती है । ... तो भाइयो, आपकी कसौटी ली जायेगी, पर आप निश्चिंत रहना। आप दृढ़ रहना। आपका विरोध होगा दुनिया के लोगों में भक्ति का नूर दिखाई नहीं दे रहा है । भक्ति समाप्त हो गयी है, केवल दिखावा रह गया है । आप देखना, आदमी पाप कर्म की तरफ चल पड़ा है और अपने को भक्त भी कहला रहा है। वो कह रहा है कि

हम भक्त भी हैं। हम कह रहे हैं कि नहीं, यह भक्ति नहीं है । लोग माँस खा रहे हैं, शराब पी रहे हैं, छल-कपट आदि कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हम भक्त हैं । हम कह रहे हैं कि नहीं, कम-से-कम यह भक्ति नहीं है। ख़ामोशी से एक चीज़ और देख लेना कि आपका विरोध करने वाले लोग ठीक नहीं मिलेंगे; उनका खान-पान ठीक नहीं होगा, आचरण भी ठीक नहीं होगा । यह मेरा दावा है। वे छल-कपट भी कर रहे होंगे । लेकिन आपकी जीवन-शैली उत्तम है । आप माँस नहीं खा रहे हैं, चोरी नहीं कर रहे हैं, गंदे काम नहीं कर रहे हैं, घूस नहीं ले रहे हैं । फिर क्यों विरोध है आपका ? इस युग में आदमी दूसरे को कन्स्ट्रेटिली भटकाना चाहता है। कलयुग कैसा है, बताता हूँ । एक बीरपुर का रहने वाला आदमी था। उसने ईसाई धर्म को अपना लिया। उसके रिश्तेदारों ने नहीं छोड़ा उसे कुछ नहीं कहा उसे; गाँव वालों ने भी कोई नाराज़गी नहीं दिखाई । उसने माता-पिता, भाई-बहनों को भी ईसाई बना दिया । सब ईसाई बन गये। किसी ने एतराज़ नहीं किया। रिश्तेदारों ने उसके यहाँ आना- जाना नहीं छोड़ा। वो चर्च में आता-जाता था, माँस भी खाता था । कुछ हमारे नामी उसके संपर्क में आए तो बात हुई । वो सत्संग सुनने आया। वो प्रभावित हुआ; उसने नाम ले लिया। अब वो वापिस हिंदू धर्म में आ गया; माँस खाना, शराब पीना भी छोड़ दिया, गंदे काम भी छोड़ दिये । अब क्या हुआ कि रिश्तेदारों ने उसके यहाँ आना-जाना छोड़ दिया, गाँव वाले भी उससे नाराज़ हो गये । आप मानेंगे, सबने उसे छोड़ दिया । आप गौर करें। जब ईसाई बना तो गाँव वाले भी नाराज़ नहीं हुए, उसकी निंदा नहीं की, पर साहिब बंदगी में आया तो उसकी निंदा होने लगी । क्यों हुई निंदा? क्या गाँव के लोगों ने नहीं देखा कि अब यह माँस नहीं खा रहा है, चोरी नहीं कर रहा है, गंदे काम नहीं कर रहा है, झूठ नहीं बोल रहा है, अच्छा हो गया है। देखा, सबने देखा । पर फिर भी क्यों हुए नाराज़ ? यह तो बड़ी उलटी बात लग रही है । भाई, ईसाई बन गया तो कोई नाराज़ नहीं हुआ । वो तो गाय का माँस भी खा लेते हैं। पर जब साहिब बंदगी में आया तो नाराज़ हुए। ऐसा क्यों हुआ ? कोई बुरा पंथ तो है नहीं। दो बेहतरीन चीजें बोल रहे - सत्य और अहिंसा । फिर बुरे कहाँ से हैं ! तो अब निंदा होने लगी। यह बड़े

जुल्म की बात थी । उसने ग़लत रास्ता पकड़ा था क्या ! बात यह थी कि पाखण्डी, शास्त्री आदि ने महसूस किया कि यह साहिब बंदगी से जुड़ गया है और बाकी को भी वहाँ ले जायेगा, हमारे काम में रुकावट पड़ेगी, इसलिए उसका बहिष्कार किया था । आपका विरोध होना ही है, क्योंकि लोग चाहते हैं कि आप सही राह पर न आएँ। एक चीज़ दावे से बताता हूँ कि मुझसे नाम लेने के बाद आदमी की आर्थिक दशा भी सुधर जाती है। ग़रीबी के सारे कारण माँस, शराब आदि छुड़ा दी। अब लोगों से हड्डी चबाना छूट नहीं रहा है । आपको अब यह सब अच्छा नहीं लग रहा है । इसलिए रिश्तेदार छूट गये हैं । आप अब ऐसे लोगों के घर नहीं जाना चाहेंगे जो माँस खाते हैं। वो कहते हैं कि हमने आपको छोड़ दिया। पर उन्होंने क्या छोड़ना था, आपने ही उन्हें छोड़ दिया है। इसलिए परेशान होकर विरोध कर रहे हैं । आप देखें, शराब की 100-200 की बोतल के लिए दुकान में लाइन लगी हुई है, जबकि सेहतमंद दूध गली-गली गुज्जर दे रहा है, पर उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है । तो हमारी निंदा शराबी - कबाबी ही कर रहे हैं । किसी भी शराबी से यह उम्मीद नहीं करना कि वो ठीक काम करेगा । आप परिश्रमी बन गये; आपने गंदे काम छोड़ दिये। वो चाहते हैं कि आप भी गंदे बनें। जब तक दुनिया में गंदे लोग रहेंगे, आपका विरोध होगा, इसलिए आपका विरोध कभी ख़त्म नहीं होने वाला है, क्योंकि दुनिया से बुरे लोग कभी ख़त्म नहीं होंगे। जब तक यह दुनिया रहेगी, आपकी तरह अच्छे लोग भी रहेंगे और आपकी निंदा का बीड़ा उठाने के लिए बुरे लोग भी रहेंगे। रामगढ़ में छोटा आश्रम है । वहाँ संगत बहुत आती है । वहाँ गाड़ी खड़ी करने की जगह भी नहीं मिलती है । एक ने कहा कि रोड़ पर खड़ी करें तो लोग गाली देते हैं। उसने कहा कि आपने सबको अमीर बना दिया है; सबके पास गाड़ी हो गयी है। मैं कहना चाहता हूँ कि नाम पाने के बाद ग़रीबी कम हो जाती है। सबसे बड़ी बात है कि आप संतुष्ट हैं । मैं सभी आश्रमों में जाता हूँ। सबमें पूरा-पूरा इंतजाम किया है। कुछ

ऐसी ऐसी जगहों पर हैं कि वहाँ की पब्लिक यदि चाहे भी तो 100 साल में भी इतना पैसा नहीं दे पायेगी, जितना वहाँ लगाया है । क्योंकि ग़रीब पब्लिक है। ... तो एक बात के लिए दुनिया हैरान है कि साहिब बंदगी में ग़रीब, बीमार ज्यादा हैं, फिर इन्होंने इतने कम समय में 132 आश्रम कैसे बना दिये ! इतनी बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें हैं, पैसा कहाँ से आया, यह सोचकर वो परेशान हो जाते हैं । बस, जो परेशान हैं, वही तो विरोध कर रहे हैं । तो मेरे विचार से आपकी फ़िजूल खर्ची कम हो गयी, बीमारियाँ कम हो गयीं। हमने आपके सेहतमंद रहने के फार्मूले बताये, जिससे आपकी बीमारियाँ कम हुईं। आप फालतू घूमते-फिरते भी नहीं । आपकी आर्थिक दशा ठीक हुई। फिर आपका विरोध क्यों ? आप किसी को परेशान भी नहीं कर रहे, किसी के साथ मारपीट भी नहीं कर रहे । हर नामी महात्मा वाला जीवन जी रहा है। आप किसी से छल-कपट नहीं कर रहे। फिर क्या बात है ? मैंने एक उदाहरण दिया। लोग चाहते हैं कि आप सच पर न चलें, आप अच्छे काम न करें । फिर कैसे लोग हैं ये ! आज ईर्ष्या का युग है। किसी को इस बात से परेशानी नहीं है कि उसके पास यह चीज़ क्यों नहीं है; उसे परेशानी है तो इस बात की कि दूसरे के पास यह क्यों है । वो दूसरों के सुख से दुखी है | आप संतुष्ट हैं। इसलिए आपको लोग असंतुष्ट करने की कोशिश करना चाहेंगे। मैं कमलसिंह का उदाहरण देता हूँ। पहले वो बड़ा ही ख़तरनाक था; शिकारी टाइप था। मारकाट करना, कुछ भी खा जाना। बड़ा खूँखार था। सभी बुराइयाँ थी उसमें । उसने जमीनें ख़रीदीं, मकान बनाए, 3 दुकानें बना लीं, अच्छा बन गया। जो उसने होटल बनाई, उसमें पत्नी खाना बनाती है और खुद वो परोसता है, कहता है कि हलवाई नहीं रखना चाहता हूँ, क्योंकि खाते-पीते हैं, गंदे होते हैं। ऐसे राक्षस को अच्छा बनाया तो नमस्कार करना चाहिए, धन्यवाद देना चाहिए या निंदा करनी चाहिए ! यानी बुरे लोगों का समूह चाहता है कि आप भी बुराई से न निकलें। आप तो अब चाहकर भी पाप नहीं कर पा रहे हैं । आप नेक इंसान बन गये हैं। यदि आप अपने पूर्व जीवन की तरफ देखें तो पायेंगे कि आपकी

करनी में, आपकी रहनी में बहुत अंतर आ गया है । आप पूरे बदल चुके हैं, ज्ञानी महात्मा हो गये हैं । काशी के एक पंडित हैं। वे ब्राह्मणों को पढ़ाते हैं । काशी हिंदू धर्म की राजधानी है। वो बहुत बड़े विद्वान हैं । एक दिन मेरे पास आए। एक अनपढ़ नामी उन्हें लाया। पंडित जी ने मुझे प्रणाम किया, कहा- महाराज ! यह आपका एक शिष्य है, मैंने इसे देखा तो आपके पास आया । आपने इसे क्या बना दिया! यह तो महात्मा से भी ऊपर है। कहा कि यह झूठ नहीं बोलता है । हम तो ज्ञानी हैं, फिर भी कभी - कभी बोल देते हैं, पर यह नहीं बोलता है । इसका आचरण भी बहुत ऊँचा है। गाय-भैंस चराता है । इतना अक्लमंद है कि फालतू बात नहीं करता है । हक़ की कमाई खाता है, संतुष्ट है, शांत है। 2-3 बच्चे हैं इसके, पर संतुष्ट इतना कि परम ज्ञानी भी इतना संतुष्ट नहीं हो सकता है । हम ज्ञानी हैं, पर कई बार जीवों को मार देते हैं | यह है कि किसी भी जीव को नहीं मारता है। मैंने इसे देखा । मुझे विचार आया कि इसे किसने ऐसा बनाया ! वो इतना बड़ा ज्ञानी ऐसी बात कह रहा है । मैंने आपको पहले कहा कि कोई भी नेक इंसान हमारी निंदा नहीं कर सकता है । निहायत ही गंदे लोग ही मेरी निंदा कर रहे हैं । उनको नाम की ताक़त नज़र नहीं आ रही है । मेरे हर नामी से पूछना कि बदलाव आया कि नहीं । आपकी करनी चेंज हो गयी, हृदय प्रकाशित हो गया, किसी भी जीव को आप कष्ट नहीं दे रहे हैं। बुद्धि उत्तम हो गयी, कोई पापिष्ट कर्म नहीं कर रहे। तीसरा, आपको अच्छा सरंक्षक मिल गया है, फ़िकर नहीं है, जानते हैं कि साहिब सब करेगा, क्योंकि वो ही करता आ रहा है ।

तेरी कृपा से ही मेरा, सब काम हो रहा है ।

करते हो तुम ही साहिबा, मेरा नाम हो रहा है ॥

कई मौकों पर आपने यह चीज़ देखी है । अब आप भ्रमित नहीं हो रहे हैं। हालांकि आपको भ्रमित करने की कोशिश की जा रही है, आपको मजबूर किया जा रहा है कि आप ग्रह दशा मानें, आप भूत-प्रेत मानें, पर आप मजबूत हैं, दृढ़ हैं। कहना नहीं चाहिए, पर मुझे मुम्बई से आस्था वालों ने फोन किया, कहा कि कुछ बड़े-बड़े कथावाचक चाहते हैं कि साहिब-

बंदगी वाला प्रोग्राम न आए, क्योंकि इससे बाकी सभी के प्रवचन फीके पड़ रहे हैं, आपके प्रवचन के आगे उनका वजूद मिट रहा है। वो आनन्द जोशी साफ़-साफ़ कहा कि महात्मा कह रहे हैं कि इनका प्रोग्राम चलाओगे तो हम अपना प्रोग्राम बंद कर देंगे, क्योंकि जबसे इनका प्रोग्राम आ रहा है, हमारा प्रोग्राम फीका पड़ गया है, कोई नहीं देख रहा है। हमने तो किसी का प्रोग्राम बंद नहीं करवाया। बाकी कह रहे हैं कि इनका प्रोग्राम बंद करो। ये कैसे लोग हैं, विचार तो करो ! हमारा प्रोग्राम ही नहीं आने देना चाहते हैं। पर मैं इससे परेशान नहीं हूँ। मेरा तो पूरा प्रोग्राम लाइव चल रहा है । एक ने मुझसे कहा कि आपका लिट्रेचर पढ़ना चाहता हूँ । मैंने कहा कि तुम नहीं पढ़ पाओगे । उसने सोचा कि शायद बहुत बड़ा है; कहा—कितना है ? मैंने कहा कि मेरी संगत ही मेरा लिट्रेचर है; उन्हें पढ़ो। मेरा एक-एक नामी मेरी पुस्तक का एक-एक पन्ना है। पढ़ो मोहनलाल को कि वो पहले कैसा था और अब कैसा हो गया है; पढ़ो लहरसिंह को कि वो पहले कैसा था और अब कैसा हो गया है; पढ़ो जवान बच्चों को कि उनका चरित्र कैसा हो गया है! ....तो कइयों के व्यवसाय को मुझसे अंतर पड़ा । राँड़ी मोड़ पर पोलिट्री फार्म था। वो बड़ी निंदा करता था । मैंने अपने लोगों से कहा कि यह तो ठकुरा है, कोई सयाना भी नहीं है, फिर इसे क्या लेना है ? उन्होंने कहा कि आपने तो इसका बेड़ा ही गर्क कर दिया है । इसने दो कोठियाँ बनाईं अपने पोलिट्री फार्म से। पर अब इसका धंधा ही समाप्त हो गया है। कई शराबी- कबाबी इसके पास आते थे। शाम तक यह 2 हज़ार कमा लेता था । पर अब यह ग़रीब हो गया है। तो वो अपने अंदर की भंडास निकाल रहा था । इस तरह कुछ मुझतक नहीं पहुँच पाते हैं तो आपसे अपनी भंडास निकालते हैं, कभी कहते हैं कि यह मुसलमान है, कभी कहते हैं कि यह तो चमार है, कभी कहते हैं कि इसने तो धर्म बदल दिया । आप ध्यान देना, खामोशी से देखना तो लगेगा कि वो खुद भी निजी तौर पर अच्छा नहीं होगा । उसने मान लिया है कि ये न मुर्गी खा रहे हैं, न सूत्रे पर, न किसी तिथि -त्यौहार पर बुला रहे हैं ।

जितनी गहराई से हमारे नामियों ने हमें पकड़ा है, उतना किसी भी पंथ की संगत ने अपने गुरु को न पकड़ा होगा। आप दृढ़ रहना, विरोध की चिंता नहीं करना। यह तो होगी ही । आप नाम में लगे रहना।

तू नाम सुमर जग लड़ने दे ...॥

वो टीम तगड़ी है। उन्हें भय है; उन्हें ठीक-ठीक मालूम है । इसलिए हमारी जान के सौदागर भी बहुत हैं । पर हम डर नहीं रहे । 'जब औखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना । । ' और 'नाचन निकली तो घूँघट कैसा ! ' अगर नाचने वाला पेशा है तो घूँघट खोलकर नाचना है। साहिब की भक्ति में आए हैं तो चुपके-चुपके नहीं आना है, डंके की चोट पर आना है । सब बात साफ़-साफ़ है । तो वो हर सीमा तक जायेंगे। प्लैनिंग कैसे करते हैं ? कहीं कमलसिंह की पत्नी को सिर दर्द हो गया । पहले वो शराबी - कबाबी था; मौज-मस्ती वाला था । नाम लेकर भक्त हो गया; ढाबा खोला; खुशहाल हुआ। सयाने-चेले आए, कहा कि भूत मानो, नाचो गायो। वो दाँव बड़ा खेलते हैं। यह घर के लोग भी चला सकते हैं ।

मुझे है काम सतगुरु से, दुनिया रूठे तो रूठन दे ।।

कहा कि तेरी माँ, जो मर गयी थी, वो आ गयी है । सास- नूह की खींचाखांची है। उसी के कारण है सिर दर्द । फिर कहा कि चारों भाई बैठोगे, तभी हत्या मानेगी। उन्हें मालूम है कि कमलसिंह नहीं आयेगा । तो भाई ने कहा कि चल । कमलसिंह ने कहा कि साहिब के पास चलो। उन्होंने कहा कि वो तो मुसलमान है । कमलसिंह ने कहा कि हिंदू तो हम हैं, जो हड्डियाँ नहीं चबा रहे, शराब नहीं पी रहे, किसी को सता नहीं रहे । फिर कहा कि वो तो चमार है। मेरे गुरुदेव ने कहा था कि अपनी जाति नहीं बताना, क्योंकि सन्यासी की कोई जाति नहीं होती है । तो उसके भाई ने कहा कि तू माँ का नहीं हुआ तो किसी का नहीं हो सकता है । तू माँ की खुशी के लिए हत्या मना। बकरा चढ़ाना है, 1-1 हज़ार रूपये डालने हैं। नहीं, यह प्लैन था। देवता कोई बकरा नहीं खाता । साहिब तो कह रहे

मांसाहारी मानवा प्रत्यक्ष राक्षस जान ।

उसकी संगत न करो, होय भक्ति में हानि ।।

तो उसे बिरादरी से छेक दिया ताकि बाकी को न ला सके। मैंने कहा कि उन्होंने क्या छेकना है, हमने उन्हें पहले ही छेक रखा है। वो टीम शातिर है। मैं ठीक से जानता हूँ । आपको समस्या में डालेंगे, भक्ति से डाउन करने की कोशिश करेंगे। निरंजन का अंदर से भी हमला है और बाहर से भी । एक पंडिताइन घूमती रहती है; कहीं भी ठीक न हुई । नाम लेकर ठीक हुई तो पाखंडी कहने लगे कि यह डायन है, पेड़ के नीचे एक बच्चे का कलेजा निकालकर खा रही थी। वो आकर रोने लगी, कहने लगी कि पानी भरने जाती हूँ तो सब औरतें दूर हो जाती हैं। मैंने कहा कि फिर तो बड़ा अच्छा है, तू आराम से पानी भर लिया कर । कहने लगी कि बच्चे स्कूल जाते हैं तो कोई भी बच्चा उनके पास नहीं बैठता है । मैं परेशान हूँ और आप मौजू ले रहे हैं। मैंने कहा कि तेरे आस-पास लोग हैं, जो भूत-प्रेतों से परेशान हैं। कहा कि हैं। मैंने कहा कि चुपचाप उन्हें लाती जा । ...तो ये किसी भी हद तक जा सकते हैं। लड़का हो तो कहते हैं कि गंडमूल में हुआ है। यदि कहो कि नाम लिया है तो कहते हैं कि नाम तूने लिया है, लड़के ने नहीं; गंडमूल में तो लड़का हुआ है; ग्रह उसे लगा है। यानी वो किसी भी सीमा तक जाकर आपको घुमायेंगे । इसलिए नाम - दान के समय ये सब मना करता हूँ। ...तो दुनिया आपको हटाना चाहेगी। एक माई आई, लड़की को लाई, कहा कि इसे नुक्स हो गया है। मैंने पूछा कि नाम लिया है ? कहा—हाँ! ऐसे लोगों के लिए मेरे पास एक ही शब्द है - पाखण्डी । दरअसल उस लड़की को दौरे की बीमारी थी। यहाँ पर सयानों ने बड़ा भ्रम फैला रखा है। सिरदर्द भी हुई तो भूत आ गया है। वो इसी तरह से अपना काम चला रहे हैं । लड़की कहने लगी कि मम्मी सयाने के पास ले जाती है । सयाना मुझे मारता है । मैंने माई को कहा कि नाम-दान के समय सीधा बोला था कि यह - यह काम नहीं करना। उसने कहा कि मैं नहीं जाना चाहती थी। पड़ौसी लोग, ताये - चाचे सब इकट्ठा हुए, पूरा मौहल्ला इकट्ठा हुआ और जबरन सयाने के पास ले गये। 6 महीने चक्कर काटे । फिर बाद में मेरे पास आई है । क्या साहिब मदद करेगा ? नहीं! वजह सुनो।

नाम पीव का छाड़ि के, करे आन की आस ।

वेश्या तेरा पूतरा, क कौन को बाप ।।

पत्नी नाराज़ होकर चली जाए, ठीक है । मायके चली गयी। 1 महीना, 2 महीने, 6 महीने नहीं आए, कोई बात नहीं। पर यदि वो दूसरा ख़सम कर ले तो कैसा है! फिर तो पति छोड़ देता है, ख़बर भी नहीं लेता है। शरणागति में भी यही आता है ।

सुख में तुझे न भूलूँ, दुख में न हार मानूँ ।

ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में ।।

सुख-दुख कुछ भी हो, चिंता मत करो । एक माई चिन्नौर में 100-150 आदमी को नाम दिलाया। उसका अपना स्कूल भी है। बड़ी लग्न है कि साहिब की भक्ति में जोड़े। एक दिन परेशान होकर आई । हम परेशानी में शामिल हो जाते हैं। कहा कि स्कूल के पास पीपल का पेड़ है। किसी ने फैलाया कि वहाँ पेड़ के नीचे डायन रहती है; एक दिन किसी बच्चे का कलेजा निकालकर खा रही थी। दूसरे दिन 50 बच्चे भी नहीं आए। वजह तो साफ़ है न! बूढ़ी माइयाँ श्रद्धालु हैं; कोई कुछ भी कहे मान लेती हैं। कोई गुर्ज़ लेकर आए तो कहेंगी कि हनुमान जी आ गये हैं । क्योंकि वो सीधी हैं; स्कूल की शक्ल भी उन्होंने नहीं देखी है। तो किसी ने अपने लखां के लाल दौत्रू - पोनू को नहीं जाने दिया; कहा कि या तो मुक्ति कराओ यानी ढोल पिटवाओ सयाने से। अब उस माई के दो बेटे हैं, एक ने नाम लिया है, एक ने नहीं लिया है। वो कहने लगी कि लड़का कह रहा है कि हत्या मनानी है। मैंने कहा कि यदि हमारे बेड़े में सयाने ने ढोल पीटा तो सारा काम ख़राब हो जाएगा। क्योंकि मैंने बड़े लोगों को भक्ति में जोड़ा है। लोग कहेंगे कि यह खुद मान रही है। तो मैंने कहा कि लड़के को लाओ मेरे पास । मैंने लड़के को समझाया कि घर-घर जाकर लोगों को समझाओ। उसने कहा कि आप ठीक कह रहे हैं, पर दुनिया नहीं मानती है। तो उसने घर- घर जाकर समझाया। पर फिर भी 50-60 बच्चे कम पड़ ही गये । दुनिया कैसी है ? हमारा कोई बीमार भी पड़ जाए तो कहते हैं कि साहिब ने ठीक नहीं किया। मर जाए तो बात ही क्या करनी ! राजा दशरथ पुत्र के बनवास के शोक में इतने दुखी हुए कि रोते-रोते उनकी आँखें तक चली

गयीं। उन्हें काल से कोई नहीं बचा सका । इधर बुखार भी हो जाए तो दुनिया कहती है कि देखो-देखो, साहिब बंदगी में चला गया, इसलिए बीमार हुआ । हमने आपको एक ही बिंदू पर एकाग्र किया कि साहिब को पकड़े रहना। मुसीबतें आयेंगी; दिक्कतें आयेंगी, पर साहिब को नहीं छोड़ना, पकड़े रहना ।

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय ।

टूटे ते फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय ।।

दुनिया रूठेगी भी, पर साहिब को पकड़े रहना। खेलना हो तो खेलिये, पक्का होकर खेल ।

कच्ची सरसों पेर के, खड़ी भया न तेल ।।

एक ने कहा कि आपसे डर लगता है । आपको कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है। ऑटोमेटिक आपके मुँह से वही निकलता है। हमारे पास दूसरा कॅम्प्यूटर है भाई | हम कमाई की बात नहीं कर रहे हैं; बस, आपसे कह रहे हैं कि जो दिया, उसे संभालना। घर के, पड़ौस के लोगों से भी हमला सकता है। वो चाहते हैं कि आप फिर पुरानी लाइन पर आएँ ताकि आप नीचे आ जाएँ। वो यह नहीं कहेंगे कि तू अच्छा बन गया है। उलटा कहेंगे कि देवते छोड़ दिये । इलज़ाम बड़ा तगड़ा है। खुद खाने-पीने वाले, चोर ठग होंगे। भक्त भी नहीं होंगे वो । आज अधिकता भी शराबियों की है, इसलिए वो अच्छे को तंग करने लगते हैं । पहले किसी गाँव में एक शराबी होता था तो सब उसे बुरा-भला कहते थे। पहले एक चोर होता था तो सब गालियाँ देते थे उसे । अब चोरों ने भी अपनी तादाद बड़ा ली है । पहले कोई किसी लड़की को छेड़ता था तो सब थू-थू करते थे। अब इनकी तादाद भी ज़्यादा हो गयी है। उलटा युग आ गया, इसलिए तंग नहीं होना । चट्ठे की बात याद आ गयी। मैं रूपलाल के घर गया। वहाँ 3-4 लागों ने गाड़ी पर थूकना शुरू किया। आधा घंटा थूकते रहे, पर बाहर आने की हिम्मत न थी। एक नेक इंसान ऐसा काम कर सकता है क्या! मैंने रूपलाल से पूछा कि कौन हैं ये ? कहा कि यह सयाना है, लाखों रूपये मुझसे खाए हैं, पर ठीक न कर सका। जबसे आपके पास आया, ठीक हूँ। औरों को भी लाया हूँ ।

समझ लिया न उसका कष्ट क्या था । मैंने ही पाखंड का विरोध किया है। इसी से सयाने डर रहे हैं। साहिब नाम के आगे भूत टिक नहीं पायेंगे । चाहे चांडाल भी आ जाए, सयाने तो भीड़ इकट्ठी करते हैं, सोचते हैं कि साहिब की रौनक कम हो। हमने किसी से ठगी नहीं की, पर दुनिया बड़ी ज़ालिम है, बड़ी झूठी है, बड़ी बदतमीज है। जितनी मेरे तक आने में रुकावट है, उतनी कहीं नहीं, क्योंकि जितना मैंने पाखंडियों को निचौड़ा है, उतना कोई नहीं । आगे आगे देखना, छिपेंगे ये। अभी अधमरे हो गये हैं । आजकल तो कसमें खिला रहे हैं कि साहिब बंदगी में नहीं जाना है। अरे भाई, हमने तो आपको इंसान बनाया, जिंदगी जीना सिखाया। खैर, आप चिंता नहीं करना, साहिब की भक्ति में बड़ी ताक़त है । यह ताक़त बड़ी निराली है, इसलिए दिल में यही भाव रखना-

मुझे है काम सतगुरु से, दुनिया रूठे तो रूठन दे ।।

मन तू हंसन हो साहिब के भटकत काहे फिरै ।

सतगुरु छोड़ और को धयावै, कारज इक न सरै ॥

साधुन सेवा कर मन मेरे, कोटिन व्याधि हरै ।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सहज में जीव तरै ॥

कुछ शंकाओं का निराकरण

मुझसे काफ़ी लोग सवाल करते हैं । उनमें वज़न होता है । कुछ सवाल करते हैं कि क्या परम-पुरुष को नहीं पता था कि जीवों को निरंजन तंग करेगा। फिर आत्माएँ क्यों दीं ? मेरा जवाब होता है कि इतना सुरक्षित करके दिया है कि निरंजन इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। कुछ कहते हैं कि एक लाख जीव निगलने का शाप देना तो आत्मा को सजा हुई । नहीं, यह तो मन को सज़ा है । आत्मा का कुछ नहीं होता है। वो सुरक्षित है। कुछ लोग कहते हैं कि परम-पुरुष चाहे तो आत्माओं को मुक्ति नहीं दे सकता क्या ? एक पल में दे सकता है । पर फिर उनका शब्द नहीं कट गया, जो निरंजन को 17 चौकड़ी असंख्य युगों का राज्य करने के लिए दिया है! कुछ कहते हैं कि आत्मा का क्या कसूर था ? इसलिए आपके जीवन में एक मौका मिलेगा उस देश में जाने के लिए ।

13. कुछ शंकाओं का निराकरण

अंकुरी जीव कौन हैं? कौन से जीव भटकते हैं ? जो भी हमसे दीक्षा लेगा, भटकेगा तो भी लाइन पर आ जायेगा । पर आपकी कोशिश होनी चाहिए कि अगला जन्म न लें। कहीं भी कुछ गड़बड़ होगी तो आपको संकेत मिलेंगे । आपको सुरक्षा भी पूरी-पूरी मिल रही है, फिर भटकना क्यों है ? माँ छोटे बच्चे का कितना ध्यान रखती है, खिलाने का, नहलाने का, दूध पिलाने का, सर्वांगीण सुरक्षा करती है। वो बड़ा ध्यान रखती है, पर वो कहीं पर चूक भी जाती है। लेकिन आपकी सुरक्षा करने वाली ताक़त चूकती नहीं है। चुपचाप आप अपने अंदर बदलाव देख लेना । अगर आप गलती करें, साहिब ने छोड़ दिया तो फिर निरंजन जीत गया। साहिब आपको छोड़ेगा नहीं, सुधारकर छोड़ेगा। यह नहीं कि मरो जाकर। फिर तो निरंजन की जीत ही हुई। जितना आप गुरु के सान्निध्य में रहेंगे, उतनी भूलें कम करोगे । क्या प्रभु तक हमारी पुकार जाती है ? एक ने मुझसे कहा कि पीड़ा होने पर जब हम प्रभु को पुकारते हैं तो क्या परमात्मा तक हमारी पुकार जाती है या फिर हम ऐसे ही अँधकार में भटक रहे हैं ? उसने कहा कि आपकी बातों को सुनकर अजीब-सा लग रहा है। मैंने कहा कि जो भी संसार के लोग पुकार करते हैं, वो निरंजन तक जाती है। शरीर के कष्ट छुटकारा पाने के लिए ही तो पुकार कर रहे हैं न। वो निरंजन से संबंधित है। आत्मा का शरीर से कोई सरोकार नहीं है। वो निरंजन सब चीजें दे देता है ताकि लगे कि प्रभु ने पुकार सुनी। पर वो आत्मा का ज्ञान नहीं देने वाला। भौतिक पदार्थ दे देगा। नचिकेता का वृत्तांत सुना होगा । उसका पिता राजा था। वो बूढ़ी गाय दान में दे रहा था। नचिकेता को ठीक नहीं लगा। उसने सोचा कि यह तो जाकर इनकी सेवा ही करेगा । दान में तो अच्छी चीज़ होनी चाहिए। उसने पिता से पूछा कि मुझे किसको दान में दोगे ? पिता ने उसकी बात अनसुनी कर दी। नचिकेता ने 2-3 बार पूछा, पर उसके पिता ने ध्यान नहीं दिया। पर जब वो बार-बार पूछने लगा कि मुझे किसे दान में दोगे तो उसके पिता ने कहा कि