करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंकोई-कोई कीट पहली आवाज़ में ही शब्द को ग्रहण कर लेता है, कोई दूसरे और कोई तीसरे शब्द में ग्रहण करता है । कुछ-कुछ कीट कठिन हैं, जो पहली में परिवर्तित नहीं होते हैं। हालांकि वो आवाज़ सुनाई दी, पर कीट डर जाता है, भयभीत हो जाता है, संशय में आ जाता है। जैसे माताएँ बच्चों को बंदगी करवाने महापुरुष के पास ले जाती हैं तो वो बच्चा रोता है, सोचता है कि शायद डॉ० है, मुझे टीका लगा देगा। क्योंकि वो डॉ० के पास जा चुका होता है। ऐसे ही कीट को शंका होती है कि कहीं यह मुझे खा न ले । पर वो हितैषी है, सुखदायी है।
गुरु शब्द निश्चय सत्य माने, भृंगि मत तब पावई ।
तजि सकल आसा शब्द बासा, कागा हंस कहावई॥
ऐसे ही गुरु-शब्द सुखदाई है । भृंगे की भू-भू की प्रक्रिया में स्पन्दन है। कुछ कीट पहले में नहीं हो पाते हैं परिवर्तित । क्यों नहीं हुए। क्योंकि समर्पित नहीं होते । जब तक समर्पित होकर नहीं सुनता, उसका परिवर्तन नहीं हो पाता। फिर तीन बार में भी न हो तो भृंगा उसे छोड़ देता है, दूसरे को ढूँढ़ता है। तो पुनि कीट आसरे रहई .... फिर नहीं बन पाता है वो भृंगा ..... कीट ही रह जाता है । स्वामी परमानंद जी ने इसी बात को बड़े प्यारे शब्द में कहा है-
भृंगी जो आन कीट को खुद रंग लगावे ।
आवाज़ अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥
वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।
गुरु शब्द से फिलफौर रंग पलट सो जावे ॥
कोई और क़िस्म कर्म को ज़िनदार न देखे।
भृंगी जो अपने ढंग कीट ढूँढ़ के लावे ॥
वह ढूँढ़ काम अपने ही हम रंग हमेशा ।
दिल दे के उसको तबही अपने रूप बनावे ॥
दिल उसको देना चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिंदू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
हैं कीट लाख सदमें कोई एक ही मेरा ।