करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठयें आपको प्रभुहिं समर्पे । ताको कबहुँ काल नहिं दर्पे ॥
यानी खुद को समर्पित कर दे। आप अपने जीवन का सब भार साहिब पर सौंपकर देखना। दिल में यही भाव रखना-
जीवन का सब सौंप दिया अब भार तुम्हारे हाथों में ।
है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में ।।
समर्पण ध्यान-भजन से भी बढ़कर है । यदि श्रद्धा है तो बहुत लाभ मिल जायेगा। उदाहरण देता हूँ। एक बंदे ने नाम लिया; बड़ा भोला था। नाम लेने के कुछ समय बाद वो आया, कहा- गुरु जी, जबसे नाम लिया है, बड़े मज़े में हूँ। वो कहने लगा, गुरु जी, आपने नाम-दान के समय कहा था न कि तन, मन, धन तीनों आँख बंद करके दो। मैंने सोचा, सच में देने पड़ रहे हैं। मैंने दे दिये गुरु जी । मैंने सोचा, अब बीवी, बच्चे, घर सब आपका, क्योंकि सब कुछ दे दिया था। गुरु जी, मेरी छोटी-सी दुकान है। जब मैं खोलता हूँ तो आपकी समझकर। 24 घंटे गुरु जी आप खड़े रहते हैं, मेरा सब काम करते हैं। सच में गुरुजी, पूरी दुकान आप चला रहे हैं । कहीं घाटा होने वाला हो तो खुद ही खड़े हो जाते हो। मेरा तो कुछ चल ही नहीं रहा है। अब आप - ही - आप हो । मैं तो समझ रहा हूँ कि बीवी भी आपकी, बच्चे भी आपके, बस, मैं तो नौकर हूँ, जिसे आपने अपने आश्रम में न रखकर घर-परिवार की सेवा का काम सौंप दिया है। मेरी सारी ममता ही ख़त्म हो गयी है। उसने बहुत कुछ कहा। बड़ा भोला था वो, कहा—गुरु जी, एक बात बताऊँ, कभी-कभी रात को आप आते हो, मुझे घुमाने भी ले चलते हो । देखा न, कितना भोला था ! उसने सच में समर्पण कर दिया था, इसलिए साहिब को उसका सारा काम करना पड़ा। क्या तत्व की प्राप्ति में हम भागीदार हो सकते हैं? हमें क्या करना है ? साहिब ने एक बात बोली । इसमें वज़न है । भृंग का प्रमाण दिया। वो किसी भी कीट को पकड़ कर आवाज़ से बदल देता है । पर यहाँ एक शर्त है। भृंगी शब्द कीट जो माना ।
वरण फेर आपन कर जाना ॥
कोई कोई कीट परम सुखदाई |
प्रथम आवाज़ गहे चित्तलाई ॥
कोई दूजे कोई तीजे मानै । तन मन रहित शब्द हित जानै ॥
भृंगी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे रहई ॥