करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंयानी इन विरह की प्रार्थनाओं से मिल रहा है कि मैं सक्षम नहीं हूँ । अपनी बढ़ाई करोगे तो कुछ नहीं रह जायेगा । साहिब बड़ा प्यारा शब्द कह रहे हैं—
गुरु को शब्द न सुने अज्ञानी । भवसागर डूबे अभिमानी ॥
सतगुरु की मरयाद न धरई । लख चौरासी कुण्ड में परई ॥
साहिब कह रहे हैं कि हमेशा गुरु-मर्यादा में रहना है। जो गुरु-मर्यादा का उलंघन करता है, वो चौरासी में ही पड़ेगा।
गुरु को देख धरत अभिमाना । व्यास बचन पड नरकनिधाना ॥
जो गुरु के आगे अपना अहंकार दिखाता है, वो तो सीधा नरक में जायेगा।
गुरु को ज्ञान मेटि मत थापी । तीन लोक में बड़ो ते पापी ॥
गुरु को मेटि बखानत आपा । धरती भार मरत तेहि पापा ॥
गुरु से ऊँचा चढ़ि बैठे । सात कुण्ड नरक में पैठे॥
जो गुरु के ज्ञान को काटकर अपना ज्ञान दिखाता है, वो तीन लोक में सबसे बड़ा पापी कहलाता है । ऐसे पापी का भार धरती भी सहन नहीं कर पाती है। वो तो गुरु से ऊँचा चढ़कर बैठने का प्रयास कर रहा है। इसलिए जो ऐसा कर रहा है, वो सप्त कुंभी नरकों में ही पड़ता है।
गुरु से उलटा बचन सुनावै । सात जनम कोढ़ी को पावै ॥
गुरु को उलट सुनावै बैना । सात जनम अँधा होय सो नैना ॥
जो गुरु से बहस करता है, उन्हें उलटे बचन सुनाता है, वो सात जन्मों तक कोढ़ी का शरीर पाता है या फिर सात जन्म अँधा होता है ।
गुरु के सम्मुख हमेशा विनय के शब्द ही बोलने हैं।
दोउ कर जोरि गुरु के आगे । करि बहु विनती चरनन लागे ॥
अति शीतल बोलै सब बैना । मेटे सकल कप के बैना ॥
हे गुरु तुम हो दीनदयाला। मैं हूँ दीन करो प्रतिपाला॥
तुम बन्दीछोर अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥
यो अधीन होय शिष जबहीं । शिष पर कृपा करै गुरु तबहीं ॥
साहिब कह रहे हैं कि जब शिष्य गुरु के अधीन हो जाता है तब ही गुरु की कृपा मिलती है ।