करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरु शरणागति छाड़ि करि, करै भरोसा और ।
सुख सम्पत्ति की कह चली, नहीं नरक में ठौर ।।
तो शरणागति पक्की रखना ।
एक आस विश्वास तुम्हारी । पड़ा द्वार सब विधि मैं हारी।।
विश्वास को ठीक से समझना । कच्चा जीव विचलित हो जायेगा । मुझे एक उदाहरण याद आ गया। एक माता आई, कहा- माता : सिर में दर्द होता है मैं : भजन करो माता : भजन भी करती हूँ, आरती भी करती हूँ, माता की जोत भी जगाती हूँ। यह क्या था! मतलब कि वो भक्ति ठीक से नहीं समझ पाई। एक पागल लड़के को उसके माता-पिता मेरे पास लाए, कहा कि आपका नाम लेकर कुछ देर ठीक रहा, फिर नुक्स हो गया है। मैंने लड़के से पूछा तो उसने कहा कि आपकी कृपा है, कुछ नहीं, ठीक हूँ । ये ऐसे ही कभी सयाने के पास ले जाते हैं, कभी डोरा बाँध देते हैं। मेरा पूरा विश्वास है, पर ये मानते नहीं है। तो मैं पूछना चाहता हूँ कि यह कितनी कपट थी ! बस, यह नहीं करना, यह विश्वास नहीं है ।
सद्गुरु मूर्ति को ध्याना । ताके सन्मुख विनती ठाना ॥
यानी गुरु का ही ध्यान करता रहे। सोच यही हो -
मो सम पतित न कतहुँ निहारा । प्रभु सम और न तारनहारा ।।
गुरु के आगे कभी अपने गुणों का बखान नहीं करना, हमेशा अपने दोषों को ही बताना ताकि वे दयाल हों और दोषों को निकाल दें। मैं कामी मैं कुटलू, मैं अवगुण की खान । मो पर कृपा न छाड़िए,
दास आपनो जान ॥
अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार । भावे बंदा बक्श दो, भावे गर्दन
मार ॥
सतगुरु दीन दयाल जी, तुम लग मेरी दौड़ । जैसे काग जहाज पर सूझत कतहु न
ठौर ॥