भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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योग दान जप तीर्थ नहाना । गुरु सेवा बिनु निष्फल जाना ॥

गुरु सेवा बिनु बहु पछतावे । फिरि फिरि यम के द्वारे जावे ॥

गुरु सेवा बिनु कौन जो तारे । भव सागर से बाहर डारे ॥

गुरु सेवा बिनु कछु न सरि है । महाअन्ध कूपै महँ परि है ॥

गुरु सेवा बिनु घट अँधियारा । कैसे प्रकटे ज्ञान उजियारा॥

गुरु सेवा बिनु द्वन्द अँधेरा । गुरु सेवा बिनु काल को चेरा ॥

गुरु सेवा बिनु प्रेम विहूना । दिन दिन मोह होय भ्रम दूना ॥

साहिब कह रहे हैं गुरु-सेवा के बिना योग, जप, तप, तीर्थ सब व्यर्थ हैं। यदि गुरु की सेवा नहीं की तो बाद में पछताना ही पड़ेगा । गुरु-सेवा के बिना ज्ञान का प्रकाश नहीं हो सकता है। गुरु सेवा से हृदय प्रकाशित होता है । जिसमें गुरु-सेवा का भाव नहीं है, वो गुरु- प्रेम से रहित है। शिष्य को चाहिए कि गुरु-सेवा करते हुए मन में अहंकार न आने दे। यदि अहंकार होगा तो गुरु सेवा किसी काम की नहीं रह जायेगी । गुरु के अधीन होकर ही रहना है, ताकि उनकी कृपा मिलती रहे ।

गुरु आगे राखे माथ । करै विनय दुख मेटो नाथ ॥

अहौं अधीन तुम्हारे दासा । देहू अपने चरनन वासा ॥

यह तन मैं तोहि भेंट चढ़ायो । अपनी इच्छा कुछ न रखायो ॥

जो चाहो सो तुम अब करो । या भांड को जेहि विधि भरो ॥

भावै धूप छाँह में डारो । भावै बोरो भावै तारो॥

गुण पौरुष कछु ओ नहिं मेरो । सब विधि शरण गही गुरु तेरो ॥

मैं अब बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सो करिये पारी ॥

अपना कीजै गरिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गोसाईं ॥

बहु विधि विनती गुरु से करई । मान मोह हृदय नहिं धरई ॥

देखि विनय गुरु होहिं अनन्दा | तब पावै सिख परमानन्दा ॥

देखि प्रसन्नता गुरु की भाई । गुरु ते कहिये शीश नवाई ॥

ऋद्धि सिद्धि फल मैं कछु नहिं चाहूँ । जगत कामना को नहिं लाहूँ ॥

चौरासी में बहु दुख पायो । ताते शरण तुम्हरी आयो ॥

होहु दयाल दया अब कीजे । डूबत भव में बाँह गहीजे ॥

शिष्य का विनय भाव देखकर गुरु शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते हैं। जब गुरु प्रसन्न हो जाएँ तो जो कहना है, कह लें ।