करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतैतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊं काहीं ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश ने तहिया । शास्त्र वेद पुराण न कहिया ॥
तब सब रहे पुरूष के माहीं । ज्यों बट वृक्ष मध्य रह छाहीं ॥
हे धर्मदास! मैं तब की बात कह रहा हूँ, जब धरती और आकाश नहीं थे; जब कूर्म, शेष, बाराह, शरद, गोरी, गणेश आदि कोई भी न था; जब जीवों को कष्ट देने वाला निरंजन भी न था; जब तैतीस करोड़ देवता भी न थे.... और अधिक क्या बताऊँ ? ब्रह्मा, विष्णु और महेश न थे । वेद, शास्त्र, पुराण आदि भी न थे। लेकिन वह एक था । कबीर साहिब कहते हैं कि प्रारम्भ में सत्य - पुरुष गुप्त थे। उनका कोई साथी-संगी नहीं था । वे कभी बने नहीं हैं और न ही मिटेंगे । जिस किसी वस्तु का सृजन होता है, वह अन्ततः नष्ट भी अवश्य हो जाती है। लेकिन जो परम - पुरुष कभी बना ही नहीं, वह मिट कैसे सकता है! साहिब धर्मदास से कहते हैं कि साकार, निराकार, लोक - लोकान्तर आदि सब बाद में बने; अतः गवाही किसकी दूँ ! चारों वेद भी सत्य पुरुष की कहानियाँ नहीं जानते और सभी निराकार अर्थात काल - पुरूष तक की बात ही कहते हैं । धरती, आकाश, ब्रह्माण्ड, निरंजन, त्रिदेव आदि की उत्पति के विषय में बताते हुए साहिब फरमाते हैं कि सर्वप्रथम परम-पुरुष ने इच्छा करके एक शब्द पुकारा, जिससे एक अद्भुत श्वेत रंग का प्रकाश हुआ और वह अद्भुत प्रकाश अनन्त में फैल गया। वह प्रकाश सांसारिक प्रकाश की भांति न था, वह इतना अद्भुत था की जिसका एक-2 कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे। जब वह प्रकाश अनन्त में फैल गया तो फिर वे सत्य-पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये। अब वह प्रकाश चेतन हो गया, जीवित हो गया । जिस प्रकार आत्मा के शरीर में आने से शरीर चेतन हो जाता है । उसी तरह वह प्रकाश भी जीवित हो उठा। प्रकाश में आने से पहले वे सत्य - पुरूष अगम थे, गुप्त थे जबकि प्रकाश में आकर ही वे सत्य - पुरुष कहलाए और वह अद्भुत प्रकाश, जो स्वयं सत्य-पुरूष ही थे, अमर-लोक कहलाया ।