भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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सोई निज पीव हमारा है

संतों ने जिसे 'साहिब' कहकर पुकारा है, वो साहिब ही हमारा परमात्मा है । वो ही हमारा प्रियतम है । सब जीव उसी के अंश हैं। वह आनन्द का सागर है। कहते हैं कि जीवात्माएँ उससे बिछुड़ कर इस संसार में आ फँसी हैं। तो आइए, अब देखते हैं कि जीवात्माएँ अपने साहिब से कैसे बिछुड़ गयीं ? एक बार धर्मदास जी ने अमर - लोक तथा सृष्टि-उत्पत्ति के विषय में जानने की इच्छा से कबीर साहिब से प्रार्थना करते हुए पूछा -

अब साहिब मोहि देउ बताई । अमर - लोक सो कहां रहाई॥

कौन द्वीप हंस को वासा। कौन द्वीप पुरुष रह वासा॥

तीन लोक उत्पत्ति भाखो । वर्णहुसकल गोय जनि राखो॥

काल-निरंजन किस विधि भयऊ। कैसे षोडश सुत निर्मयऊ ॥

कैसे चार खानि बिस्तारी । कैसे जीव कालवश डारी ॥

त्रय देवा कौन विधि भयऊ। कैसे महि आकाश निर्मयऊ ॥

चन्द्र सूर्य कहु कैसे भयऊ। कैसे तारागण सब ठयऊ॥

किस विधि भई शरीर की रचना । भाषो साहिब उत्पत्ति बचना ॥

हे सहिब ! कृपा करके अब मुझे बताओ कि वह अमर- कहाँ है? उस अमर-लोक में जीव किस स्थान पर रहते हैं ? तीन लोक की उत्पत्ति कैसे हुई ? काल-पुरुष कैसे हुआ ? सोलह पुत्र कैसे बने ? यह निर्मल आत्मा चार खानियों में कैसे गयी ? आत्माएँ काल - पुरुष के चंगुल में कैसे फँस गयीं? त्रिदेव कैसे बने? पृथ्वी और आकाश कैसे बने ? शरीर की रचना कैसे हुई? हे साहिब ! कृपा करके मुझे सृष्टि की उत्पति का सारा भेद समझाकर कहिए । तब धर्मदास को अधिकारी जानकर कबीर साहिब ने फरमाया-

तब की बात सुनहु धर्मदासा । जब नहिं महि पाताल अकाशा ॥

जब नहिं कूर्म बराह और शेषा । जब नहिं शारद गोरि गणेश ।

जब नहिं हते निरंजन राया। जिन जीवन कह बांधि झुलाया ॥