करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहले सेवक की सुरति को मसलते हैं। जिन सात स्थानों पर मन ने सुरति को अपने में उलझा रखा था वहाँ से छुड़ा लेते हैं । इस तरह आत्मा को मन से अलग कर देते हैं और अपनी सुरति के साथ मिला लेते हैं । 2. सुरति को चेतन कर देते हैं, जिससे हृदय प्रकाशित हो जाता है। इस तरह मन के सारे विकार समझ आने लगते हैं । 3. नाम के समय उस सुपर पॉवर को ही साथ कर देते हैं, जो शिष्य की सोते और जागते हुए पक्के तौर पर सुरक्षा करती है । मन को संसार में कोई भी जीत नहीं सकता । " मनहिं निरंजन सबै नचावै। नाम होय तो माथ नमावै ॥" नाम क्या चीज़ है ? सतगुरु की सुरति में सिस्टम हैं। नामदान के समय- (1) मन और आत्मा अलग करना (2) हृदय प्रकाशित करना (3) सुरक्षा (कम्पलीट सिक्योरिटी) ।
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अंतरो जान।
वह लोहा कंचन करे, गुरु करले आप समान ॥
सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण। नाम अकेला
रह गया, पाया पद निर्वाण ॥
इस तरह सद्गुरु नाम देकर मन-माया के सारे जाल काट हंस को छुड़ाकर ले जाता है। तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार है । लागि रहे सिद्धि साधु न पावत पार है।
सन्तो सो सतगुरु मोहि भावे, जो आवागमन मिटावै ।
द्वार ना मूदे पवन न रोके, न अनहन उरझावे ॥
- साहिब कबीर