भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पहले सेवक की सुरति को मसलते हैं। जिन सात स्थानों पर मन ने सुरति को अपने में उलझा रखा था वहाँ से छुड़ा लेते हैं । इस तरह आत्मा को मन से अलग कर देते हैं और अपनी सुरति के साथ मिला लेते हैं । 2. सुरति को चेतन कर देते हैं, जिससे हृदय प्रकाशित हो जाता है। इस तरह मन के सारे विकार समझ आने लगते हैं । 3. नाम के समय उस सुपर पॉवर को ही साथ कर देते हैं, जो शिष्य की सोते और जागते हुए पक्के तौर पर सुरक्षा करती है । मन को संसार में कोई भी जीत नहीं सकता । " मनहिं निरंजन सबै नचावै। नाम होय तो माथ नमावै ॥" नाम क्या चीज़ है ? सतगुरु की सुरति में सिस्टम हैं। नामदान के समय- (1) मन और आत्मा अलग करना (2) हृदय प्रकाशित करना (3) सुरक्षा (कम्पलीट सिक्योरिटी) ।

पारस में अरु संत में, तू बड़ो अंतरो जान।

वह लोहा कंचन करे, गुरु करले आप समान ॥

सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण। नाम अकेला

रह गया, पाया पद निर्वाण ॥

इस तरह सद्गुरु नाम देकर मन-माया के सारे जाल काट हंस को छुड़ाकर ले जाता है। तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार है । लागि रहे सिद्धि साधु न पावत पार है।

सन्तो सो सतगुरु मोहि भावे, जो आवागमन मिटावै ।

द्वार ना मूदे पवन न रोके, न अनहन उरझावे ॥

  • साहिब कबीर

4. सोई निज पीव हमारा है

सोई निज पीव हमारा है

संतों ने जिसे 'साहिब' कहकर पुकारा है, वो साहिब ही हमारा परमात्मा है । वो ही हमारा प्रियतम है । सब जीव उसी के अंश हैं। वह आनन्द का सागर है। कहते हैं कि जीवात्माएँ उससे बिछुड़ कर इस संसार में आ फँसी हैं। तो आइए, अब देखते हैं कि जीवात्माएँ अपने साहिब से कैसे बिछुड़ गयीं ? एक बार धर्मदास जी ने अमर - लोक तथा सृष्टि-उत्पत्ति के विषय में जानने की इच्छा से कबीर साहिब से प्रार्थना करते हुए पूछा -

अब साहिब मोहि देउ बताई । अमर - लोक सो कहां रहाई॥

कौन द्वीप हंस को वासा। कौन द्वीप पुरुष रह वासा॥

तीन लोक उत्पत्ति भाखो । वर्णहुसकल गोय जनि राखो॥

काल-निरंजन किस विधि भयऊ। कैसे षोडश सुत निर्मयऊ ॥

कैसे चार खानि बिस्तारी । कैसे जीव कालवश डारी ॥

त्रय देवा कौन विधि भयऊ। कैसे महि आकाश निर्मयऊ ॥

चन्द्र सूर्य कहु कैसे भयऊ। कैसे तारागण सब ठयऊ॥

किस विधि भई शरीर की रचना । भाषो साहिब उत्पत्ति बचना ॥

हे सहिब ! कृपा करके अब मुझे बताओ कि वह अमर- कहाँ है? उस अमर-लोक में जीव किस स्थान पर रहते हैं ? तीन लोक की उत्पत्ति कैसे हुई ? काल-पुरुष कैसे हुआ ? सोलह पुत्र कैसे बने ? यह निर्मल आत्मा चार खानियों में कैसे गयी ? आत्माएँ काल - पुरुष के चंगुल में कैसे फँस गयीं? त्रिदेव कैसे बने? पृथ्वी और आकाश कैसे बने ? शरीर की रचना कैसे हुई? हे साहिब ! कृपा करके मुझे सृष्टि की उत्पति का सारा भेद समझाकर कहिए । तब धर्मदास को अधिकारी जानकर कबीर साहिब ने फरमाया-

तब की बात सुनहु धर्मदासा । जब नहिं महि पाताल अकाशा ॥

जब नहिं कूर्म बराह और शेषा । जब नहिं शारद गोरि गणेश ।

जब नहिं हते निरंजन राया। जिन जीवन कह बांधि झुलाया ॥

तैतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊं काहीं ॥

ब्रह्मा विष्णु महेश ने तहिया । शास्त्र वेद पुराण न कहिया ॥

तब सब रहे पुरूष के माहीं । ज्यों बट वृक्ष मध्य रह छाहीं ॥

हे धर्मदास! मैं तब की बात कह रहा हूँ, जब धरती और आकाश नहीं थे; जब कूर्म, शेष, बाराह, शरद, गोरी, गणेश आदि कोई भी न था; जब जीवों को कष्ट देने वाला निरंजन भी न था; जब तैतीस करोड़ देवता भी न थे.... और अधिक क्या बताऊँ ? ब्रह्मा, विष्णु और महेश न थे । वेद, शास्त्र, पुराण आदि भी न थे। लेकिन वह एक था । कबीर साहिब कहते हैं कि प्रारम्भ में सत्य - पुरुष गुप्त थे। उनका कोई साथी-संगी नहीं था । वे कभी बने नहीं हैं और न ही मिटेंगे । जिस किसी वस्तु का सृजन होता है, वह अन्ततः नष्ट भी अवश्य हो जाती है। लेकिन जो परम - पुरुष कभी बना ही नहीं, वह मिट कैसे सकता है! साहिब धर्मदास से कहते हैं कि साकार, निराकार, लोक - लोकान्तर आदि सब बाद में बने; अतः गवाही किसकी दूँ ! चारों वेद भी सत्य पुरुष की कहानियाँ नहीं जानते और सभी निराकार अर्थात काल - पुरूष तक की बात ही कहते हैं । धरती, आकाश, ब्रह्माण्ड, निरंजन, त्रिदेव आदि की उत्पति के विषय में बताते हुए साहिब फरमाते हैं कि सर्वप्रथम परम-पुरुष ने इच्छा करके एक शब्द पुकारा, जिससे एक अद्भुत श्वेत रंग का प्रकाश हुआ और वह अद्भुत प्रकाश अनन्त में फैल गया। वह प्रकाश सांसारिक प्रकाश की भांति न था, वह इतना अद्भुत था की जिसका एक-2 कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे। जब वह प्रकाश अनन्त में फैल गया तो फिर वे सत्य-पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये। अब वह प्रकाश चेतन हो गया, जीवित हो गया । जिस प्रकार आत्मा के शरीर में आने से शरीर चेतन हो जाता है । उसी तरह वह प्रकाश भी जीवित हो उठा। प्रकाश में आने से पहले वे सत्य - पुरूष अगम थे, गुप्त थे जबकि प्रकाश में आकर ही वे सत्य - पुरुष कहलाए और वह अद्भुत प्रकाश, जो स्वयं सत्य-पुरूष ही थे, अमर-लोक कहलाया ।

अभी भी सत्य - पुरूष अकेले ही थे । फिर उनकी मौज हुई और उन्होंने उस प्रकाश को अर्थात अपने ही स्वरूप को अपने में से छिटका दिया। अनन्त बिन्दुएँ हुईं, जो वापिस उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में आयी। जिस प्रकार समुद्र में से पानी को मुट्ठी में या हाथों में भरकर उछालने से कई कण बिखर जाते हैं, उसी तरह उस प्रकाश में से भी अनेक कण बिखर गये। लेकिन जिस प्रकार समुद्र की बूँदें पुन: समुद्र में गिर, समुद्र का ही रूप हो जाती हैं, उसी तरह वे अनन्त कण भी वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आए; लेकिन अचरज यह था कि वे बिन्दुएँ जब वापिस प्रकाश में आयीं तो वे प्रकाशमय नहीं हुईं, क्योंकि सत्य-पुरूष ने इच्छा की कि इनका अपना अलग अस्तित्व भी रह जाए। वे ही जीव (आत्माएं) कहलाये । वे सब जीव उसी अद्भुत प्रकाश में विचरण करने लगे । आत्माओं का उस प्रकाश में अलग अस्तित्व के साथ विचरण करना बड़े अचरज की बात थी क्योंकि समुद्र की बूँदों का समुद्र में अपना अलग अस्तित्व नहीं होता । जिस तरह पानी में मछली घूमती रहती है, उसी तरह सब जीव उस प्रकाश में घूमने लगे । ये देख परम-पुरूष बड़े खुश हुए और उन आत्माओं से बहुत प्यार करने लगे। बहुत समय ऐसे व्यतीत हो गया और सभी जीव उस अद्भुत प्रकाश में विचरण करते हुए परम-आनन्द लूट रहे थे। ‘सदा आनन्द होत है वा घर, कबहु न होत उदासा।' वहाँ उस अमर-लोक में आत्मा का प्रकाश 16 सूर्य का है और परम-पुरूष के मात्र एक रोम का प्रकाश ही करोड़ों सूर्य तथा चन्द्रमा को लज्जा देने वाला है । अत: जब परम-पुरूष के एक रोम की ऐसी महिमा है तो फिर वह परम-पुरूष स्वयं कैसा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । फिर परम-पुरूष ने शब्दों से पुत्र उत्पन्न किये अर्थात जो बोलते जा रहे थे, वह पुत्र बन रहा था। जैसे ही परम - पुरूष ने इच्छा करके दूसरा शब्द पुकारा तो 'कूर्म' उत्पन्न हुआ । इसी तरह तीसरे शब्द से 'ज्ञान' और चौथे शब्द से 'विवेक' उत्पन्न हुआ। परम-पुरूष ने सोचा कि मैं जो बोल रहा हूँ, वह सब पैदा हो रहा है, तो क्यों न एक अपने जैसा भी बना दूँ! अतः इस बार परम-पुरूष ने एक और परम-पुरूष बनाने की इच्छा से तीव्र आवाज़ में शब्द पुकारा। यह शब्द

परम-पुरूष ने थोड़ी संशय में पुकारा । इस शब्द से 'निरंजन' (मन) हुआ । परम-पुरूष तब यह जानने के लिए कि क्या उनके द्वारा उत्पन्न पाँचवां शब्द पुत्र उनके जैसा ही है या नहीं, उस समय परम-पुरूष निरंजन में समाए। परम- पुरूष को एक क्षण के लिए शंका आई कि यह तो मेरा शरीर नहीं है और अपने को वहाँ से खींचकर अपने शरीर में लाए। फिर परम-पुरूष ने छठा शब्द पुकारा तो उससे 'सहज' की उत्पति हुई। सातवें शब्द से 'संतोष', आठवें से ‘चेतना', नौवें से ‘आनन्द', दसवें से 'क्षमा', ग्यारहवें से 'निष्काम', बारहवें से 'जलरंगी', तेहरवें से 'अचिन्त' चौदहवें से 'प्रेम', पन्द्रहवें से ' दीन- दयाल', तथा सोलहवें शब्द से 'धैर्य', उत्पन्न हुआ । उस अमर - लोक की शोभा को बढ़ाने के लिए ही परम-पुरुष ने इन शब्द पुत्रों को उत्पन्न किया । ये सभी उसी अमर-लोक में विचरण करने लगे । ये सब परम-पुरूष के शब्द पुत्र थे, जिन्हें परम - पुरूष ने इच्छा से पैदा किया, लेकिन आत्मा इच्छा से नहीं बनी। आत्मा तो परम - पुरुष का ही अंश है । इस तथ्य को कबीर साहिब ने बड़े सुन्दर ढंग से कहा है-

जीवरा अंश पुरुष का आही ।

आदि अन्त कोउ जानत नाहीं ॥

जीवों को उस अमर-लोक में विचरण करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके पश्चात् पाँचवां पुत्र 'निरंजन' ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एकाग्रचित होकर परम-पुरूष का ध्यान किया। परम-पुरुष सेवा से प्रसन्न हुए और पूछा कि इतना घोर तप क्यों कर रहे हो ? निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं थोड़ा सा स्थान दे दो । परम - पुरुष ने तब निरंजन को मानसरोवर स्थान दिया (मानसरोवर अमर - लोक का ही एक द्वीप है ) । मानसरोवर पहुँच कर निरंजन बड़ा खुश हुआ और आन्नद वहाँ रहने लगा। लेकिन कुछ ही समय बाद पुनः परम-पुरूष का ध्यान करने लगा । निरंजन ने पुन: 70 युग तक परम- पुरुष का ध्यान किया। परम-पुरूष ने सेवा से प्रसन्न होकर पूछा कि अब क्या चाहते हो ? निरंजन-

इतना ठांव न मोहि सुहाई ।

अब मोहि बकसि देहहु ठकुराई ॥

कै मोहि देहु लोक अधिकारा ।

कै मोहि देहु देश इक न्यारा ॥

निरंजन ने कहा “मैं इतने से खुश नहीं हूँ । अब कृपा करके या तो इस अमर-लोक का राज्य ही मुझे दे दो या फिर एक अलग से न्यारा देश दो, जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो, जहां मैं स्वतन्त्र रूप से बिना किसी रोक- टोक के अपना कार्य कर सकूँ ।" परम-पुरूष ने तब निरंजन से कहा कि तुम्हारे बड़े भाई कूर्म के पास पाँच तत्त्व का बीज (जो सूक्ष्म रूप में था) है। तुम उसके पास जाकर प्रार्थना करना और पाँच तत्त्व का बीज ले लेना । उससे तुम शून्य में तीन - लोक बनाना। जाओ! तुम्हें 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य देता हूँ । निरंजन कूर्म जी के पास पहुँचा, लेकिन कूर्म जी से प्रार्थना नहीं की, और बल से पाँच तत्त्व का बीज उसी प्रकार उनसे छीन लिया, जैसे किसी के शरीर से खून खींचकर निकालते हैं । कूर्म जी शांत थे, उन्होंने सोचा कि यह कौन शैतान यहाँ आ गया है ! कूर्म जी ने तब परम- पुरूष से पुकार की, कहा- यह किस शैतान को यहाँ भेज दिया है ! इसने तो मेरे साथ बल का प्रयोग करके पाँच तत्त्व का बीज छीना है। परम-पुरूष ने कूर्म जी से कहा कि तुम शांत रहो, यह तुम्हारा छोटा भाई है, इसे माफ कर दो । लोकिन परम-पुरूष ने सोचा कि यह कैसा निरंजन उत्पन्न हुआ है ! पाँच तत्त्व का बीज लेकर निरंजन ने उससे पाँच तत्त्व (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश ) बनाए । जिस तरह कुम्हार मिट्टी से तरह -2 की वस्तुएँ बनाता है, उसी तरह निरंजन ने भी इन पाँच तत्त्वों से 49 करोड़ योजन पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे, सप्त-पाताल, सप्त- लोक, सब बना दिया । ऐसे शून्य में कई दिन रहा, लेकिन जीव नहीं थे, इसलिए यह निर्जीव सृष्टि थी । निरंजन ने सोचा कि यदि जीव ही नहीं है तो फिर सृष्टि का क्या लाभ ! अतः उसने पुन: 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया। परम-पुरूष ने पूछा कि अब क्या चाहिए ? निरंजन - -

दीजै खेत बीज निज सारा ।।

निरंजन ने कहा "मैंने तीन-लोक की रचना तो की है, लेकिन जीव ही नहीं हैं तो राज्य किस पर करूँ ! इसलिए कृपा करके थोड़े से जीव मुझे भी दे दें, ताकि मैं उन पर राज्य कर सकूँ ।' परम-पुरुष ने तब इच्छा करके ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं । आद्य शक्ति ने परम - पुरुष को प्रणाम करते हुए पुछा कि उसे क्यों बनाया गया है ? परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएं देते हुए कहा कि पुत्री ! मानसरोवर में निरंजन है, जिसने शून्य में तीन-लोक की रचना की है। तुम ये आत्माएं लेकर उसके पास जाओ और दोनों मिलकर शून्य में सत्य-सृष्टि करो (आत्माओं को योनियों में न लाकर अर्थात शरीरों में न डालकर सत्य-सृष्टि करने की आज्ञा दी, जैसी कि अमर - लोक की सृष्टि थी)। रुद्र मांस वाली सृष्टि करने की आज्ञा नहीं दी थी। यहीं पर जीवात्माएँ अपने साहिब से बिछुड़ गयीं। निरंजन ने फिर आद्य-शक्ति को भी बलपूर्वक अपने साथ रख लिया और सत्य - पुरुष की आज्ञा का उलंघन करते हुए उसने सत्य-सृष्टि के बजाय शरीर - सृष्टि की और जीवों को अनेकानेक कष्ट देना प्रारम्भ कर दिया । जीवों का सारा आनन्द लुट गया। साहिब कह रहे हैं- बासुरि सुख ना रैणि सुख, नाँ सुपिनै माहिं ।

कबीर बिछुड़ा साहिब सूं, ना सुख धूप न छाहिं ॥

तथा

चकवी बिछुड़ी रैणि की, आई मिली परभाति ।

जे जन बिछुड़े साहिब सूं, ते दिन मिले न राति ॥

साहिब कह रहे हैं कि चकवी (एक पक्षी, जो रात को अपने प्रियतम से बिछुड़ जाती है ) चाहे रात्रि में अपने प्रियतम से बिछुड़ जाती है, पर प्रात: होते ही पुन: मिल जाती है अर्थात उसका कष्ट थोड़ी देर का होता है, पर जीवात्माएँ अपने साहिब से बिछुड़ कर पुनः मिल नहीं पा रही हैं, उन्हें निरन्तर कष्ट सहने पड़ रहे हैं। अनेक कुकर्म करने के कारण सत्य - पुरुष ने निरंजन को मानसरोवर से निकाल दिया था और एक लाख जीव नित्यप्रति ग्रसित करने का शाप दे

दिया था। पहले सत्य-पुरुष ने उसे मिटाने की बात भी सोची, लेकिन तब तक वे उसे 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य करने का 'शब्द' दे चुके थे; अतः ऐसा करने से उनका शब्द कट जाता था। जब निरंजन जीवों को तप्त शिला पर भून भून कर खा रहा था, उन्हे अनेकानेक कष्ट दे रहा था, तब सब जीवों ने मिलकर सत्य - पुरुष को पुकारा। सब जीवों ने मिलकर कहा कि यदि कोई परमात्मा है तो हमें बचाओ ! काल-पुरुष का दण्ड हमसे सहा नहीं जा रहा। अब निरंजन को मिटाया भी नहीं जा सकता था, क्योंकि उसे शब्द मिल चुका था और जीवों की पुकार को अनसुना भी नहीं किया जा सकता था। साहिब भी अब करे तो क्या करे ! अब साहिब ने स्वयं को मथा और अपने में से ही एक परम - सत्ता निकाली। जैसे दही के मथने पर घी बाहर आ जाता है, वैसे ही साहिब ने अपने को मथ साहिब - सत्य - कबीर को निकाला और उनसे कहा कि जीवों को शून्य में निरंजन बड़ा कष्ट दे रहा है, उन्हें छुड़ाओ । एक बार तो कबीर साहिब ने निरंजन का शीश ही उखाड़ फेंका, लेकिन फिर सत्य-पुरुष के शब्द का ख्याल करके पुनः सुरति करके जोड़ दिया । कबीर साहिब कभी-2 इस संसार में सद्गुरू रूप में अवतरित होकर युक्ति - 2 रूप से जीवों को सत्य - भक्ति में लगाकर अमर - लोक लेने आते हैं। चूंकि यहाँ पर सब काल - पुरुष की भक्ति में लीन हैं, इसलिए यह काम थोड़ा कठिन भी हो जाता है । सब जीव आसानी से उन्हें समझ नहीं पाते हैं और उलटे उन्हीं के शत्रु हो जाते हैं । इसलिए जो सत्य - पुरुष के अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरू की शिक्षा सुनकर ऐसे दौड़कर मिलते हैं जैसे लोहे से चुम्बक चिपट जाता है और जो काल - पुरुष के जीव हैं उन पर सत्य-पथ की शिक्षा का कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है । विडम्बना यही है जीव साहिब से बिछुड़ कर काल की दुनिया में अनेक कष्ट सहते हुए भी बार-बार काल-पुरुष के जाल में उलझ रहे हैं और पुनः साहिब से मिलने का प्रयत्न नहीं कर रहे। सब गफलत की नींद में सो रहे हैं। तभी तो साहिब चेता रहे हैं-

कबीर सोकर क्या करे, उठ और उठकर जाग ।

जिनके संग से बिछुड़ा, वा ही के संग लाग ॥

कह हैं कि जिस साहिब रूपी प्रियतम से बिछुड़ गया है, उसी की भक्ति कर । आगे कह रहे हैं-

तुमको बिसर गईं सुध घर की महिमा अपन जनाई हो॥

निरंकार निर्गुण है माया, तुम को नाच नचाई हो ॥

चर्म दृष्टि का कुलफा देके, चौरासी भरमाई हो ॥

कह रहे हैं कि हे हंसा! तुम्हें अपने सही घर की सुध भूल गयी है । तुम अपनी महिमा को नहीं जानते हो, अपनी ताक़त को नहीं समझते हो । जो निर्गुण है, निरंकार है, वो सब माया है; वो तुम्हें नाना नाच नचा रही है । तुम्हें भौतिक आँखों की परेशानी देकर, माया में लुभाकर चौरासी की धारा में भरमा दिया है। आगे कह रहे हैं- - चार वेद हैं जाकी स्वांसा, ब्रह्मा अस्तुति गाई हो ।

सो कथि ब्रह्मा जगत भुलाए, तेहि मार्ग सब जाई हो ॥

चार वेद उस निर्गण की स्वांसा से उत्पन्न हुए हैं और उन्हीं की अस्तुति ब्रह्मा जी ने गाई है। ऐसे में सब जीव भ्रमित हो गये हैं और उसी निर्गुण परमात्मा की राह पर जा रहे हैं, जो उन्हें चौरासी में भ्रमित किए हुए है। .... तो साहिब ने परम - पुरुष रूपी सच्चे प्रियतम की बात कही। वो सगुण-निर्गुण से परे है। दुनिया परमात्मा को निराकार कह रही है। इस पर साहिब कह रहे हैं— बेचूने जग राँचिया, साहिब नूर निनार ।

आखिर केरे वक्त को, किसका करै दीदार ।।

दुनिया निराकार में मग्न है । यदि वो निराकार है तो अंत में किसका दर्शन करोगे! वो सच्चा साहिब तो शब्द और प्रकाश स्वरूप है । पर वो नि:शब्द शब्द है, अनहद शब्द नहीं। वो अद्भुत प्रकाश है, सांसारिक प्रकाश नहीं । दुनिया कह रही है कि वो अवतार धारण करके संसार में आता है, पर साहिब कह रहे हैं-

दशरथ कुल औतर नहीं आया। नहीं लंका के राव सताया।।

पृथ्वी रमण धमन नहीं करिया । पैठि पाताल न बलि छलिया ।।

... ई सब काम साहिब के नाहीं । झूठ कहै संसारा ।।

ये सब काम साहिब के नहीं हैं, निरंजन के हैं। वो किसी से छल नहीं करता । वो किसी को नहीं मारता ।

है दयाल द्रोह न वाके, कहु कौन को मारा ।।

यह सारा पसार उसी का है।

जन्म मरण से रहित है, मेरा साहिब सोय ।

बलिहारी उस पीव की, जिन सिरजा सब कोय ।।

साहिब धर्मदास को परम-पुरुष के विषय में बताते हुए कह रहे हैं-

अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड रच, सब से रहे न्यार ।

जिन्द कहे धर्मदास सों, ताका करो विचार ॥

कह रहे हैं कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करके स्वयं सबसे न्यारा है, उसका विचार करो ।

देस हमार न्यार तिहुँ पुर ते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुर से ॥

तहाँ नहीं यम का प्रवेशा। आदि पुरुष का है वह देशा ॥

सत्यलोक तेहि देस सुहेला । सत्यनाम गहि कीजे मेला ॥

अद्भुत ज्योति पुरुष की काया । हंसन शोभा अधिक सुहाया ॥

एक हंस जस षोडस भाना । अग्र वासना हंस अघाना ॥

सत्यपुरुष की ऐसी बाता । कोटिक शशी इक रोम लजाता ।।

एक रोम की शोभा ऐसी । और बदन की बरनौं कै सी ॥

अनगिनत चन्दा

जगत में, अनगिनत दरसें

सूर ॥

झलकें नूर सब, नूर नूर

भरपूर ॥

ऐसी शोभा लोक की, सत्य पुरुष की

कोटि चन्द की शीतलता, कोटि सूर्य का

सेज ॥

तेज ॥

कह रहे हैं कि परम-पुरुष के एक-एक रोम की महिमा इतनी है कि करोड़ों सूर्य और चंद्रमा लजा जाएँ। फिर पूरे शरीर की महिमा कैसे वर्णन करूँ !!

शब्द अखण्ड होत दिन राती । न कोई पूजा न कोई पाती ॥

ऐसी हकीकत को मैंने जाना । अरस कुरस नूर कोटि भानु साँच दरस, तेज मानु, रोम रोम पुंज देखा ॥ देखा । - गरीबदास जी

गरीबदास जी कह रहे हैं कि मेरी इस बात को सच मानना कि मैंने उस परम-पुरुष के एक-एक रोम में करोड़ों सूर्यों का प्रकाश देखा । कोई पारखी ही उसे समझ सकता है। वो परम - पुरुष ही आत्मा का सच्चा प्रियतम है । साहिब कह रहे हैं-

आवै न जावै मरे नहिं जनमे, सोई निज पीव हमारा हो ।

ना कोई जननी ने जन्मो, ना कोई सिरजनहारा हो ॥

साध न सिद्ध मुनि ना तपसी, ना कोई करत अचारा हो ।

ना षट दर्शन चार वर्ण में, ना आश्रम व्यवहारा हो ॥

ना त्रिदेवा सोहं शक्ति, निराकार से पारा हो ।

शब्द अतीत अचल अविनाशी, क्षर अक्षर से न्यारा हो ॥

ज्योति स्वरूप निरंजन नाहीं, ना ओम हंकारा हो ।

धरणि न गगन पवन ना पानी, ना रवि चंद न तारा हो ॥

है प्रगट पर दीसत नाहीं, सतगुरु सैन सहारा हो ।

कहैं कबीर सब घट में साहिब, परखो परखनहारा हो ॥

शब्दों की तरफ ध्यान दें । कह रहे हैं कि जो हमारा सच्चा प्रियतम है, वो जन्म-मरण से परे है, संसार में आता-जाता नहीं यानी वो माता के पेट से अवतार धारण करके नहीं आता । उसका कोई माता-पिता नहीं है और न ही उसे किसी ने बनाया है । वो न सिद्ध है, न साधु, न तपस्वी और न ही वो संसार के आचार करता है। वो इनमें से भी कोई नहीं है और षट् - दर्शन, चार वर्ण आदि से भी परे है। वो चार आश्रम से भी परे है यानी वो न जवान होता है, न बूढ़ा होता है, न वो बच्चा है । उसकी कोई उम्र नहीं है। वो त्रिदेव में से कोई भी नहीं है; वो सोहं भी नहीं है; वो शक्ति भी नहीं है। वो तो निराकार से भी परे है। वो शब्द (नि:शब्द शब्द) स्वरूपी अचल और अविनाशी है । वो माया और ब्रह्म से भी न्यारा है। वो ज्योति - र - स्वरूप निरंजन भी नहीं है और 'ओम' भी नहीं है। वो धरती, आकाश, हवा, पानी आदि तत्वों से भी कोई नहीं है और सूर्य, चाँद, तारों से भी परे है। वो सबमें है, पर दिखाई नहीं देता । सद्गुरु के शब्द ही उसका बोध दे सकते हैं। वो साहिब तो सबके घट में रहने वाला है । कोई पारखी ही उसे परख सकता है। इस शब्द में बहुत बड़ा रहस्य साहिब ने बोल दिया। जब सच्चे

गुरु की बात आती है तो कुछ लोग कहते हैं कि एक गुरु किया है तो अब उसे छोड़कर दूसरे के पास जाना तो अपने पति को छोड़कर दूसरे पति के पास जाना हुआ। यहाँ पर विचार करें कि क्या आप अपने पति (सच्चे परमात्मा, साहिब) की भक्ति कर रहे हैं या पराए की ! साहिब ने त्रिदेव, सिद्ध, मुनि, निराकार, ब्रह्म, साकार ईश्वर, ओम आदि सबसे परे बता दिया। इनमें से किसी को भी जीव का अपना सच्चा पति नहीं कहा। इसका मतलब है कि दुनिया सच्चे पति की भक्ति नहीं कर रही है और जो गुरु पराए पति की ओर ले जा रहा है, जो उसे उसके प्रियतम से नहीं मिला सकता है, उसी की शरण में रहना चाहती है, उसे छोड़कर सच्चे गुरु के पास नहीं आना चाहती है और कहती है कि अपने पति को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जाना है । अपना पति कौन है, यही मालूम नहीं है। यहीं पर भूल हो रही है। बाकी यह कहना कि अपने पति को छोड़कर पराए पति की तरफ नहीं जाना है, यह बात तो बड़ी अच्छी है। पर सत्य यह है कि अपने पति को नहीं पहचान पा रही है। दादू दयाल तो कह रहे हैं- -

पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग ॥

उस एक परम-पुरुष रूपी सच्चे पति को कोई नहीं जान पा रहा है I तभी तो साहिब ने कहा-

जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥

क्योंकि कोई पूरा सद्गुरु ही हमें उस देश में ले जा सकता है, हमें हमारे सच्चे प्रियतम से मिला सकता है। आत्मा परम-पुरुष की अंश है, वो ही हमारा सच्चा साहिब है। काल निरंजन ने साहिब की सब आत्माओं को बाँधकर रखा है। वो आत्माओं के साथ-साथ परम-पुरुष का भी अपराधी है । इसलिए तो परम-पुरुष ने उसे अपने लोक से निकाल दिया है। अब यह निरंजन परम-पुरुष की आत्माओं को अपने लोक से बाहर अमर - लोक नहीं जाने देता और बहुत कष्ट देता है। सब महात्मा लोग भी इसी निरंजन की भक्ति, इसी निरंजन का नाम जीवों को दे रहे हैं। मोहर साहिब की लगा रखी है, पर नाम ज्योति निरंजन, ओंकार, ररंकार, सोहं आदि या त्रिदेव के हज़ारों नामों में से कोई या अन्य 52 अक्षर की सीमा

में आने वाला नाम ही दे रहे हैं । कोई भी परम-पुरुष के सत्य-नाम से परिचित नहीं है। वो गुप्त वस्तु है; वो केवल संतों के पास है । क्योंकि जो वहाँ पहुँचा, उसे वही पा सकता है ।

जो पहुँचा जानेगा वोही, कहन सुनन से न्यारा है ॥

वो नाम कहने-सुनने में नहीं आता । पर आज के महात्मा तो 52 अक्षर वाले नाम ही दे रहे हैं । सब निरंजन का नाम दे रहे हैं । साहिब कह रहे हैं

मन ही निरंजन, मन ही ओंकार, मन ही है करतारा ॥

ओंकार भी मन का ही नाम है, निरंजन का ही नाम है। सब इसी का नाम दे रहे हैं। पर दुनिया है कि मानती ही नहीं । न उस नाम को छोड़ना चाहती है, न उस महात्मा को। कुछ तो कहते हैं कि एक गुरु करने के बाद दूसरा करेंगे तो पाप लगेगा। यह पट्टी भी तो ऐसे ही लोगों ने पढ़ाई हुई है ताकि हमारे चंगुल में जो एक बार फँस गया, वो सदा के लिए फँसा रहे । पर साहिब तो समझा रहे हैं—

जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥

कह रहे हैं कि जब तक सच्चा गुरु नहीं मिल जाता, 5-10 गुरु भी कर लो, कोई बात नहीं है, कोई पाप नहीं लगेगा। फिर कुछ बुद्धू तर्क देते हैं कि एक बाप को छोड़कर दूसरे के पास कैसे जाएँ ! यह बात तब है, जब सच्चा गुरु मिल जाए, परम-पुरुष की भक्ति देने वाला गुरु मिल जाए। तो हुआ आप सच्चे माता-पिता को छोड़कर अन्य कहीं न जाएँ ।

सार नाम छाड़ि के, करै आन की आस ।

ते नर नरकै जाहिंगे, सत्य भाषै रैदास ॥

कह रहे हैं कि जो अपने सच्चे साहिब को छोड़कर दूसरे की आशा रखता है, वो यमपुर में ही जायेगा। यहाँ सवाल खड़ा होता है कि जो अपने सच्चे परमात्मा को छोड़कर काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है और उसी की भक्ति करवाने वाले गुरु की शरण में है, उसी का चेला बना हुआ है, वो अपने सच्चे पिता (परम-पुरुष) को छोड़कर दूसरे के पास नहीं है क्या ! वो तो अपने पिता के अपराधी की शरण में है, उसकी सेवा कर रहा है ।

जैसे माता-पिता से शरीर बना, उन्होंने जन्म दिया तो वे आदरणीय हैं, उनकी सेवा करनी चाहिए । जो माता-पिता की सेवा नहीं करता, उनकी आज्ञा नहीं मानता, वो दोषी है । इसी तरह सच्चे गुरु की सेवा का महत्व है। वो भी कुछ देता है। वो आत्मा को कुछ देता है और उसे उसके सच्चे पिता, सच्चे प्रियतम (साहिब) के पास ले जाता है। इसलिए उसे माता-पिता और परमात्मा से भी बड़ा कहा। जो उसकी सेवा है, वो परम - पुरुष की ही सेवा हुई। इसलिए परम-पुरुष की सेवा करनी है तो सच्चे सद्गुरु की शरण में आकर उनकी सेवा करनी होगी । अब जो भी काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है, वो तो परम- पुरुष का अपराधी ही हुआ न, जो उनकी सेवा नहीं करता। पर जो काल-पुरुष की भक्ति देकर परम-पुरुष के सब जीवों को काल के चंगुल से छूटने नहीं दे रहा है, उन्हें अधिक-से-अधिक उलझा रहा है, वो तो परम-पुरुष का महाअपराधी है। ख़ैर, दुनिया को उस परम-पुरुष की ख़बर नहीं है, पर जो भेद को जानकर भी, परम-पुरुष (अपने सच्चे पिता) का भेद जानकर भी एक गुरु को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जाना है, झूठे गुरु को छोड़कर सच्चे गुरु के पास नहीं जाना है, काल- पुरुष की भक्ति देने वाले को छोड़कर परम-पुरुष की भक्ति देने वाले के पास नहीं जाना है वाली बात कर रहा है, वो कैसी बात कर रहा है ! वो परम पुरुष का अपराधी हुआ कि नहीं ! जैसे छोटे-पन से किसी को उसके माता-पिता से कोई चुराकर ले जाए। वो अपने माता-पिता को न जान पाए और चुराकर ले जाने वाले गुण्डे को ही अपना पिता मानने लगे तो कोई अपराध नहीं है । उसे पता नहीं है । पर गुण्डा उससे अपना स्वार्थ ही तो सिद्ध करेगा, उससे बंधुआ मजदूर की तरह काम लेकर साथ में डण्डे भी मारेगा। उसके दिल में भी आयेगा कि कैसा बाप है, जो इतना कष्ट दे रहा है ! ऐसे ही इस संसार में मिल रहे अपार कष्टों को देखकर कुछ के दिल में विचार उठता है कि इतना कष्ट देने वाला परमात्मा नहीं हो सकता है। पर उसे समझाने वाला कोई न मिले तो वो नहीं समझ पाता है। यदि ऊपर से कोई उस गुण्डे का ही चेला मिल जाए, जो उसे भ्रमित करता रहे कि यही तेरा बाप है तो वो पूरा भ्रमित हो जायेगा, उसे लगेगा कि शायद कष्ट देने वाला ही उसका पिता है। ऐसे ही संसार में काल - पुरुष की भक्ति

फैलाने वाले भी हैं, जो जीवों को भ्रमित करके काल - पुरुष की ही भक्ति में लगा रहे हैं। पर यदि कोई संत या संत का दास उसे सच्चाई बता दे कि उसके माता-पिता कौन हैं और उसे समझ आ जाए कि उसके असली माता-पिता कौन हैं, और फिर भी वो कहता फिरे कि मैं एक माता-पिता को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जा सकता तो कैसा है ? विचार तो करो कि आप कर क्या रहे हैं ! जो आप कर रहे हैं, वो कितना सही है, इस पर विचार करो ! कितनी उलटी बात कर रहे हैं ! जिस परम पुरुष की भक्ति करनी चाहिए, उसकी करते नहीं और जिसकी नहीं करनी चाहिए, उसी की भक्ति सब कर रहे हैं।

ऐसे जग जीव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥

यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने काल सों प्रीती ॥

साहिब कह रहे हैं, हे धर्मदास ! इस संसार के जीवों की उलटी रीति है; वे सत्य नाम को नहीं जानते हैं और उलटा काल-पुरुष से ही प्रीत करते हैं, उसी की भक्ति करते हैं, उसे ही अपना सच्चा साहिब जानते हैं। खैर, पहले तो कोई मानता ही नहीं है, विचार ही नहीं करता है, लड़ने को आ जाता है । साहिब भी कह रहे हैं-

प्रेमी खोजत मैं फिरूँ, प्रेमी मिला न कोय ।

जासो कहिये भेद को, सो फिर बैरी होय ॥

कह रहे हैं कि उस साहिब का प्रेमी खोजता फिरता हूँ, पर कोई भी अपने सच्चे साहिब का प्रेमी नहीं मिलता है । जिससे भी उस सच्चे साहिब का भेद कहता हूँ, वो तो दुश्मन ही हो जाता है। समझ आने के बाद की बात तो दूर की बात है, पर पहले कोई आसानी से समझता ही नहीं है, मानने को तैयार ही नहीं होता है। साहिब कह रहे हैं-

काल का जीव माने नहीं, मैं कोटिन कहूँ समझाय ।

मैं खींचत हूँ सतलोक को, यह बाँधा जमपुर जाय ॥

काल - पुरुष की भक्ति करने वाला जीव मानता ही नहीं है । साहिब कह रहे हैं कि मैं इसे परम-पुरुष का रहस्य देकर सत्लोक ले जाना चाहता हूँ, पर यह है कि मानता ही नहीं, यमपुर में ही बाँधा हुआ जा रहा है।

5. नाम से पहले और बाद में

नाम के पहले और बाद में

इस भवसागर से पार होने के लिए नाम चाहिए, यह तो आज इंसान समझ चुका है। नाम की महिमा को भक्त लोग समझ चुके हैं। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस में बड़ा सुंदर कहा- राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति उबारि । कह रहे हैं कि रामचंद्र जी ने तो एक तपस्वी की स्त्री (अहिल्या) का ही उद्धार किया, पर नाम की ताक़त से करोड़ों पापी तर गये । इसलिए आगे कह रहे हैं—

ब्रह्म राम तें नामु बड़, बर दायक बरदानि ।

रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जियँ जानि ।।

नाम को सगुण राम और निर्गुण ब्रह्म, दोनों से बड़ा कह रहे हैं। नाम की महिमा का वर्णन करते हुए एक स्थान पर तो तुलसीदास जी ने यहाँ तक कह डाला है—

कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । राम न सकहिं नाम गुन गाई ।।

उस निर्वाण-पद की प्राप्ति कराने वाला मूल नाम ही सबका राजा है। यह कहने-सुनने से परे है । यह अजर, अमर नाम है। यह आनन्द का देने वाला नाम सगुण और निर्गुण दोनों से परे है। साहिब कह रहे हैं-

मूल नाम निज सार है । सब सारन के सार ।

जो कोई पावे नाम को, सोई हंस हमार ॥

कह रहे हैं कि यह मूल नाम सबका सार है। जो इस नाम को पा लेता है, वो हमारा हंस हो जाता है । साहिब फिर कह रहे हैं- मूल नाम निज सार है, कही पुकार पुकार । जो पावे सो बाचई, नहीं तो काल

पसार ॥

कह रहे हैं कि मूल नाम ही सार है, मैं पुकार - पुकार कर यह बात बोल रहा हूँ। जो सद्गुरु द्वारा इस नाम को पायेगा, वही काल से बच सकता है, अन्यथा काल का ग्रास ही बनना पड़ेगा, क्योंकि सब जगह काल का ही जाल फैला हुआ है। काल बली तिहुँ लोक में, जीव शीव के नाथ। मूल नाम जो पावई, सो चले हमारे

साथ ॥

तीनों लोक में प्रबल काल का जाल फैला हुआ है। वो सब जीवों और ईश्वरों का मालिक है। पर जो मूल नाम को पा लेता है, वो इसके चंगुल से छूटकर हमारे साथ हमारे देश में चलता है।

धर्मदास मैं सत्यहि भाखा । तुमसे गोय कछु नहिं राखा ॥

चौदह अरब ज्ञान मैं भाखा । मूल नाम गुप्त करि राखा ॥

मूल नाम है सबके भेदा । पावे हंसा होय अखेदा ॥

गुप्त प्रगट हम तुमसे भाखा । पिण्ड ब्रह्माण्ड के ऊपर राखा॥

कहा कि मैंने तुमसे सत्य - सत्य बात कही, कुछ भी गुप्त नहीं रखा। चौदह अरब ज्ञानी की बातें तुमसे कहीं, पर मूल नाम को गुप्त ही रखा। मूल नाम में ही सबका भेद छिपा है। जो हंस उस नाम को पा लेता है, उसके सारे दुख समाप्त हो जाते हैं । मैंने तुमसे गुप्त नाम को प्रकट करके बताया और पिण्ड - ब्रह्माण्ड से ऊपर कर दिया ।

मूल नाम प्रगट नहिं करिये । यहि नाम को गुप्तहिं थरिये ॥

मूल नाम सो जीव उबारा। और नाम प्रगट संसारा॥

मूल नाम जाके घट आवें । सो हंसा सत्य लोक सिधावें ॥

मूल नाम की पावे डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥

युगन युगन लेई अवतारा। मूल नाम सो हंसा उबारा ॥

मूल नाम गुप्त तुम राखो । सत्त नाम प्रगट तुम भाखो ॥

कोटि कर्म हंस के होई । मूल नाम सो डारो धोई ॥

नीर पवन का भेद अपारा। मूल नाम इन्हुँ ते न्यारा॥

मूल नाम बिनु मुक्ति न होई । लाख ज्ञान कथे सो कोई ॥

अकह नाम जीव के सारा । पावे हंसा होय भवपारा ॥

साहिब कह रहे हैं कि इस गुप्त नाम को प्रगट नहीं करना है, गुप्त ही

रहने देना है। इसी गुप्त नाम से संसार के जीव पार होंगे। जिसके घट में यह नाम आयेगा, वो हंस सत्य-लोक में पहुँच जायेगा । मूल नाम पा लेने पर काल के सारे जाल कट जायेंगे। मैं युग-युग इस संसार में आता हूँ और मूल नाम की डोरी से हंसों को सत्य-लोक ले जाता हूँ । इस नाम से हंस के करोड़ों कर्मों का जाल भी कट जाता है । चाहे कोई कितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले, ज्ञान की बातें कर ले, पर मूल नाम के बिना मुक्ति हो ही नहीं सकती है। यह नाम कहने में नहीं आता है। जो इस नाम को पा लेता है, वो संसार - सागर से पार हो जाता है। यह नाम करता क्या है ? यह नाम आया कहाँ से ? इन बातों को जानने से पहले देखते हैं कि नाम से पहले आप क्या हैं । नाम से पहले वर्तमान में आप क्या है वर्तमान में आप मन की दुनिया में पूरी तरह से डूबे हुए हैं। आपका मन और आत्मा दूध-पानी की तरह एक हो गये हैं । इसलिए आत्मा का वजूद नज़र नहीं आ रहा है । मन आपकी आत्मा पर हावी हो गया है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि आपको पाप-पुण्य का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पा रहा है सही ग़लत का आपको पता नहीं चल पा रहा है। जैसा-जैसा मन कहे जा रहा है, वैसा-वैसा आप किये जा रहे हैं । चाहे अनचाहे आपको वो सब करना पड़ रहा है। यह मन कभी अच्छा भी मन जाता है और कभी बहुत बुरा भी। अच्छे-बुरे दोनों कर्मों का प्रेरक मन है । यही कारण है कि वर्तमान में आप मन की चालाकी को समझ नहीं पा रहे हैं । यही बन आपसे अनिष्टकारी काम भी करवा रहा है। छल, कपट, ठगी, बेइमानी आदि सब कुछ आपसे करवा रहा है। वर्तमान में आम आदमी की सुरति कुंद है। जब हीरा मिट्टी में होता है तो वो रोशनी नहीं दे पाता है, लेकिन जब उसे निकाल साफ़ किया जाता है तो वो हीरा रोशनी देने लगता है। हीरे की रोशनी कम नहीं होती, केवल मात्र आच्छादित हो जाती है । इसी तरह हमारी सुरति अपने-आप में परिपूर्ण है। वो घटती-बढ़ती नहीं। उसकी रोशनी, उसका गुण, उसकी ताक़त कम नहीं हो

सकती। इसलिए उसे किसी शक्ति की ज़रूरत नहीं है, पर उसमें मन - माया की गंध लग गयी है, जिसके कारण से उसका प्रकाश लुप्त हो गया है, उसका गुण छिप गया है। कभी-कभी कुछ लोग कहते हैं कि भक्ति करेंगे तो उससे आत्मा को शक्ति मिलेगी । नहीं ! नहीं! ऐसी बात नहीं है । यदि आत्मा को किसी चीज़ से ताक़त की ज़रूरत है तो फिर वो चीज़ आत्मा से बड़ी हो जायेगी। पर नहीं, आत्मा से बड़ी कोई चीज़ नहीं है । यह तो ईश्वर की अंश है । इसे किसी बाहरी पदार्थ की ज़रूरत नहीं है । फिर यदि ऐसा है तो भक्ति क्यों करनी है ? ध्यान क्यों करना है ? आओ, इस ओर चलते हैं । भक्ति से, ध्यान से आत्मा को शक्ति नहीं मिलेगी, पर आत्मा के ऊपर जो मन-माया का कीचड़ लगा हुआ है, वो धुलता जायेगा और आत्मा अपने को अनुभव करने लग जायेगी। जब आत्मा अपने को जान जायेगी तो फिर यह मन की किसी बात को नहीं मानेगी। अभी तो आपकी आत्मा मन के कहने पर चल रही है। जो-जो मन कह रहा है, वो वो करती जा रही है। सारे गंदे काम जो मनुष्य कर रहा है, क्या वो आत्मा करना चाह रही है ? नहीं! मन ही तो सारे गंदे कामों की प्रेरणा दे रहा है। आत्मा अपने को अनुभव नहीं कर पा रही है। मन 24 घंटे आत्मा पर सवार रहता है; सोचने भी नहीं दे रहा है कि क्या बात है । मन की ताक़त से आत्मा भूलवश अपने को शरीर मान बैठी है और मन की इच्छाओं की पूर्ति में जुट गयी है। इस शरीर में बहुत झंझट हैं । काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार रूपी बड़े-बड़े भयंकर राक्षस बैठे हुए हैं, जो बरबस आत्मा को नरक की ओर घसीट रहे हैं । आत्मा असहाय हो गयी है।

जीव पड़ा बहु लूट में नहीं कछु लेन न देन ।।

बड़ी लूट में है। सबसे पहले वर्तमान में हमारे धर्म में भक्ति का जो स्वरूप है, क्या इसमें कोई ग़लती आ गयी है ? अगर सुधार क्यों न करें ! वर्तमान में हमारी भक्ति में दोष तो नहीं आ गया है ! यह गंभीर विषय है। थोड़ा समय पहले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के विषय पर लोगों से राय माँगी गयी। रेडियो, टी. बी. आदि पर आम आदमी की राय माँगी जाती है ।

तो यदि समाज में पाप का बर्चस्व हो गया है तो चिंतन करना होगा । देखना होगा कि भक्ति का स्वरूप कैसा है । इस समय जो भक्ति का स्वरूप देख रहे हैं, क्या ठीक है ! यदि कोई त्रुटि है तो वो कहाँ है ? समाज में पाप बहुत फैल गया है। भ्रष्टाचार, क्रूरता आदि फैल गयी है। यह अधिक है। मुझसे एक पत्रकार ने सवाल किया। वो बहुत प्रासंगिक था। सवाल था कि चारों ओर भक्ति के माहौल को देखकर क्या लगता है कि आज इंसान भक्ति की तरफ झुक रहा है ? मैंने कहा- नहीं । मेरा ऐसा दृष्टिकोण है कि जितना आज इंसान भक्ति से दूर है, इतना कभी भी नहीं था । यदि इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि आज इंसान भक्ति से बहुत दूर हो गया है। यदि आज भक्ति का माहौल होता तो मानव में आज हिंसा, अनीति, भ्रष्टाचार आदि कैसे होता! यानी वर्तमान में भक्ति के स्वरूप में दोष है । आज उसे मजबूरन भक्ति की तरफ खींचा गया है। जैसे व्यापारी ग्राहक को आहुत करता है, जैसे राजनीतिक पार्टी करती है, ऐसे ही हरेक मत-मतांतर इंसान को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रहा है । यह एक मत की बात नहीं है । हम देख रहे हैं कि धर्म में प्रतिस्पर्द्धा आ गयी है । कोई भी फ्री नहीं है । हरेक पर किसी-न- किसी मत की मोहर लगी हुई है। वर्तमान में धर्म प्रचारक क्या चाह रहे हैं ? क्या वे इंसान की मुक्ति चाह रहे हैं ? यदि इंसान भक्ति की तरफ है तो समाज में अपराध नहीं होना चाहिए था ।

भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी । बिनु सत्संग न पावत प्राणी ॥

भक्ति तो सकल गुणों को उत्पन्न करने वाली है । प्रेम, दया, क्षमा, विवेक आदि भक्ति के लक्षण हैं । जब भी इंसान भक्ति करेगा तो उसमें ये सद्गुण आयेंगे। पर वर्तमान में कहीं प्रेम दिखाई नहीं दे रहा है, कहीं अपनापन दिखाई नहीं दे रहा है । भक्ति के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं । भक्ति को क्या हो गया है ! समाज में रोग बहुत हो गये । इस पर आम लोगों की राय ली गयी । शोध किया गया तो कारण साफ़ था । उसमें यह नज़र आया कि वायुमण्डल प्रदूषित हो रहा है। रोगों का कारण मिला कि भोजन दूषित खा रहे हैं, जिसमें ज़हरीले केमिकल्स हैं, यूरिया बगैरह है । फिर हरेक चीज़ में मिलावट है । फिर प्रदूषण के कारण शुद्ध जलवायु नहीं मिल पा रही है।