भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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परम-पुरूष ने थोड़ी संशय में पुकारा । इस शब्द से 'निरंजन' (मन) हुआ । परम-पुरूष तब यह जानने के लिए कि क्या उनके द्वारा उत्पन्न पाँचवां शब्द पुत्र उनके जैसा ही है या नहीं, उस समय परम-पुरूष निरंजन में समाए। परम- पुरूष को एक क्षण के लिए शंका आई कि यह तो मेरा शरीर नहीं है और अपने को वहाँ से खींचकर अपने शरीर में लाए। फिर परम-पुरूष ने छठा शब्द पुकारा तो उससे 'सहज' की उत्पति हुई। सातवें शब्द से 'संतोष', आठवें से ‘चेतना', नौवें से ‘आनन्द', दसवें से 'क्षमा', ग्यारहवें से 'निष्काम', बारहवें से 'जलरंगी', तेहरवें से 'अचिन्त' चौदहवें से 'प्रेम', पन्द्रहवें से ' दीन- दयाल', तथा सोलहवें शब्द से 'धैर्य', उत्पन्न हुआ । उस अमर - लोक की शोभा को बढ़ाने के लिए ही परम-पुरुष ने इन शब्द पुत्रों को उत्पन्न किया । ये सभी उसी अमर-लोक में विचरण करने लगे । ये सब परम-पुरूष के शब्द पुत्र थे, जिन्हें परम - पुरूष ने इच्छा से पैदा किया, लेकिन आत्मा इच्छा से नहीं बनी। आत्मा तो परम - पुरुष का ही अंश है । इस तथ्य को कबीर साहिब ने बड़े सुन्दर ढंग से कहा है-

जीवरा अंश पुरुष का आही ।

आदि अन्त कोउ जानत नाहीं ॥

जीवों को उस अमर-लोक में विचरण करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके पश्चात् पाँचवां पुत्र 'निरंजन' ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एकाग्रचित होकर परम-पुरूष का ध्यान किया। परम-पुरुष सेवा से प्रसन्न हुए और पूछा कि इतना घोर तप क्यों कर रहे हो ? निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं थोड़ा सा स्थान दे दो । परम - पुरुष ने तब निरंजन को मानसरोवर स्थान दिया (मानसरोवर अमर - लोक का ही एक द्वीप है ) । मानसरोवर पहुँच कर निरंजन बड़ा खुश हुआ और आन्नद वहाँ रहने लगा। लेकिन कुछ ही समय बाद पुनः परम-पुरूष का ध्यान करने लगा । निरंजन ने पुन: 70 युग तक परम- पुरुष का ध्यान किया। परम-पुरूष ने सेवा से प्रसन्न होकर पूछा कि अब क्या चाहते हो ? निरंजन-

इतना ठांव न मोहि सुहाई ।

अब मोहि बकसि देहहु ठकुराई ॥