भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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गुरु ज़रूरी है

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरु वे नमः ।।

माता-पिता के योग का नाम संतान है । आश्चर्यमय है, पर सत्य है, गुरु के योग से जो सत्ता उत्पन्न होती है, वो ईश्वर है । बिना गुरु के ईश्वर उत्पन्न ही नहीं हो सकता है ।

गुरु की शरणा लीजे भाई । जासे जीव नरक नहिं जाई ।।

गुरुमुख होई परमपद पावै । चौरासी में बहुरि न आवै ।।

गुरु की बड़ी महिमा है। 'ऋग्वेद' कहता है कि गुरु का एक पल ध्यान भी काशी में हज़ारों वर्ष रहने से श्रेष्ठ है। त्रेतायुग में ऋषि बाल्मीकि जी की 'रामायण' में भी गुरु को ही पूर्ण रूप से स्थापित किया गया है । द्वापर में भी जितने ऋषि-मुनि आए, वे भी गुरु भक्ति की बात कह रहे हैं। 'गीता' में भी वासुदेव श्री कृष्ण ने अर्जुन को अन्य - अन्य भक्तियों को छोड़कर अपने में समाने को कहा, क्योंकि वे अर्जुन के गुरु थे। कलयुग के मान्य ग्रंथ 'रामचरित मानस' में भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने गुरु को बड़ा ऊँचा स्थान दिया है।

बंदऊँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि ।

महामोह तप पुंज जासु वचन रवि कर निकर ।।

अर्थात् मैं उस गुरु-महाराज के चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नररूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूप घने अँधकार के नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं । फिर संतों ने तो इस क्षेत्र में कमाल ही कर दिया है। साहिब ने किसी को खुश करने या पक्षपात की बात नहीं की। गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोविंद दियो बताय ।।