करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंतों से पहले गुरु को ईश्वर के बराबर कहा गया था। हमारे सभी धर्म-शास्त्रों तथा ऋषि-मुनियों ने गुरु को ईश्वर के समान लाकर खड़ा किया था; लेकिन संतों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में अद्भुत क्रांति लाई । उन्होंने गुरु को ईश्वर से ऊँचा दर्जा दिया। गुरु चरणदास जी की शिष्या सहजोबाई बड़े सुन्दर तर्क द्वारा गुरु को ईश्वर से ऊँचा स्थान देती हुई कहती है-
हरि जूँ गुरु को न बिसाऊँ । गुरु के सम हरि को न निहारूँ ।।
हरि ने जन्म दियो जग माहीं । गुरु ने आवागमन छुड़ाई ।।
हरि ने पाँच चोर दियो साथा। गुरु ने लई छुड़ाय अनाथा ।।
हरि ने कुटुंब जाल में घेरी । गुरु ने काटी ममता बैरी ।।
हरि ने रोग भोग उरझायो । गुरु योगी कर सबै छुड़ायो ।।
हरि ने कर्म भर्म भरमायो । गुरु ने आतम रूप लखायो ।।
हरि ने मोंसे आप छिपायो । गुरु दीपक दे ताहि दिखायो ।।
चरनदास पर तन मन वारूँ। गुरु न तजूँ हरि को तज डारूँ ।।
गुरु की महत्ता बताते हुए वासुदेव श्री कृष्ण भी गीता में अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! जो गुरु का भक्त होता है और जो प्राणी गुरु के सम्मुख होकर भजन करता है, उसका भजन करना सफल है । जो गुरु से विमुख है, उसको बड़ा पाप लगता है । जिस तरह मदिरा का पात्र हो, उसमें जो गंगाजल है, सो अपवित्र है । इसी तरह गुरु से विमुख का भजन सदा अपवित्र होता है। उसके हाथ का देवता भी नहीं लेते। उसके सब कर्म निष्फल हैं। कूकर, सूकर, काग आदि योनियाँ बड़ी खोटी हैं। इन सबसे वो मनुष्य खोटा है, जो गुरु नहीं करता। गुरु बिना गति नहीं होती । वह अवश्य नरक में जायेगा । हमारी धार्मिक पुस्तकें तथा ग्रंथ 'गुरु' शब्द की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि मनुष्य के मन के अज्ञान रूपी अँधकार को दूर करने वाले और ज्ञान का प्रकाश देने वाले गुरुदेव होते हैं। गुरु के बिना दुनिया के भोग- विलासों में ग्रस्त भूले हुए प्राणियों को कौन सच्चा मार्ग दिखा सकता है ! ज्ञान की आँखें गुरु देता है। गुरु की महिमा का अंत ही नहीं है । यही कारण है कि कबीर साहिब गुरु की अपार महिमा का वर्णन करते हुए अंत में यह भी कह दिया है— गुरु की महिमा अनन्त है, मौसे कही न जाय।
तन मन गुरु को सौंपि के, चरणों रहुँ समाय ।।