काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)
Kasika Vritti of Vamana and Jayaditya on Panini Sutras
आचार्य वामन एवं जयादित्य (सम्पादक: पण्डित बालशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished828 पृष्ठ
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४५४ ॥ काशिका ॥ ५ ॥ ३ ॥ शिलाया ढः ॥ १०२ ॥ शिलाशब्दादिवार्थे ढः प्रत्ययो भवति। शिलेव, शिलेयं दधि। केचि- दत्र ठजमपीच्छन्ति, तदर्थं योगविभागः कर्तव्यः। शिलाया ठञ्प्रत्ययो भवति। शैलेयम्। ततो ढः। शिलेयम् ॥ शाखादिभ्यो यत् ॥ १०३ ॥ शाखा इत्येवमादिभ्यः प्रातिपदिकेभ्यो यत्प्रत्ययो भवति इवार्थे। शाखेव, शाख्यः। मुख्यः। जघन्यः। शाखा। मुख। जघन। शृङ्ग। मेघ। चरण। स्कन्ध। शिरस्। उरस्। अङ्ग। शरण। शाखादिः ॥ द्रव्यं च भव्ये ॥ १०४ ॥ द्रव्यशब्दो निपात्यते भव्ये ऽभिधेये। द्रुशब्दादिवार्थे यत्प्रत्ययो निपा- त्यते। द्रव्यम्। भव्य आत्मवान्। अभिप्रेतानामर्थानां पात्रभूत उच्यते। द्रव्योयं राजपुत्रः। द्रव्योयं माणवकः ॥