काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)
Kasika Vritti of Vamana and Jayaditya on Panini Sutras
आचार्य वामन एवं जयादित्य (सम्पादक: पण्डित बालशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished828 पृष्ठ
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॥ काशिका ॥ ५ ॥ ४ ॥ ४६५ मृदस्तिकन् ॥ ३९ ॥ मृच्छब्दात्स्वार्थे तिकन् प्रत्ययो भवति। विकल्पः सर्वत्रानुवर्त्तते। मृदेव, मृत्तिका ॥ सत्नौ प्रशंसायाम् ॥ ४० ॥ प्रशंसापाधिकेऽर्थे वर्त्तमानाद् मृच्छब्दात्स ख इत्येतौ प्रत्ययौ भवतः। रूपपोपवादः। प्रशस्ता मृत्, मृत्सा। मृत्स्ना। नित्यश्चायं प्रत्ययः। उत्तर- सूत्रे ऽन्यतरस्यांग्रहणात् ॥ वृकज्येष्ठाभ्यां तिल्तातिलौ चच्छन्दसि ॥ ४१ ॥ प्रशंसायामित्येव। वृकज्येष्ठाभ्यां प्रशंसोपाधिकेऽर्थे वर्त्तमानाभ्यां यथा- संख्यं तिल्तातिलौ प्रत्ययौ भवतश्छन्दसि विषये। रूपपोपवादौ। वृकतिः। ज्येष्ठातातिः ॥ बह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम् ॥ ४२ ॥ बह्वर्थादल्पार्थाच्च कारकाभिधायिनः