भारतकोश
काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

Kasika Vritti of Vamana and Jayaditya on Panini Sutras

आचार्य वामन एवं जयादित्य (सम्पादक: पण्डित बालशास्त्री) द्वारा

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हलश्चेति घञन्ता एते करणे ऽन्तोदात्ता भवन्ति । भावे चाऽद्युदात्ता एव ॥ स्तुयुद्रुवश्छन्दसि ॥ उपसमस्तार्थमेतत् । परिस्तुत् । संयुत् । परिद्रुत् ॥ वसेनिः स्तोत्रे ॥ स्तोत्रं साम । तत्स्थो वसेनिशब्दोऽन्तोदात्तो भवति, अन्यत्र मध्योदात्तः ॥ श्वे दरः ॥ श्वे ऽभिधेये दरशब्दोन्तोदात्तो ऽन्यत्राबन्तत्वादाद्युदात्तः ॥ शाम्प्रतापौ भावगर्हायाम् ॥ अन्तोदात्ता, वन्यत्राद्युदात्तौ ॥ उत्तमशश्वत्तमशब्दौ सर्वत्र ॥ के चित्तु भावगर्हायामित्यत्राप्यनुवर्त्तयन्ति ॥ भंत्तमन्धोग देहा ॥ इते घञन्ता भविव्यन्तोपि घञन्त एव । एरच्प्रत्यन्तानमिति वचनात् ॥ अनुदात्तस्य च यत्रोदात्तलोपः ॥ १६१ ॥ उदात्त इति वर्तते । यस्मिन्ननुदात्ते परत उदात्तो लुप्यते तस्यानुदात्त- स्यादिरुदात्