काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)
Kasika Vritti of Vamana and Jayaditya on Panini Sutras
आचार्य वामन एवं जयादित्य (सम्पादक: पण्डित बालशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished828 पृष्ठ
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७७६ ॥ काशिका ॥ ८ ॥ २ ॥ वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः ॥ ७२ ॥ ससजुषोरित्यतः स इति वर्त्तते। तेन संभवाद्व्यभिचाराच्च वसुरेव विशे- ष्यते। न स्रंसुध्वंसू व्यभिचाराभावात्, संभवाच्चानडुह्शब्दः। वस्वन्तस्य पदस्य सकारान्तस्य स्रंसु ध्वंसु अनडुह् इत्येतेषां च दकारादेशो भवति। वसु। विदु- द्भ्याम्। विदुद्भिः। पपिवद्भ्याम्। पपिवद्भिः। स्रंसु। उखास्रद्भ्याम्। उखास्रद्भिः। ध्वंसु। पर्णध्वद्भ्याम्। पर्णध्वद्भिः। अनडुह्। अनडुद्भ्याम्। अनडुद्भिः। स इत्येव। विद्वान्। पपिवान्। नकारस्य न भवति। रुत्वे नाप्राप्ते इदमरभ्यत इति तद्वाध्यते। संयोगान्तलोपस्तु नैवमिति तेनैतदेव दत्वं बाध्यते। अनडुहोऽपि