काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८१
है। यह अदृश्य सेतुभूत परम्परा भी अन्ततोगत्वा कम से कम हजार दो हजार वर्ष से कम नहीं हो सकती। ‘विविधानि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके’ के द्वारा भगवान् आत्रेय भी अपने समय में प्रचलित अन्य आचार्यों के शास्त्रों का उल्लेख करता है। इसप्रकार आत्रेय आदि से पूर्व भी अन्य आचार्यों का होना स्पष्ट है। यहां यह भी विचारणीय विषय है कि वैदिक आयुर्वेद विज्ञान में शल्यप्रक्रिया तथा अन्य शारीरिक आदि विभागों के संबन्ध में भी अत्यन्त सूक्ष्म विचार आये हुए हैं। ओषधिविभाग (Medical side) को देखने पर उसमें हमें धातु, रत्न, रस आदि का उल्लेख नहीं मिलता है। केवल वनस्पति आदि साधारण ओषधियां (Herbal drugs) ही प्रयुक्त की जाती हुई दिखाई देती हैं। तथा वे जङ्गिड, कुष्ठ, रोहिणी अपामार्ग आदि वनस्पतियां भी उस-उस रोग में केवल पृथक्-पृथक् ही व्यवहृत हुई मिलती हैं। कौशिक-सूत्रकार ने भी लगभग उसी प्रकार से मधु, तैल, घृत, पिप्पली, काष्ठ आदि वस्तुओं का अमुक-अमुक २ रोग में पृथक्-पृथक् व्यवहार किया है। आलविसोलफाण्ट-भृङ्गराज आदि पुष्पों के रस का लेप, नवनीत (मक्खन) मिले हुए कुष्ठ का प्रलेप (Paste) तथा पकाये हुए दूध और लाक्षा का पीना-इत्यादि दो तीन वस्तुओं के मिले हुए योग कहीं-कहीं ही दिये हैं। अमुक-अमुक रोग तथा अमुक-अमुक दोषहर वस्तुओं के ठीक-ठीक ज्ञान हो जाने पर उनके परिहार के उपाय यथासमय स्वयं विचारे जा सकते हैं। इसी को दृष्टि में रखते हुए मूल परिभाषा रूप में ज्ञातव्य शास्त्रों के विषयों को लेकर वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक तथा जीवनीय, बृंहणीय, तर्पणीय, संशमनीय एवं वृष्य आदि वर्गानुसार ओषधियों को विभक्त करके तथा रोगों के प्रतीकार के मूलभूत उपाय पञ्चकर्म आदि प्रधान विषयों को संगृहीत करके भिन्न-भिन्न संहिताओं के रचयिताओं ने सबसे पूर्व सूत्रस्थान को बनाया। उतने को ही ठीक-ठीक जानकर उनसे कल्पित योगों के द्वारा रोग दूर किये जा सकते हैं इस लिये सूत्रस्थान मात्र भी ओषधियों के लिये पर्याप्त है, यह कहा जा सकता है। आजकल भी गांवों तथा पहाड़ों में भिन्न-भिन्न रोगों में केवल एक दो वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता हुआ उसी प्राचीन मौलिक प्रक्रिया को सूचित करता है। इसके बाद धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों वस्तुओं के गुणों तथा दोषों का अनुभव बढ़ता गया तथा रोग भी क्लिष्ट (कई दोषों से युक्त) होते गये त्यों-त्यों २ एक ही योग द्वारा सब दोषों को दूर करने की इच्छा से समान एवं विशेष गुण वाली ओषधियों को मिलाकर सामूहिक योग बनाकर प्रयोग करने की विधि प्रचलित हुई। ज्यों-ज्यों प्राणिसमूह की वृद्धि, देश-काल-जल-वायु-अन्न-पान-स्थान-अवस्था आदि में परिवर्तन, व्यक्तियों में परस्पर सम्पर्क एवं संघर्ष का उदय, तथा नाना रोग स्वरूप बाह्य एवं आभ्यन्तर शारीरिक विकार उत्पन्न होते गये, त्यों-त्यों क्रम से उस-उस रोग तथा उसकी निवृत्ति के उपायों के ज्ञात होने पर तथा परिस्थिति के अनुसार वही रोग अनेक रूपों में दिखाई देता हुआ नये रूप तथा नये नाम द्वारा प्रकट होने लगा। तथा उसी के अनुसार उन-उन दोषों को दूर करने के लिये वस्तुओं को मिलाकर सामूहिक रूप में योग बनने लगे होंगे। फिर ऋषियों ने इन पूर्वकल्पित तथा अपने विशुद्ध अन्तःकरणों में प्रस्फुरित योगौषधियों को मिलाकर सूत्र-स्थान में आये हुए विषयों को अपने विचारों द्वारा बढ़ाकर सूत्रस्थान के अनुसार ही अन्य स्थानों को जोड़कर इसे पूरी संहिता का रूप दिया होगा। इसके बाद उत्तरोत्तर अन्य विद्वानों ने पूर्वापर अनुभवों से सिद्ध रोगों तथा उनके प्रतिकारों के उपायों को लेकर देश-काल तथा परिस्थिति के अनुसार अन्य अनेक आयुर्वेद के ग्रन्थ बनाये। इस प्रकार नाना द्रव्यों के योग (समूह) से बनी हुई ओषधियों के प्रयोग की पद्धति भी अर्वाचीन नहीं है। हार्नले द्वारा निर्दिष्ट, श्टाइन द्वारा पूर्व टर्की स्थित तूह्नाडु (Tun Huang-चीन की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित) नामक स्थान में प्राप्त प्राचीन पुस्तक के प्राचीन ईरानी भाषा के अनुवाद के साथ जो मूल संस्कृत का लेख है उसमें भगवान् बुद्ध द्वारा जीवक को संबोधित करके उपदिष्ट ओषधियों का वर्णन मिलता है। महावग्ग में निर्दिष्ट जीवक के साहचर्य से बुद्ध के इस उपदेश में नाना ओषधियों के योग से बनी हुई ओषधियों का उल्लेख होने से नाना द्रव्यों के योग से बनी ओषधियों का प्रचार भी बुद्ध के समय से पहले से विद्यमान था ऐसा अन्य ग्रन्थों से भी प्रतीत होता है। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति में भी दूर करने
१. आर. जी. भण्डारकर कमोरेशन भाग १ पृ. ४१६