काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
योग्य दोष के अनुसार अमुक गुण एवं दोष वाली वस्तुओं को उपयोग के समय मिलाकर व्यवहार करने की प्रक्रिया के प्राचीन समय में होने पर भी आजकल अनेक मिले हुए दोषों वाले रोगों को दूर करने के लिये मिली हुई ओषधियों द्वारा पेटेन्ट ओषधियां भी बनती हैं तथा उन्हें नुस्खे या फार्मूले के रूप में प्रकाशित भी किया जाता है। पूर्वापर स्थानभेद से संक्षेप एवं विस्ताररूप से अपने ज्ञातव्य विषय का ठीक-ठीक ज्ञान कराने वाली संहिताओं तथा वर्तमान निबन्धों द्वारा विशद किया हुआ भी यह चिकित्सा विज्ञान केवल दिग्दर्शन मात्र के लिये ही है। सब लोगों की शारीरिक तथा प्राकृतिक परिस्थिति सदा एक जैसी नहीं रहती। एक ही रोग प्रत्येक व्यक्ति तथा उसकी प्रकृति के भेद से विभक्त होकर अनेक रूपों वाला हो जाता है। ज्यों-ज्यों देश, काल, जल-वायु, आहार-विहार आदि की परिस्थिति के भेद से तथा दोषों के संयोग से नाना रूपों में रोग बढ़ते हैं तथा नये-नये रूप धारण करते हैं त्यों-त्यों देश-काल आदि के अनुसार ओषधियों के आवापोद्वाप, मान में गुरु एवं लघु का अन्तर तथा रचना के पौर्वापर्यक्रम को करके नये-नये रोगों के प्रतिकार के उपाय तथा अनुभवसिद्ध ओषधियों को लेकर प्राचीन आयुर्वेद विज्ञान के कोश को सुरक्षित रखने तथा बढ़ाने की आवश्यकता है।
(२) ग्रन्थ परिचय सहित आचार्यों का विवरण
आयुर्वेद का प्रकाश तथा आचार्य—उत्पन्न हुए प्राणियों की स्वास्थ्यरक्षा की दृष्टि से सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयंभू ब्रह्मा ने ही संहितारूप से आयुर्वेद को प्रकाशित^१ किया। वह आयुर्वेद अश्विनीकुमार तथा इन्द्र आदि द्वारा ऋषियों को प्राप्त होकर उनके द्वारा लोक में प्रचलित हुआ, आयुर्वेद के आचार्य इसका ऐसा इतिहास बतलाते हैं। अस्तु, चाहे यह आयुर्वेद ब्रह्मा से प्रारम्भ हुआ हो, चाहे देवताओं द्वारा उपदिष्ट हो और चाहे यह ऋषिवर्ग द्वारा प्रकाशित हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसका प्रादुर्भाव प्रत्येक अवस्था में प्राचीन ही है। आयुर्वेद के मूलग्रन्थों से निम्न सम्प्रदाय क्रम मिलता है—
ब्रह्मा
दक्ष
अश्विनीकुमार
इन्द्र
| (सुश्रुत संहिता के अनुसार) | (काश्यप संहिता के अनुसार) | (चरक संहिता के अनुसार) |
|---|---|---|
| धन्वन्तरि | कश्यप वसिष्ठ अत्रि भृगु | भरद्वाज |
| दिवोदास | इनके पुत्र तथा शिष्य | आत्रेय पुनर्वसु |
| सुश्रुत औपधेनव वैतरण | अग्निवेश भेड जतूकर्ण पराशर | |
| औरभ्र पौष्कलावत करवीर्य | हारीत क्षारपाणि आदि | |
| गोपुर रक्षित भोज आदि |
इस काश्यपसंहिता की उपदेश-परम्परा के वर्णन में 'स्वयम्भूर्ब्रह्माऽऽयुर्वेदमग्रेऽसृजत्, ततश्च तं पुण्यमायुर्वेदमश्विभ्यां कः प्रददौ, ताविन्द्राय, इन्द्र ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवसिष्ठात्रिभृगुभ्यः, ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुर्हितार्थम् (पृ. ६१), इस लेख के द्वारा इन्द्र से साक्षात् हीं कश्यप आदि प्राचीन ऋषियों ने यह विद्या प्राप्त की ऐसा प्रतीत होता है। चरक के
१. (क) स्वयम्भूर्ब्रह्मा प्रजाः सिसृक्षुः प्रजानां परिपालनार्थमायुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत्। (काश्यपसंहितायां पृ. ६१)
(ख) इह खल्वायुर्वेदमष्टाङ्गमपाङ्गमथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयम्भूः। (सुश्रुते सू. अ. १)
(ग) ब्रह्मणा हि यथाप्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः। (चरके सू. अ. १)