काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८३
प्रारम्भ में रोगों से दुःखी हुए प्राणियों की रोगमुक्ति के उपाय को ढूंढने की इच्छा से समवेत हुए महर्षियों की प्रेरणा से इन्द्र के पास जाकर उससे आयुर्वेद विद्या को प्राप्त कर लौटे हुए भरद्वाज द्वारा महर्षियों को इसका उपदेश देने के निर्देश से प्रतीत होता है कि इन्द्र द्वारा उपदिष्ट भरद्वाज से ही ऋषियों को यह विद्या प्राप्त हुई। भरद्वाज आयुर्वेद विद्या का कोई प्राचीन आचार्य था ऐसा 'ज्वरसमुच्चय' में आये हुए वचनों से भी ज्ञात होता है। महाभारत में भी वैद्याचार्य भरद्वाज का निर्देश है। चरकसंहिता के उपक्रम तथा उत्तर भाग में भरद्वाज का दो प्रकार से उल्लेख किया गया है। वातकलाकलीय (च.सू.अ. १२) तथा आत्रेयभद्रकाप्यीय (च.सू.अ. २६) अध्यायों में कुमारशिरा भरद्वाज का मत दिया हुआ है। इस विशेषण से युक्त दिया होने के कारण यह भरद्वाज कोई अन्य ही प्रतीत होता है। इसके मत का आत्रेय ने खण्डन भी किया है। यज्जः पुरुषीय (च. सू. अ. २५) तथा खुड्डीका-गर्भावक्रान्ति (च. शा. अ. ३) अध्याय में विशेषण रहित भरद्वाज का मत दिया है। वहां भी भरद्वाज के मत का आत्रेय ने खण्डन ही किया है। तथा उसके बाद अपने मत का खण्डन होने पर जिज्ञासा द्वारा पूछने पर आत्रेय ने उसका विशेष विवरण दिया है। इस प्रकार का निर्देश होने से भरद्वाज इसका गुरु प्रतीत नहीं होता है। वातकलाकलीय अध्याय में भरद्वाज का कुमारशिरा यह विशेषण आत्रेय के गुरु भरद्वाज के निराकरण के लिये कहा है तथा 'खुड्डीकागर्भावक्रान्ति' अध्याय में भरद्वाज शब्द से यहां आत्रेय के गुरु का बोध नहीं है अपितु अन्य ही कोई भरद्वाज गोत्र वाला प्रतीत होता है, इस प्रकार लिख कर टीकाकार चक्रपाणि ने स्पष्ट रूप से बतलाया है कि उपर्युक्त दोनों स्थलों पर आया हुआ भरद्वाज आत्रेय का गुरु नहीं है चक्रपाणि की उक्ति के अनुसार संभवतः गोत्रवाचक कई भरद्वाजों के संभव होने पर अत्रि परम्परागत किसी आत्रेय ने किसी भरद्वाज से इस विद्या को ग्रहण किया हो परन्तु आत्रेय संहिता में कहीं भी भरद्वाज से उपदेश ग्रहण, उसका सम्मान तथा उसके मत की प्रतिष्ठा को दिखाने वाले संकेतों के न मिलने से मन में सन्देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार आत्रेय का गुरु भरद्वाज कौन है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में केवल कृष्ण भरद्वाज का उल्लेख है। यह भी विशेषणयुक्त कोई विभिन्न ही भरद्वाज प्रतीत होता है। काश्यपसंहिता के आयुर्वेदाध्ययन प्रकरण में प्रजापति, अश्वि, इन्द्र तथा सब विद्याओं के आचार्य परम पुरुष धन्वन्तरि के साथ अपने ग्रन्थ के मूल आचार्य कश्यप का भी स्वाहाकार देवताओं में जिस प्रकार निर्देश किया गया है, उसी प्रकार आत्रेयसंहिता (चरक. वि. अ. ८) में भी प्रजापति, अश्वि, इन्द्र तथा धन्वन्तरि के ही केवल स्वाहाकार का उल्लेख है। वहां 'सूत्रकारिणामृषीणाम्' इस सामान्य उल्लेख द्वारा यद्यपि भरद्वाज का ग्रहण भी हो सकता है परन्तु अपने ही ग्रन्थ में इन्द्र के बाद परम्परागत आचार्य एवं अपने ही गुरु रूप से निर्दिष्ट भरद्वाज के नाम तक का निर्देश न करना उचित प्रतीत नहीं होता है। जिस प्रकार काश्यप संहिता में कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि तथा भृगु का इन्द्र से साक्षात् औपदेशिक सम्बन्ध दिखाया है, उसी प्रकार आत्रेयसंहिता के रसायनपाद में (च. चि. अ. १) भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अङ्गिरा, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित तथा गौतम आदि का इन्द्र द्वारा साक्षात् रसायन का उपदेश प्रदर्शित किया हैं। इसमें भी कहीं भरद्वाज का उल्लेख नहीं है। चरक के उपक्रम ग्रन्थ में मिलने वाले महर्षियों के समवाय में बहुत समय के पौर्वापर्य वाले आचार्यों का भी निर्देश होने से तथा उत्तरतन्त्र के समान लेख की प्रौढ़ता भी न दीखने से कुछ सन्देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार चरक के उपक्रम में भरद्वाज द्वारा ही महर्षियों की जो विद्याप्राप्ति का निर्देश किया गया है उसका क्या तात्पर्य है यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार अनुसन्धान करने पर कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि, भृगु, आदि महर्षियों द्वारा ही अति प्राचीन काल से अपने पुत्र एवं शिष्यसन्तति में आयुर्वेद विद्या का प्रचलन किया गया प्रतीत होता है। इसीलिये आत्रेय आदि शब्दों के गोत्रवाचक होने से आत्रेय परम्परा में चरक संहिता का मूल आचार्य आत्रेय पुनर्वसु, कृष्ण आत्रेय, भिक्षु आत्रेय आदि कई देखने में आते हैं। कश्यप परम्परा में भी कश्यप, वृद्ध काश्यप आदि बहुत से आचार्य मिलते हैं। एक आचार्य की गोत्र परम्परा में आया हुआ कोई व्यक्ति विशेष ज्ञान के लिए दूसरे आचार्य से भी विद्या ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार चरक के उपक्रम के अनुसार अपनी पूर्व परम्परा से विद्या प्राप्त करके आत्रेय पुनर्वसु द्वारा भरद्वाज
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