भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१८४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

से भी किसी विशेष विद्या का ग्रहण किया जाना सम्भव है। जिस प्रकार भृगु परम्परागत जीवक का मारीचकश्यप द्वारा भी विद्या ग्रहण किये जाने का निर्देश इस संहिता में भी मिलता है। महाभारत में यद्यपि भरद्वाज द्वारा धन्वन्तरि को विद्या की प्राप्ति तथा दिवोदास का भरद्वाज के आश्रम में जाने का उल्लेख मिलता है तथापि सुश्रुतसंहिता के अनुसार धन्वन्तरि दिवोदास का साक्षात् इन्द्र द्वारा ही विद्या-प्राप्ति का वर्णन मिलता है। परन्तु सब में इन्द्र को परम आचार्य होने से साक्षात् अथवा परम्परा द्वारा मूल उपदेष्टा स्वीकार किया गया है। इन धन्वन्तरि, मारीच कश्यप, आत्रेय पुनर्वसु आदि ऋषियों ने लोकोपकार के लिये इस विज्ञान का संहिता रूप से अपने शिष्यों को उपदेश किया। इस प्रकार वैदिक विज्ञान रूपी भूमिका में ब्रह्मा के विज्ञान सम्बन्धी बीज को लेकर उत्पन्न हुआ तथा अश्वि, इन्द्र, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भृगु आदि परम्परा तथा धन्वन्तरि, आत्रेय, कश्यप आदि अन्य पूर्वाचार्यों द्वारा प्रयत्न पूर्वक प्रत्येक शाखा का परिष्कार करके पल्लवित, पुष्पित, एवं फलित किया गया यह प्राचीन आयुर्वेदरूपी कल्पवृक्ष काल के ग्रास से बचे हुए कुछ फलों से शिष्य परम्परा द्वारा आज भी लोगों को जो जीवन दान कर रहा है यह भी सन्तोष का ही विषय है।

यद्यपि वैदिकसाहित्य में आयुर्वेद के आठ विभाग तथा उनके नामों का उल्लेख नहीं मिलता। तथा आत्रेय के लेखानुसार ब्राह्म विज्ञान (ब्रह्मा ने जब आयुर्वेद का उपदेश किया) के समय यह विज्ञान हेतु¹ (Cause), लिङ्ग (Symptoms) तथा औषध (Treatment) के ज्ञानवाला त्रिसूत्र रूप में ही था। इस प्रकार वैदिक आयुर्वेद विज्ञान प्राचीनकाल में त्रिस्कन्धात्मक ही प्रतीत होता है। तथापि वैदिक आयुर्वेद के विषयों के संग्रह तथा पूर्वोक्तानुसार अश्वियों के वर्णन में जङ्घा का जोड़ना, टुकड़े किये हुये शरीर का सन्धान, दृष्टि तथा श्रवण शक्ति का प्राप्त कराना, कुष्ठादि का निवारण, च्यवनरसायन, अपुत्रा के पुत्रोत्पादन आदि तथा इन्द्र की स्तुति में भी इसी प्रकार के नाना विषयों के मिलने से तथा ऋक्, यजु और अथर्ववेद आदि में अनेक प्रकार की भैषज्य, ओषधि विद्या, भूतविद्या तथा विषयपरिहार विद्या के स्थान-स्थान पर मिलने से शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, अगद, भूतविद्या, रसायन आदि आठों भागों के विषय पृथक्-पृथक् रूप में भी उस समय थे ऐसा प्रतीत होता है। भूतविद्या का आचार्य अथर्वा, महाभारत में आया हुआ अगद-तन्त्राचार्य काश्यप, कौमारभृत्याचार्य कश्यप, शालाक्याचार्य गार्ग्य एवं गालव तथा शल्याचार्य शौनकादि एक-एक प्रस्थान (विभाग) के आचार्य रूप में विद्यमान प्राचीन महर्षियों के उल्लेख मिलने से आयुर्वेद का आठ विभागों में विभक्त होना भी प्राचीन ही सिद्ध होता है। इसीसे एक-एक विभाग की विशिष्टता (Specialisation) के कारण कुछ महर्षियों की प्रसिद्धि हो गई। कोई-कोई सब विभागों (ज्ञानों) के सामूहिक रूप से भी ज्ञाता हो सकते हैं। जिस प्रकार ऋग्वेद की अपेक्षा अथर्ववेद में ओषधि, भैषज्य, भूतचातन, विषापहरण आदि विषय विकसित रूप में मिलते हैं उसी प्रकार उसका एक-एक अंश कालक्रम से विज्ञान द्वारा पुष्ट होकर ग्रहण, धारण तथा प्रयोग के सौकर्य की दृष्टि से पृथक्-पृथक् प्रस्थान (विज्ञान) रूप से विभागों में विभक्त हो गया। आर्ष समय में आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों प्रकार के दुःखों को पृथक्-पृथक् दूर करने के लिये अदृष्ट उपायों की तरह दृष्ट उपायों के भी क्रमशः विकसित होने से अथर्ववेद में होने वाले विकास को दृष्टि में रखते हुए निम्न आठ विभाग हो गये। शारीरभैषज्य में शरीरक्रिया की प्रधानता को लेकर शल्य, बहुत सी मुख्य इन्द्रियों की स्थिति के कारण प्रधान माने जाने वाले उत्तमाङ्ग (शिर) को लेकर शालाक्य, बल तथा वीर्य की वृद्धि संबन्धी वाजीकरण, वयःस्थापन रूप महाफल वाले तथा लम्बे विशेष प्रयोगों को लेकर रसायन, ऋतु, गर्भ तथा बालक की प्राथमिक अवस्था से संबनिधत कौमारभृत्य, इनसे भिन्न शारीरिक तथा मानसिक भैषज्यसंबन्धी कायचिकित्सा, बाह्य आगन्तुक विकार को शान्त करने तथा सांप, विच्छू आदि प्राणियों के विष विकार से संबन्धित अगदतन्त्र, भूतग्रहस्कन्द आदि देवताओं के विकारसंबन्धी भूतविद्या इत्यादि। इस प्रकार तीनो दुःखों के प्रत्येक विभाग


१. हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् । त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं विबुधे यं पितामहः ॥
सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः । यथावद् चरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ (चरके सू. अ. १)