भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८५

को लेकर उस-उस के प्रतीकार की दृष्टि से आठ प्रस्थान (विभाग) विभक्त हुए प्रतीत होते हैं। प्राचीन आचार्यों में ब्रह्मा तथा इन्द्र सर्वप्रस्थानों (आठों विभागों) के आचार्य थे। महाभारत के अनुसार इन्द्र द्वारा उपदिष्ट भरद्वाज तथा हरिवंश पुराण के अनुसार भरद्वाज से तथा सुश्रुतसंहिता के अनुसार साक्षात् इन्द्र द्वारा उपदिष्ट धन्वन्तरि सर्वप्रस्थानों के आचार्य माने गये हैं। एक-एक विषय के अधिक विकसित हो जाने के कारण जिस प्रकार आजकल एक-एक अङ्ग की विशेष चिकित्सा द्वारा एक-एक विभाग के विशेषज्ञ (Specialist) होते हैं। उसी प्रकार उस-उस विषय में विशेष नैपुण्य प्राप्त करने तथा शिष्यों के ग्रहण एवं धारण के सौकर्य के लिए महाभारत के अनुसार भरद्वाज ने तथा हरि^१वंश के अनुसार धन्वन्तरि ने आयुर्वेद विज्ञान को आठ भागों में विभक्त करके तथा एक-एक विभाग को विकसित करके पृथक्-पृथक् शिष्यों को उपदेश दिया तथा उसका प्रचार किया। इससे प्रतीत होता है कि आठों प्रस्थान पृथक्-पृथक् प्रवाहरूप में लोक में प्रचलित थे। कायचिकित्सा संबन्धी आत्रेय संहिता में तथा कौमारभृत्य संबन्धी काश्यप संहिता में प्रजापति, इन्द्र आदि आचार्यों के साथ धन्वन्तरि का हौम्य देवरूप से निर्देश किया जाना तथा नाना प्रस्थानों में धान्वन्तर घृत आदि का विधान होना धन्वन्तरि का अष्टाङ्गविभागों का आचार्य होना सूचित करता है। न केवल मूलधन्वन्तरि अपितु उसके सम्प्रदाय वाला द्वितीय धन्वन्तरि दिवोदास भी 'आयुर्वेद के आठों अङ्गों में से किसका उपदेश करूं' इस प्रकार सुश्रुत से पूछकर इस प्रश्न के उत्तर में 'शल्यशास्त्र का उपदेश कीजिये' ऐसी सुश्रुत द्वारा प्रार्थना किये जाने पर उसे शल्यशास्त्र का उपदेश दिया। इस प्रकार सुश्रुतसंहिता के उपक्रम के लेख द्वारा तथा पीछे अपने मुंह^२ से भी अष्टाङ्ग आयुर्वेद का ज्ञाता होना स्वीकार करने से भी अष्टाङ्ग विभाग का आचार्य होना सिद्ध होता है। अष्टाङ्ग के ज्ञाता भरद्वाज या इन्द्र द्वारा उपदिष्ट आत्रेय पुनर्वसु के अग्निवेश आदि ६ शिष्यों द्वारा पृथक्-पृथक् तन्त्रों के निर्माण के उल्लेख से तथा धन्वन्तरि दिवोदास से शल्यशास्त्र का उपदेश लेकर सुश्रुत द्वारा सुश्रुतसंहिता के निर्माण के उल्लेख से यद्यपि उन दोनों में कहीं-कहीं प्रसङ्गवश अन्य प्रस्थानों के विषय भी आ जाने से 'प्राधान्यतो व्यपदेशा भवन्ति' इस न्याय से भरद्वाज के अष्टाङ्गसम्प्रदाय में एक आत्रेय पुनर्वसु का कायचिकित्सा विभाग तथा धन्वन्तरि दिवोदास के अष्टाङ्ग सम्प्रदाय में से एक सुश्रुत का शल्यप्रधान सम्प्रदाय है। इस प्रकार आजकल भी चिरकाल से दोनों सम्प्रदाय हैं। इसके अतिरिक्त कौमारभृत्य के विषय में आत्रेय से भी प्राचीन मारीचकश्यप सम्प्रदाय के भी अब मिल जाने से आजकल तीन सम्प्रदाय हो गये हैं। चरक तथा सुश्रुत संहिता में लेशरूप से आये हुए कौमारभृत्य के विषय में स्वतन्त्र प्रस्थानरूप में पृथक् संहिता के मिल जाने से हम कह सकते हैं कि सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में संक्षिप्त रूप से आये हुए शालाक्य आदि अन्य विषय के भी इसी प्रकार से सर्वाङ्गपूर्ण स्वतन्त्र संहिताएँ तथा आचार्य होंगे। अन्य प्रस्थान यद्यपि कालवश आजकल लुप्त हो चुके हैं तो भी महा^३भारत, हरिवंश, सुश्रुत आदि में वर्णित यह अष्टङ्ग विभाग प्राचीन ही है। इस प्रकार यह कल्पना करना ठीक नहीं है। कि कायचिकित्सा में भरद्वाज का सम्प्रदाय तथा शल्यचिकित्सा में धन्वन्तरि सम्प्रदाय ये दो विभाग पुनः आठ विभागों में विभक्त हुए हैं।

इस प्रकार आर्ष समय में भी अष्टाङ्गों में से कालक्रम से विकसित एक-एक विभाग का विशेष रूप से निरूपण करने से उस विभाग में वे २ ऋषि प्रधान आचार्य माने गये हैं। सुश्रु^४त संहिता में शालाक्यतन्त्र के कर्ता के रूप में विदेहनिमि का, सुश्रु^५त, औपधेनव, औरभ्र, पौष्कलावत आदियों का शल्यचिकित्सक के रूप में शौन^६क, कृतवीर्य,


१. तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा। काशिराजो महाराजः सर्वरोगप्रणाशनः ॥
आयुर्वेदं भरद्वाजात् प्राप्येदं भिषजां क्रियाम्। तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत् ॥ (हरिवंशे अ. २९)
२. अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम्। विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति ॥ (सु. उ. तं. अ. ६६)
३. महाभारते सभापर्वणि- 'आयुर्वेदस्तथाऽष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत' ! एवं पूर्वनिर्दिष्टयोर्महाभारतहरिवंशलेखयोः। (११/१७)
४. सुश्रुते- शालाक्यतन्त्राभिहिता विदेहाधिपकीर्तिताः ॥ (सु. उ. अ. १४)
५. सुश्रुते- औपधेनवमौरभ्रं सौश्रुतं पौष्कलावतम्। शेषाणां शल्यतन्त्राणां नामान्येतानि निर्दिशेत् ॥ (सु. सू. अ. ४)
६. सुश्रुते- शरीरनिर्मितिविषये शौनकमतोल्लेखः ॥ (सु. शा. अ. ३)

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