भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१८६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

पाराशर्य, मार्कण्डेय, सुभूतिगौतम आदि का पूर्वाचार्य के रूप में वर्णन है। चरक¹ संहिता में अग्निवेश, भेड आदि छहों का कायचिकित्सा के आचार्य के रूप में, कांका²यन, वायोर्विद, हिरण्याक्ष, कौशिकमैत्रेय, कुश, साङ्कृत्यायन, कुमारशिरा भरद्वाज, वडिश, धामार्गव, मारीचि काष्य, काशीपति वामक, पारीक्षित् मौद्गल्य, शरलोम, कौशिक, भद्रकाप्य, धन्वन्तरि आदि का मतोल्लेख, अङ्गिरा³ जमदग्नि, काश्यप आदि बहुत से ऋषियों के नाम दिये हैं। इसी प्रकार इस वृद्धजीवकीय तन्त्र के भी सूत्रस्थान रोगाध्याय, सिद्धिस्थान राजपुत्रीयाध्याय, वमनविरेचनीयाध्याय तथा ग्रन्थ में भिन्न-भिन्न मत आने पर भार्गव, वायोर्विद, कांकायन, कृष्ण भरद्वाज, दारुवाह, हिरण्याक्ष, वैदेहनिमि, गार्ग्य, माठर, आत्रेय पुनर्वसु, पाराशर्य, भेड तथा कौत्स आदि नामों वाले बहुत से पूर्व आचार्यों का स्मरण किया गया है।

इनमें से पराशर, भेड, काङ्ख्यायन, हारीत, क्षारपाणि जातूकर्ण, आश्विन, भारद्वाज, भोज, भानुपुत्र, कपिलबल, भालुकि, खरनाद तथा विश्वामित्र आदि कुछ आचार्यों के मधूकोश, चरक तथा सुश्रुत की व्याख्या में तथा ताडपत्र लिखित प्राचीन 'ज्वरसमुच्चय' तथा 'ज्वरचिकित्सित' आदि पुस्तकों में उद्धृत वचन मिलने से इनके ग्रन्थों की सत्ता प्रकट होती है। तथा जिनके आजकल वचन उपलब्ध नहीं होते हैं उनके भी स्थान-स्थान पर तन्त्रकर्ता एवं सूत्रकार के रूप में निर्देश तथा मतों के दिखाई देने से ग्रन्थों का होना स्पष्ट है। हेमा⁴द्रि के लक्षणप्रकाश तथा शालिहोत्रोक्त अश्वशास्त्र के अश्वाभिषेक मन्त्रों में भी आयुर्वेद के कर्ता के रूप में बहुत से ऋषियों के नाम दिये हुए हैं।

इस प्रकार दैवयुग से लेकर आजतक देवर्षि तथा महर्षि आदि बहुत से आयुर्वेद के आचाय हुए हैं। अष्टाङ्ग आयुर्वेद के एक-एक विभाग को उन-उन आचार्यों ने ग्रन्थ निर्माण एवं उपदेश द्वारा बहुत बढ़ाया है। उस सब का यदि संकलन किया जाय तो आयुर्वेद का एक बड़ा भारी ग्रन्थ बन सकता है। परन्तु कालप्रवाह में अन्य शास्त्रों की तरह आयुर्वेद के भी बहुत से अमूल्य रत्न लुप्त हो चुके हैं। इन प्राचीन विलुप्त ग्रन्थों के विषय में मेरे परम मित्र श्रीयुत गण⁵नाथ सेनजी तथा गिरीन्द्र⁶नाथ मुखोपाध्याय आदि भारतीय तथा बहुत से पाश्चात्य विद्वानों ने पर्याप्त विवेचन किया है अतः उसके पिष्टपेषण की आवश्यकता नहीं है।


१. चरके—अग्निवेशश्च भेडश्च जतूकर्णः पराशरः। हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥
तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत्। अथ भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ॥ (च. सू. अ. १)
२. सूत्रस्थाने वातकलाकलीय (१२) यज्जः पुरुषीय (२५) आत्रेयभद्रकाप्यीया (२६) ध्यायेषु। (च. सू. अ. १)
३. चरकोपक्रमग्रन्थे।
४. विक्रम संवत् १५२५ में लिखी हुई हेमाद्रि की 'लक्षण-प्रकाश' नामक एक प्राचीन जीर्ण पुस्तक मेरे संग्रहालय में है। उसमें हाथियों के प्रकरण में पालकाप्य आदियों के वचन के समान अश्वप्रकरण में अनेक स्थानों पर शालिहोत्र के वचन दिये हैं। वे निम्न हैं—
वसिष्ठो वामदेवश्च च्यवनो भारविस्तथा। विश्वामित्रो जमदग्निर्भारद्वाजश्च वीर्यवान् ॥
असितो देवलश्चैव कौशिकश्च महाव्रतः। सावर्णिंगालवश्चैव मार्कण्डेयस्तु वीर्यवान् ॥
गौतमश्च ..... भागंश्च आगरुप (?) काश्यपस्तथा। आत्रेयः शाण्डिलश्चै तथा नारदपर्वतौ ॥
काण्वगो नहुषश्चैव शालिहोत्रश्च वीर्यवान्। अग्निवेशो मातलिंश्च जतुवर्णः पराशरः ॥
हारीतः क्षारपाणिश्च निमिश्च वदतांवरः। अदालिकश्च भगवान् श्वेतकेतुर्भृगुस्तथा ॥
जनकश्चैव राजर्षिस्तथैव हि विनन्गजित्। विश्वेदेवाः समरुतो भगवांश्च बृहस्पतिः ॥
इन्द्रश्च देवराजश्च सर्वलोकचिकित्सकाः। एते चान्ये च बहव ऋषयः संश्रितव्रताः ॥
आयुर्वेदस्य कर्तारः सुस्नातं तु दिशन्तु ते ॥ (पृ. १५९)
५. प्रत्यक्षशारीरभूमिकायाम् ॥
६. History of Indian Medicine.

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