भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 942 में से

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८७

आत्रेय तथा सुश्रुतसंहिताएँ—बहुत से प्राचीन ग्रन्थों के विलोप के कारण क्षतिग्रस्त आयुर्वेद की बची हुई महिमा को स्थिर रखने के लिए अत्यन्त प्राचीन काल से आत्रेय तथा धन्वन्तरि की संहिताएँ क्रमशः चरक तथा सुश्रुतसंहिता नाम से प्रसिद्ध आज भी मिलती हैं। इनके अत्यन्त प्रसिद्ध होने के कारण सूर्य तथा चन्द्रमा के लिये अन्य प्रकाश के समान इनके परिचय की आवश्यकता नहीं है।

अष्टाङ्गहृदय के लेखक वाग्भट के समय यद्यपि आयुर्वेद के अन्य आचार्यों की भी संहिताएँ विद्यमान थीं परन्तु फिर भी—

यदि चरकमधीते तद्ध्रुवं सुश्रुतादिप्रणिगदितगदानां नाममात्रेऽपि बाह्यः।
अथ चरकविहीनः प्रक्रियायामखिन्नः किमिव खलु करोति व्याधितानां वराकः ।।

इत्यादि श्लोक द्वारा मालूम पड़ता है कि यदि चरक का ही अध्ययन किया जाय तो सुश्रुत में आये हुए रोगों का नाम मात्र भी ज्ञान नहीं हो सकता तथा यदि केवल सुश्रुत का अध्ययन किया जाय तो रोगों के प्रतीकार की प्रक्रिया का ज्ञान असम्भव है। इसलिये चरक तथा सुश्रुत दोनों का अध्ययन ही आवश्यक है। इस प्रकार मध्यकाल में वाग्भट के समय में भी ये दोनों ग्रन्थ ही सर्वोपरि माने जाते थे। हजार वर्ष पूर्व के ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक में भी चरक तथा सुश्रुत के बहुत से वचन दिये हुए हैं। इसी प्रकार चतुर्थ शताब्दी के नावनोतक नामक पुस्तक में भी चरक तथा सुश्रुत का उल्लेख है। बाणभट्ट के हर्षचरित में पौनर्वसव (पुनर्वसु के पुत्र या शिष्य) वैद्यकुमार के निर्देश से आत्रेय पुनर्वसु के सम्प्रदाय का उस समय भी प्रचार मालूम पड़ता है। जब से चरक तथा सुश्रुत संहिता का उद्भव हुआ है तभी से ही अपने विचारों की गुरुता एवं गुणों की महिमा से भारत तथा उससे बाहर भी ये अत्यन्त प्रचलित रहे हैं तथा आज भी ये ग्रन्थ वैद्यों के लिये सर्वस्व हैं। सप्तम¹ अष्टम तथा नवम शताब्दी में जब कि अरब तथा पारसीक (पर्शिया) देश अत्यन्त उन्नत अवस्था में थे उस समय भारतीय चिकित्सा विज्ञान के आदर की ही दृष्टि से चरक तथा सुश्रुत संहिताओं का अनुवाद हुआ था। अरबी में अनूदित चरक-सरक नाम से तथा सुश्रुत सस्त्रद नाम से प्रसिद्ध हैं। अबूसीना (Abusina), अबूरासी (Abu Rasi), तथा अबूखिराबि (Abusirabi) नामक अरबी के चिकित्सा ग्रन्थों के लैटिन भाषा के अनुवाद में भी स्थान-स्थान पर चरक का नाम आता है। अ²लबेरूनी (Alberuni) नामक यात्री के पुस्तकालय में चरक का अनुवाद था ऐसा उसके अंगरेजी अनुवाद से ज्ञात होता है। अलम³नसूर (Almansur) ई. प. ७५३-७७४ ने बहुत से आयुर्वेदिक ग्रन्थों, चरक के सर्पचिकित्सा प्रकरण तथा सुश्रुत का अनुवाद किया था। रजस् (Rhazas) नाम का उसका वैद्य चरक का बहुत सम्मान करता था। सिरसीन नामक पाश्चात्य विद्वान् के पू⁴र्वज भी भारतीय आयुर्वेद तथा चरक सुश्रुत को जानते थे ऐसा पुरावृत्त के लेखकों से मालूम पड़ता है। अशोक राजा के पोते (सम्प्रति) के समय बौद्ध धर्म के साथ भारतीय आयुर्वेद भी सिंहल द्वीप में पहुंचा था। भारतीय आयुर्वेद विशेषकर बहुत सी टीकाओं से युक्त वाग्भट तिब्बत में अपना प्रकाश फैलाकर वहां से मंगोल तक पहुंच गया। भारत में विलुप्त बहुत सी वाग्भट की टीकाएँ आज भी तिब्बत में अनूदित हुई मिलती हैं।

भेडसंहिता—आज कल भेडसंहिता नाम की पद्यमय तथा संक्षिप्त लेख वाली एक अन्य संहिता भी कलकत्ता से प्रकाशित हुई है ? आर्ष छाया के अनुरूप रचना होने से वह भी प्राचीन तथा आर्ष प्रतीत होती है। परन्तु उपक्रम (प्रारम्भ)


१. H. H. wilson
२. Pr. Sachu.
३. Hindu Superiority by Har Bilas Sarada.
४. किताबे अलफेरिस्त एण्टिक्विटी ऑफ हिन्दू मैडिसिन।

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